मंगलवार, 14 जून 2016

Dhari Devi Temple धारी देवी मन्दिर

नन्दा देवी राजजात-रुपकुण्ड-मदमहेश्वर-अनुसूईया-रुद्रनाथ-11          लेखक SANDEEP PANWAR
इस यात्रा के सभी लेखों के लिंक नीचे दिये गये है। जिस पर क्लिक करोगे वही लेख खुल जायेगा।
 भाग-01 दिल्ली से हरिद्वार होकर वाण तक, बाइक यात्रा।
भाग-02  वाण गाँव से वेदनी होकर भगुवा बासा तक ट्रेकिंग।
भाग-03  रुपकुण्ड के रहस्मयी नर कंकाल व होमकुन्ड की ओर।
भाग-04  शिला समुन्द्र से वाण तक वापस।
भाग-05  वाण गाँव से मध्यमहेश्वर प्रस्थान।
भाग-06  मध्यमहेश्वर दर्शन के लिये आना-जाना।
भाग-07  रांसी से मंडक तक बाइक यात्रा।
भाग-08  अनुसूईया देवी मन्दिर की ट्रेकिंग।
भाग-09  सबसे कठिन कहे जाने वाले रुद्रनाथ केदार की ट्रेकिंग।
भाग-10  रुद्रनाथ के सुन्दर कुदरती नजारों से वापसी।
भाग-11  धारी देवी मन्दिर व दिल्ली आगमन, यात्रा समाप्त।
नन्दा देवी, मदमहेश्वर, अनुसूईया, रुद्रनाथ,की सफल यात्रा के उपरांत आज दिल्ली घर वापसी करनी है। सगर, गोपेश्वर से दिल्ली की दूरी करीब 450 किमी है इतनी लम्बी यात्रा पर सुबह जल्दी निकलना सही रहता है। सगर गाँव के पास भालू का डर नहीं होता तो मैं सुबह 5 बजे ही निकल पडता। मंडल से सुबह 5 बजे एक सीधी बस है जो चमोली, कर्णप्रयाग, रुद्रप्रयाग, देवप्रयाग, ऋषिकेश होकर देहरादून तक जाती है। होटल मालिक ने सलाह दी थी कि सुबह सडक पर भालू या बाघ मिल सकता है इसलिये उजाला होने के बाद ही निकलना। यदि उजाला होने से पहले निकलना जरुरी हो तो देहरादून वाली बस के पीछे रहना, जब उजाला हो जाये तब भले ही आगे निकल जाना। मैं सुबह 05 बजे तैयार हो गया था। बाइक पर सामान बाँध दिया था। ठीक 05:30 पर देहरादून वाली बस आयी तो मैं उसके पीछे-पीछे अपनी नीली परी दौडा दी। बाइक फिसलने से हैंडिल तिरछा हो गया था उसे कल शाम ठीक कर लिया था। इसलिये अब हैंडिल की भी कोई दिक्कत नहीं थी। गोपेश्वर से पहले ही उजाला हो गया था। फिर भी गोपेश्वर तक मैं बस के पीछे ही चला। गोपेश्वर में बस सवारियाँ लेने रुकी तो मैं उससे आगे निकल गया। इसके बाद वो बस ऋषिकेश तक मुझसे आगे नहीं निकली।



सुबह निकलने का लाभ यह होता है कि बडे-बडे शहर में भी सडके खाली सुनसान मिलती है। जैसे कर्फ्यू लगा हो। गोपेश्वर से चमोली तक अच्छा खास ढलान है। बाइक का इन्ज्न बन्द करने पर बाइक 50-60 आसानी से पार कर रही थी। मोड पर पहले ही ब्रेक लगाकर गति नियंत्रण में करनी पड रही थी। गोपेश्वर से चमोली तक डबल रोड बनी हुई है। चमोली से आगे तो सारा मार्ग ही डबल बना हुआ है। सुबह 6 बजे चमोली पहुँच गया। चमोली से कर्णप्रयाग व आगे रुद्रप्रयाग तक फोटो लेने के लिये रुकता व आगे चलता रहा। चमोली से ऋषिकेश की दूरी 202 किमी है। चमोली से श्रीनगर 97 किमी है। चमोली से बद्रीनाथ की दूरी भी 103 किमी है। जबकि भारत के अंतिम गाँव माँणा 106 किमी है। इस तरह देखा जाये तो 5-6 घन्टे में हरिद्वार पहुँच जाऊँगा। सडक किनारे केदारनाथ हादसे के समय के कई घर व होटलों की दुर्दशा देखी। चमोली से 11 किमी आगे जाने पर नन्द प्रयाग आता है यहाँ अलकनन्दा मन्दाकिनी का संगम होता है।

सुबह 8 बजे के करीब कर्णप्रयाग पहुँच गया। यहाँ एक पैट्रोल पम्प पर नीली परी को भर पेट खुराक दी गयी। नीली परी मेरी तरह खाली पेट नहीं चल सकती। अगर नीली परी भी खाली पेट चलने लगे तो इसका नाम नीली देवी हो जायेगा। सुबह 9 बजे रुद्रप्रयाग पार हो गया। चार महीने पहले बस में यहाँ आया था तो रुद्रप्रयाग से थोडा आगे श्रीनगर की ओर एक जगह भारी भूस्खलन के कारण हमारी बस को एक घन्टा रुकना पडा था। अब भी सडक की हालत तो वैसी ही खराब थी लेकिन आज यहाँ जाम नहीं लगा हुआ था। श्रीनगर मेरे लिये कुछ खास नहीं है लेकिन एक चीज मुझे श्रीनगर की याद दिलाती है। बाल मिठाई। वैसे तो अल्मोडा की बाल मिठाई ज्यादा स्वादिस्ष्ट होती है लेकिन बाल मिठाई इस रुट पर मिल रही है तो मुझे वो भी अल्मोडा जैसी स्वादिष्ट ही लगती है। मेरे घर पर मैं और मेरा बेटा दोनों बाल मिठाई के जबरदस्त शौकीन है। हम दोनों के अलावा घर में कोई बाल मिठाई नहीं खाता है। आज भी एक किलो बाल मिठाई का डिब्बा पैक करा लिया।

 आज धारी देवी मन्दिर देखने का इरादा था। पहले भी कई बार इस मार्ग से इसी बाइक से गया हूँ लेकिन धारी देवी को बाइक रोके बिना देखते हुए निकल गया था। रुद्रप्रयाग से 19 किमी के बाद धारी देवी मन्दिर आता है। धारी देवी मन्दिर मुख्य सडक के ठीक किनारे नदी के बीचों-बीच बना हुआ है। जब केदारनाथ का हादसा हुआ था उस समय धारी देवी मन्दिर की बडी चर्चा सुनी थी। बताया जा रहा था कि धारी देवी मन्दिर को अपने स्थान से हटा दिया गया है जिस कारण केदारनाथ हादसा हुआ है। धारी देवी का मन्दिर यहाँ बन रहे बांध के कारण डूब क्षेत्र में आ गया था। अब धारी देवी मन्दिर के स्थान पर सरिया व सीमेंट के पिलर स्थापित कर उनके ऊपर स्थापित किया गया है।

देवप्रयाग पहुँचने के बाद तो ऐसा लगने लगता है जैसे मैं घर पहुँचने वाला हूँ। दोपहर के करीब 1 बजे ऋषिकेश पहुँचा। ऋषिकेश से थोडा पहले कुछ सरदार व सरदारनी पैदल ही श्री हेमकुन्ठ साहिब की यात्रा के लिय जाते हुए मिले। उनमें से एक बन्दे से बातचीत में पता लगा कि वे लोग भठिन्डा से पैदल चलना शुरु हुए थे। ऋषिकेश में आज भी बाईपास से ही निकला। दिन के समय ऋषिकेश व हरिद्वार की भीड में घुसना किसी महाभारत से कम नहीं है। हरिद्वार पार करने के बाद एक ढाबे पर बाइक रोकी। भूख लगी थी। बिस्कुट के सभी पैकट समाप्त हो चुके थे। कडी चावल खाकर घर वापसी आरम्भ हुई। उत्तर प्रदेश की सीमा आरम्भ होने के बाद मुज्जफ़र नगर में जहाँ से टोल रोड आरम्भ होता है वहाँ तक सडक पर काफी सावधानी रखनी पडती है। टोल रोड आते ही बाइक हवा से बाते करने लगती है। शाम के करीब 4 वजे खतौली बाई पास पहुँचा। टोल रोड बन जाने के बाद खतौली शहर हाईवे से अलग हो गया है। यहाँ कुछ देर रुककर खेतों में लहलहाती फसलों को देखता रहा। करीब 15 मिनट रुकने के बाद आगे चल दिया। शाम के 6 बजे दिल्ली पहुँच गया था। (यात्रा समाप्त)


इस यात्रा के बारे में किसी भाई को कोई सवाल हो तो मुझे मेल करे या फोन करे। आपको शीघ्र जवाब दिया जायेगा। मेरा फोन नम्बर SANDEEP PANWAR 09868836358 है सम्पूर्ण भारत में रोमिंग में फ़्री इनकमिंग काल वाला है। मेरी मेल आईडी है jatdevtasandeep@gmail.com



















9 टिप्‍पणियां:

डॉ टी एस दराल ने कहा…

बहुत बढ़िया। अकेले यात्रा का अपना ही आनंद है। हालाँकि कोई साथी हो तो आनंद दुगना हो जाता है।

Rakesh bishnoi ने कहा…

bhai mujhe bhi le chalte meri to badi icha thi chalne ki

Vishal Thakur ने कहा…

nand prayag me alaknanda our nandakini milti hai.........bhut badiya yatra

SACHIN TYAGI ने कहा…

बहुत जोशभरी यात्रा रही, बहुत सारी ट्रैकिंग की आपने, जिसे बहुत जबरदस्त कह सकते है।
जहां आपने नीली परी को पैट्रोल की खुरांक पिलाई, उसी पैट्रोल पम्प पर मै बद्रीनाथ से लौटते वक्त रूका था, जिस बस में हम सवार थे उसमे पंचर हो गया था, तब यही पर कुछ समय रूकना हुआ।
संदीप भाई आपके यात्रा लेख पढने में बहुत मजा आता है, लिखते रहे ओर हम पढते रहे यही कामना है ईश्वर से।

Go Choppers ने कहा…

Nice article.
Kedarnath, at a distance of 223 kms from Rishikesh, is one of the most sacred mountain shrines of Lord Shiva.

Neeraj Kushwaha purdilnagar ने कहा…

कब लिखोगे आखे तरस गई

रमता जोगी ने कहा…

धारी देवी को उत्तराखण्ड की रक्षक देवी के रूप में जाना जाता है। यह सही बात है कि प्रतिमा को जिस दिन अपनी मूल जगह से हटाया गया उसी दिन केदार आपदा आयी थी। रुद्रप्रयाग-श्रीनगर के बीच में जो लेंडस्लाईड ज़ोन है उसका नाम सिरोबगड़ है। लामबगड़ (बद्रीनाथ से कुछ पहले) और सिरोबगड़ बहुत प्रसिद्द है। करोड़ों रूपये निगल चुके, और पता नहीं कितनी जानें लील गए हैं......शानदार यात्रा रही देवता।

Sandeep Singh Marwah ने कहा…

kul milakar boht badiya yatra rahi aapki! Aise he likhte rahe aur gyaan baant teh rahiye! :D

India Didi ने कहा…

बहुत ही बढ़िया यात्रा वृतांत लिखा है ..दिल खुश हो गया

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