सोमवार, 13 जून 2016

Return from Rudranath kedar Trek रुद्रनाथ केदार ट्रैक से वापसी

नन्दा देवी राजजात-रुपकुण्ड-मदमहेश्वर-अनुसूईया-रुद्रनाथ-1         लेखक SANDEEP PANWAR

इस यात्रा के सभी लेखों के लिंक नीचे दिये गये है। जिस पर क्लिक करोगे वही लेख खुल जायेगा।
 भाग-01 दिल्ली से हरिद्वार होकर वाण तक, बाइक यात्रा।
भाग-02  वाण गाँव से वेदनी होकर भगुवा बासा तक ट्रेकिंग।
भाग-03  रुपकुण्ड के रहस्मयी नर कंकाल व होमकुन्ड की ओर।
भाग-04  शिला समुन्द्र से वाण तक वापस।
भाग-05  वाण गाँव से मध्यमहेश्वर प्रस्थान।
भाग-06  मध्यमहेश्वर दर्शन के लिये आना-जाना।
भाग-07  रांसी से मंडक तक बाइक यात्रा।
भाग-08  अनुसूईया देवी मन्दिर की ट्रेकिंग।
भाग-09  सबसे कठिन कहे जाने वाले रुद्रनाथ केदार की ट्रेकिंग।
भाग-10  रुद्रनाथ के सुन्दर कुदरती नजारों से वापसी।
भाग-11  धारी देवी मन्दिर व दिल्ली आगमन, यात्रा समाप्त।
हल्की–हल्की बारिश होने लगी तो मैंने बैग रखने के बारे में बोला। पुजारी जी ने अपने सेवक से एक कमरा खोलने को कहा। सेबक हमें लेकर एक कमरे के सामने पहुँचा। कमरे की बाहर से कुन्डी लगी हुई थी। सेवक ने कमरा खोलने के बाद कहा। आप अपना सामान रखकर थोडी देर में आ जाना। मैं और पुजारी जी शाम की पूजा की तैयारी करने वाले है। थोडी देर में शंख की आवाज सुनकर हम कमरे से बाहर निकले। कमरा ज्यादा बडा नहीं था। उसमें पूरी तरह खडा नहीं हुआ जा रहा था। जूते निकाल कर चप्पत पहन ली। कमरे से बाहर निकलते ही जबरस्त ठन्ड का अहसास हो गया। कुछ देर पहले तक सूरज निकला हुआ था तो पता नहीं लग पा रहा था सूरज गायब तो ठन्ड का प्रकोप शुरु। गर्म चददर निकाल कर ओढ ली।


रुद्रनाथ जी के मन्दिर में भक्तों के खडे होने के लिये बहुत ज्यादा जगह भी नहीं है। हम उस दिन वहाँ 5 बाहरी भक्त थे। पुजारी जी ने बताया था कि कभी कभी तो मैं और सेवक के अलाव कई-कई दिन तक कोई नहीं आता है। रुद्रनाथ जी की पूजा ब्रह्म कमल के फूलों से की जाती है। पुजारी जी ने पूजा सम्पूर्ण करने में एक घन्टा समय लिया। मैं बहुत कम पूजा में बैठता हूँ। खासकर मन्दिरों में। पुजारी जी की वेश भूषा देखकर मुझे गंगौत्री-केदारनाथ पद यात्रा वाले भैरव चटटी के पुजारी याद आ गये। वे भी कुछ ऐसी ही वेश भूषा धारण किये हुए थे। मन्त्र-वन्त्र तो मेरे एक भी याद नहीं है लेकिन वो यादगार पूजा कभी न भूल पाऊंगा। हम 5 भक्तों को पुजारी जी ने पूजा सम्पूर्ण होने के बाद एक-एक ब्रह्म कमल का फूल दिया। भगवान ने मेरी इस बार की सभी यात्रा सफल कराने में पूरा साथ दिया। मैंने भगवान का विश्वास बनाये रखने में कोई कसर नहीं होने दी।

पूजा के उपरांत पुजारी जी ने हम तीनों को अपने कक्ष में आने को कहा। हम तीनों पुजारी जी के कक्ष में पहुँच गये। पुजारी जी के पक्ष को गर्म रखने के लिये लकडियों का पूरा प्रबन्ध किया गया था। हमें उनके कक्ष में बिल्कुल भी ठन्ड ना लगी। पुजारी जी ने मेरा कैमरा लेकर नन्दा देवी यात्रा से लेकर अब के सारे फोटो देख डाले। पनार बुग्याल से रुद्रनाथ की ओर आते समय सगर की ओर लौटती दो महिलाएँ मिली थी जो मेरे साथ आये दोनों लडकों से बात कर रही थी तो मैंने इन चारों का बात करते हुए फोटो लिया था। उस फोटो को देखते ही पुजारी जी बोले अरे यह दोनों मेरी बहिने है। जो दो दिन यहाँ रहकर आज वापिस गयी है। वो फोटो आज भी मेरे पास है। पूरी यात्रा के फोटो देखने के बाद पुजारी जी ने सेवक से कहा, भोजन लाओ। कुछ देर में पुजारी जी ने भोजन किया। उसके बाद हम तीनों ने भी पुजारी जी के कक्ष में भोजन किया। उन दो लडकों व कैमरों में पुजारी की रुचि होने के कारण ही पुजारी ने मुझे भी अपने कक्ष में भोजन कराया अन्यथा पुजारी जी के लिये मैं अन्य सभी भक्तों जैसा होता।

रात को अच्छी नीन्द आयी। सुबह जल्दी आंख खुलने की बीमारी है। जिस कारण भौर में सूर्योदय देखने का मौका लगभग प्रतिदिन मिल जाता है। यहाँ भी सूर्योदय देखने का मौका मिल गया। पल-पल रंग बदलने आसमान को देखने का अनुभव हर किसी के नसीब में नहीं होता है। कल वाले दोनों लडके आज दोपहर बाद वापिस लौटेंगे। शायद आज की जगह कल लौटे। सुबह ठीक 8 बजे मैंने रुद्रनाथ जी से विदा ली। सुबह 10 बजे तक पनार बुग्याल पहुँच गया। पनार तक आने में ज्यादा मुश्किल नहीं आयी। सुबह 11 बजे ल्वीटी बुग्याल पहुँच गया था। ल्वीटी से आगे चक्रघिरनी की उतराई उतरने में मुश्किल तो होती है लेकिन चढते समय साँस फूलने वाली समस्या नहीं होती है। उतराई में घुटने सम्भालने होते है। ज्यादा तेजी के चक्कर में गिरकर हाथ-पैर फूटने का खतरा भी होता है। सगर पहुँचने के बाद समय देख पाया दिन के 3 बजे सगर पहुँच गया। वैसे बाइक मेरे पास थी लेकिन आज शाम तक हरिद्वार पहुँचना सम्भव नहीं था। शरीर भी थका हुआ था। इसलिये कल सुबह दिन निकलते ही दिल्ली के लिये कूच करना तय किया।  मैं सुबह 4 बजे निकलने वाला था लेकिन सोनू गेस्ट हाऊस मालिक ने कहा, कि यहाँ रात में भालू व तेंदुआ सडक पर मिल जाते है। इसलिये दिन निकलने के बाद चलना या सुबह मंडल से देहरादून जाने वाली बस के पीछे निकलना। भालू लगता है सडक पर आने के बाद भी पीछा न छोडेंगे। (continue)































2 टिप्‍पणियां:

SACHIN TYAGI ने कहा…

सुंदर नजारे। देखने में लग रहा है की इस से सुंदर जगह नही है। धन्यवाद संदीप भाई ।।

Sandeep Singh Marwah ने कहा…

bahut he badiya yatra rahi aapki, mazaa aa gya. shaandar photography!

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