शुक्रवार, 24 मई 2013

Tungnath highest altitude mandir/Temple तुंगनाथ मन्दिर (सबसे ऊँचाई वाला केदार)

ROOPKUND-TUNGNATH 11                                                                             SANDEEP PANWAR
चोपता से तुंगनाथ मन्दिर सिर्फ़ 3-4 किमी की दूरी पर ही है। जहाँ चोपता की समुन्द्रतल से ऊँचाई 2900 मीटर  के आसपास है, वही तुंगनाथ मन्दिर की समुन्द्रतल से ऊँचाई 3680 मीटर है। तुंगनाथ मन्दिर भगवान शंकर का विश्व में सर्वाधिक ऊँचाई पर स्थित मन्दिर है। यह पंच केदार भी आता है। इस मन्दिर तक पहुँचने का मार्ग कुछ वर्ष पहले तक कच्चा हुआ करता था लेकिन अब यहां का मार्ग 5-6  फ़ुट चौड़ाई का होने के साथ-साथ चोपता से लेकर मन्दिर तक पूरी तरह सीमेंटिड़ बना दिया गया है। चोपता में मुख्य सड़क पर तुंगनाथ जाने का मार्ग दिखायी देने लगता है। यहाँ एक प्रवेश द्धार भी बनाया गया है जिससे मार्ग के बारे में कोई शंका भी नहीं रहती है। यदि कोई अपने वाहन से भी आ रहा है तो मन्दिर की पद यात्रा आरम्भ होने वाले बिन्दु के पास अपना वाहन लावारिस हालत में छोड़कर मन्दिर के लिए बेफ़िक्र जाया जा सकता है।


हमारी बाइक तो चोपता में हमारे कमरे के आगे ही खड़ी थी। यदि हम चाहते तो लगभग दो किमी तक की दूरी बाइक से तय कर सकते थे, क्योंकि दो किमी तक का मार्ग थोड़ा सा समतल सा ही है, इसके बाद जोरदार चढ़ाई आरम्भ हो जाती है। हम दोपहर में कोई 2 बजे के आसपास चोपता से तुंगनाथ के लिये चल दिये थे। शुरु के एक किमी तय करने में किसी किस्म की कोई समस्या नहीं आयी, यहाँ उल्टे हाथ पर एक दुकान आती है जिसके ठीक पीछे एक बुग्याल दिखायी देता है। जैसे ही हम उस दुकान के पास पहुँचे तो दुकान वाले ने हमें कहा कि चाय-पानी पी लो। अब चाय मैं पीता नहीं, रही पानी की बात, पानी की बोतल हम चोपता से ही साथ लेकर नही चले थे, क्योंकि हमें मालूम ही था कि तुंगनाथ पहुँचने में मुश्किल से एक घन्टा ही तो लगेगा। एक घन्टे की यात्रा में कई दुकाने मिलेंगी, यदि बीच में कही प्यास लगी तो नीम्बू-पानी ले लेंगे।

शुरु के दो किमी कैसे निकल गये? हमें पता ही नहीं लगा, आगे जाकर हमें स्थानीय युवकों की एक टोली मिली जिसमें से एक युवक सेना में कार्यरत था, लेकिन पहाड़ी लोगों की कद-काठी कुछ ऐसी होती है कि 20-30 साल की उम्र के बीच का फ़ासला स्पष्ट करना बहुत टेड़ी खीर साबित हो जाता है। सभी युवक देखने में 15-16 साल के ही लग रहे थे। इन लड़कों से मिलने के बाद हम आगे बढ़ते रहे। जैसे-जैसे आगे बढ़ते जा रहे थे चढ़ाई तीखी होती जा रही थी। चढ़ाई भले ही कितनी ही टेड़ी होती जा रही थी लेकिन हर कदम के साथ मंजिल नजदीक आती दिखायी देती जा रही थी। यहाँ ऊपर देखने पर कई बैंड़ दिखायी दिये जिसपर कुछ शार्टकट मारते बन्दे दिखायी दे रहे थे। पहाड़ में शार्टकट दिख जाये और मैं उसे छोड़ दूँ आजतक ऐसा नहीं हुआ है तो यहाँ कैसे हो जाता। मैंने जितने सम्भव हो सके उतने शार्टकट लगाये। हमें शार्टकट लगाते देख, कुछ राजस्थानी महिलाएँ भी हमारे पीछे-पीछे ही शार्टकट लगाने लग गयी।

अभी मन्दिर एक किमी से भी कम दूरी पर ही होगा कि एक मोड़ पर मैंने सोचा कि चलो टेड़े-मेड़े चलने की बजाय सीधे पहाड़ पर चढ़ जाते है वहाँ से मन्दिर दिखायी दे जायेगा। मैंने उस पहाड़ पर चढ़कर देखा तो मन्दिर जाने वाला मार्ग दूसरी ओर जाता दिखायी दे रहा था। अब हमारा शार्टकट मारना गलत साबित होने जा रहा था लेकिन तभी मनु को पुरानी वाली पैदल पगड़न्ड़ी दिखायी दे गयी। पुरानी पगड़न्ड़ी हमारे ठीक सामने ही होकर मन्दिर की ओर जा रही थी। इस पगड़न्ड़ी से मन्दिर के नजदीक पहुँचने में बहुत ही कम चढ़ाई चढ़नी पड़ी थी कारण हमने जो शाटकट लगाया था उससे हम पहाड़ पर ऊपर आ गये थे जबकि पक्का मार्ग मन्दिर की ओर धीरे-धीरे चढ़ रहा था। शार्टकट के कारण हम एक झटके में ही काफ़ी ऊँचाई चढ़ गये थे। हम धीरे-धीरे मन्दिर की ओर बढ़ते रहे। आगे जाकर हमारी वाली कच्ची पगड़न्ड़ी व पक्की पगड़न्ड़ी एक जगह जाकर मिल जाती है। जहाँ यह दोनों पगड़न्ड़ी मिलती है वहाँ से मन्दिर मुश्किल से आधा किमी से भी कम दूरी पर रह जाता है।


थोड़ी देर में ही हम मन्दिर के पास पहुँच गये। मन्दिर के पास पहुँचकर देखा कि वहाँ तो एक छोटी सी आठ-दस घरो/दुकानों की बस्ती भी बसी हुई है। हमने उन दुकानों में पता किया कि क्या यहाँ रात में रुका जा सकता है उन्होंने कहा हाँ यहां रात में रुकने का पूरा प्रबन्ध है। खाने-पीने व रहने की बात यदि हमें पता होती तो हम चोपता में नहीं रुकते, मन्दिर के ऊपर चन्द्रशिला पीक पर शाम के समय या सुबह के समय जो शानदार नजारा दिखायी देता है वो अन्य जगह बेहद ही दुर्लभ है। हमने मन्दिर में दर्शन किये। तुंगनाथ मन्दिर की हालत बहुत बुरी अवस्था में पहुंच चुकी है। ऐसा लगता है यदि इस मन्दिर पर ध्यान नहीं दिया गया तो ज्यादा समय तक मन्दिर का खड़ा रहना मुश्किल है। हम कुछ देर मन्दिर प्रांगण में ठहरकर चन्द्रशिला पीक के लिये चल दिये। तुंगानथ मन्दिर से चन्द्रशिला चोटी भले ही एक-डेढ किमी दूर ही हो लेकिन जो चढ़ाई इसके लिये चढनी पड़ती है वो रोंगटे खड़ी कर जाती है। (क्रमश:)   

रुपकुन्ड़ तुंगनाथ की इस यात्रा के सम्पूर्ण लेख के लिंक क्रमवार दिये गये है।
01. दिल्ली से हल्द्धानी होकर अल्मोड़ा तक की यात्रा का विवरण।
02. बैजनाथ व कोट भ्रामरी मन्दिर के दर्शन के बाद वाण रवाना।
03. वाण गाँव से गैरोली पाताल होकर वेदनी बुग्याल तक की यात्रा।
04. वेदनी बुग्याल से पत्थर नाचनी होकर कालू विनायक तक की यात्रा
05. कालू विनायक से रुपकुन्ड़ तक व वापसी वेदनी बुग्याल तक की यात्रा।
06. आली बुग्याल देखते हुए वाण गाँव तक की यात्रा का विवरण।
07. वाण गाँव की सम्पूर्ण (घर, खेत, खलियान आदि) सैर/भ्रमण।
08. वाण से आदि बद्री तक की यात्रा।
09. कर्णप्रयाग व नन्दप्रयाग देखते हुए, गोपेश्वर तक की ओर।
10. गोपेश्वर का जड़ी-बूटी वाला हर्बल गार्ड़न।
11. चोपता से तुंगनाथ मन्दिर के दर्शन
12. तुंगनाथ मन्दिर से ऊपर चन्द्रशिला तक
13. ऊखीमठ मन्दिर
14. रुद्रप्रयाग 
15. लैंसड़ोन छावनी की सुन्दर झील 
16. कोटद्धार का सिद्धबली हनुमान मन्दिर

















4 टिप्‍पणियां:

Rahul Kumar Singh ने कहा…

स्‍वर्गोपम.

Ritesh Gupta ने कहा…

बहुत बढ़िया रही आपकी तुंगनाथ यात्रा आप के साथ हम भी हो लिए.............

o.p.laddha ने कहा…

बहुत ही रोचक ............फोटो बहुत ही सुन्दर है

Dinesh Sharma ने कहा…

हर हर महादेव

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