शुक्रवार, 3 मार्च 2017

Travel to Juhu chowpatty beach mumbai मुम्बई का खूबसुरत जुहू चौपाटी सागर तट/ बीच



अंडमान व निकोबार की इस यात्रा में आपने अभी तक पोर्टब्लेयर का Chidiya Tapu, डिगलीपुर में अंडमान की सबसे ऊँची चोटी Saddle Peak, अंग्रेजों की क्रूरता की निशानी Cellular Jail, Haw lock island के सुन्दर तट और खूबसूरत Neil island, अंग्रेजों का मुख्यालय Ross island, Samudrika संग्रहालय, Mount harriet National Park, Wandoor Beach, पोर्टब्लेयर का Jogger’s Park & Airport, Chennai Airport, Mumbai Airport देखा। इस यात्रा को शुरु से पढना हो तो यहाँ माऊस से चटका लगाकर  सम्पूर्ण यात्रा वृतांत का आनन्द ले। इस लेख की यात्रा दिनांक 30-06-2014 को की गयी थी
JUHU CHOWPATTY BEACH, MUMBAI & TRAVEL TO NEW DELHI मुम्बई का जुहू चौपाटी सागर तट देखकर दिल्ली प्रस्थान

मुम्बई में हवाई अडडे की सुरक्षा स्थिति बहुत चिंताजनक है। हवाई पटटी पर उतरते समय हमारा जहाज झुग्गी झोपडी के ऊपर से होकर उतरता है। यहाँ लगता है जैसे हवाई जहाजों की सुरक्षा के साथ खिलवाड किया जा रहा है। झोपडी की छत में छोटे से सुराख से कोई भी आतंकवादी आसानी से राकेट लॉंचर या गोली से हवाई जहाज को उडा सकता है। चलो दोस्तों, मुम्बई आ गया है। हवाई अड्डे से बाहर निकले। अंडमान जाते समय भी हम मुम्बई होते हुए ही गये थे। वापसी भी इसी रुट से आ रहे है।
जाते समय हमें बोम्बे में रहने वाले दोस्त विशाल राठौर मिलने हवाई अडडे आ गये थे। विशाल के साथ हम पूरी रात घूमते रहे थे। उस रात वर्ली सी-लिंक तक हम एक टैक्सी में गये थे। उसी रात हम जुहू चौपाटी भी गये थे लेकिन अंधेरा होने पर चौपाटी पर कुछ समझ नहीं आया था। अब हम दिन में बोम्बे की जुहू चौपाटी घूमने जा रहे है। चौपाटी देखने के बाद वापिस हवाई अडडे आयेंगे। हमारा दिल्ली जाने वाली फ्लाइट बम्बई से 5 घंटे बाद है। इस खाली समय का सदुपयोग करने के लिये ही हमने जुहू चौपाटी पुन: घूमने का निर्णय लिया है। हमारा सामान सीधे दिल्ली के लिये बुक है। जिस कारण हम बे-झिझक घूम सकते है। उसके बाद दिल्ली जायेंगे।
हवाई अड्डे से जुहू बीच कैसे जाये?
मुम्बई हवाई अडडे से जुहू चौपाटी सागर तट /बीच पहुँचना बहुत ही सरल है। मुम्बई घूमने के लिये आटो सबसे अच्छा साधन है। यदि लम्बा जाना हो तो लोकल ट्रेन या लोकल बस बेहतर रहेगी। हवाई अडडे से जुहू चौपाटी ज्यादा दूर नहीं है। एक आटो वाला चौपाटी के लिये तैयार हो गया। बम्बई में ऑटो वालों की सबसे अच्छी बात यह है कि यह किराये के बारे में आपसे मोलभाव नहीं करेंगे। चलने से पहले मीटर डाउन कर देंगे। जितना मीटर बतायेगा उतना आप चुका दो। दस दिन पहले रात में हम आये थे तो सडके खाली पडी थी। अब दिन में यहाँ आये है तो लगता ही नहीं कि यह वही शहर है जो रात में खाली पडा था। जिन सडकों पर रात में हम केवल 15 मिनट में अमिताभ बच्चान के घर जलसा व अन्य कुछ फिल्मी कलाकारों (भांड / हीरो) के घरों के आगे से होते हुए जुहू बीच पहुँचे थे। सदाबहार हीरो धर्मेन्द्र उर्फ धर्म सिंह देओल का घर देखने की इच्छा थी। आज दिन में वन वे होने से उससे अलग मार्ग लेना पडा। दिन की भीडभाड में हमें आधा घंटा लग गया।
जुहू बीच पर समुन्द्र की लहरों संग मस्ती
जुहू बीच पर हम ज्यादा से ज्यादा एक घंटा रुकेंगे। ऑटो वाले का हिसाब चुकता कर दिया गया। किराया अच्छी तरह याद नहीं कितना लगा था। हल्का-फुल्का ध्यान आ रहा है शायद 60 रु के आसपास लगे थे। ऑटो वाले ने जहाँ उतारा था। वहाँ से जुहू बीच दिख नहीं रहा था। उससे पूछा कि जुहू तो आ गया, लेकिन बीच कहाँ है? ऑटो वाला बोला, सामने जो गली है। उसमें ऑटो ले जाना मना है। आप पैदल जाओगे तो जुहू बीच ही पहुँचोगे। वह गली मुश्किल से 30-40 मीटर की ही थी। उसे पार करते ही बीच पर इठलाती, मस्ती करती, कूलाचे भरती लहरे हमारे स्वागत के लिये तैयार थी।
रात में हम यहाँ आये थे तो इस हसीन, दिलकश, खूबसूरत दृश्य से वंचित रह गये थे। अब दिन में आकर सुकून हुआ कि जुहू सागर तट /बीच की रौनक/ सुन्दरता दिन मॆं ही है। दिन में सैकडों लोग मेले के रुप में यहाँ आनन्द उठा रहे है। बीच पर तो पूरा बाजार ही लगा हुआ है। यहाँ खाने-पीने की चटपटी वस्तुओं की कोई कमी नहीं थी। जामुन से लेकर चना मसाला, सैंड विच, तक यहाँ उपलब्ध है। यहाँ एक ऐसी पतंग देखी तो पैराशूट जैसी दिखाई दे रही थी। यदि इसका साइज थोडा और बडा हो और दूर छिप कर खडे हो इसे उडाया जाये तो देखने वाले अचम्भे में पड सकते है। एक बन्दा बीच की तेज हवा के सहारे हवाई जहाज उडाये हुए था। उसके जहाज प्लास्टिक के थे। मैंने एक हवाई जहाज ले लिया। बीच पूरा देख लिया तो विशाल भाई ने पहली बार खिलाया यहाँ का प्रसिद्ध काला खटटा पुन: खाने पहुँच गये। काला खटटा खाकर समौसे पर भी लगे हाथों सभी ने हाथ साफ कर दिये। अच्छा दोस्तों, चलते है हवाई अडडे की ओर।
जुहू बीच से मुम्बई हवाई अडडे की शार्ट कट यात्रा।
जुहू बीच से निपट कर बाहर सडक पर आये। इस ओर शिवाजी महाराज की तोप के साथ बनी बडी सी मूर्ति की ओर सडक पर आ निकले। जाते समय हम यहाँ से थोडा पहले उतरे थे। हवाई अडडे जाने के लिये एक ऑटो वाले को बोला तो उसने हमारी बोली समझते ही कहा यूपी वाले हो। हाँ भाई, मेरठ के है। मैं भी यू पी का हूँ। अच्छा भाई, कहाँ के हो? ऑटो वाले ने बताया कि मैं बरेली का रहने वाला हूँ। यहाँ मुम्बई में कब से हो? जी यहाँ तो दो साल से हूँ। जान-पहचान के बाद मुददे की बात पर आते है।
ऑटो चालक बोला, आपने हवाई अडडे के लिये आवाज दी थी। हाँ भाई, चलोगे ना, वो बोला, अब तो आप अपने पडौसी हो। आपसे क्या छुपाना? यदि आप यहाँ से हवाई अडडे के लिये कोई ऑटो या टैक्सी करके जाओगे तो उसे दिन के वन वे ट्रैफिक के चक्कर में बहुत लम्बा घूम कर जाना पडेगा। आप एक काम करे। मैं आपको हवाई अडडे के नजदीकी रेलवे स्टेशन सांताक्रूज की वेस्ट /पश्चिमी दिशा में छोड देता हूँ। वहाँ से आप पैदल पुल से रेलवे लाइन पार करके दूसरा ऑटो ले लेना। इससे क्या होगा? कुछ समझाओ भाई? इसका लाभ यह होगा कि आपको ये वाला मार्ग शार्टकट हो जायेगा। आपका समय व भाडा दोनों बचेगा।
रेलवे लाईन पार करने के लिये किसी भी वाहन को बहुत लम्बा घूम कर हवाई अडडे की ओर जाना पडता है। उसकी बात में दम था। हो भी क्यों ना? बन्दा रोज उन्ही सडकों पर गाडी जो चलाता है। ऑटो वाला हमें लोकल रेलवे स्टेशन छोड आया। वहाँ पैदल पुल से रेलवे लाइन पार करते समय याद आया कि यहाँ सांताक्रूज रेलवे स्टेशन तो मैं विशाल को लोकल ट्रेन में छोडने आया था। रेलवे लाईन पार की, उस पार जाते ही थोडा आगे जाने पर उल्टे हाथ वाली सडक हवाई अडडे की ओर जाती है। एक ऑटो में बैठकर हवाई अडडे पहुँच गये। इस बार हम केवल आधे घंटे से भी कम समय व 45 रु के खर्च में हवाई अडडे पहुँच गये।
 ठवाई अडडॆ से लोकल रेलवे स्टेशन तक कई चक्कर लग चुके थे इसलिये हवाई अडडा अब जाना-पहचाना हो चुका था। हवाई अडडे पहुँचकर टिकट काऊँटर पहुँचे। अपना टिकट कटवा कर सुरक्षा जाँच पूरी करवाते हुए हवाई अडडे के अन्दर प्रवॆश किया। सामान तो हमारे पास था ही नहीं, इसलिये लग ही नहीं रहा था कि हम यात्रा पर जा रहे है। ऐसा लग रहा था जैसे हम किसी को छोडने आये हो। इस बार भी खिडकी की सीट हथियाने के चक्कर में दो घंटे पहले आ गये थे। खिडकी की सीट का आनन्द ही अलग है। खिडकी चाहे ट्रैन की हो, रेल की हो या हवाई जहाज की, खिडकी की कीमत खिडकी वाला ही जानता है।
समय हुआ तो हमें अन्दर ले जाकर एक बस में बैठा दिया गया। बस हमें लेकर हवाई जहाज तक पहुँची। लगभग आधा किमी से ज्यादा ले जाने के बाद हमारा जहाज खडा मिला। हम हवाई जहाज में आज दूसरी बार सवार हो रहे है। क्या किस्मत है? या तो सालों तक हवाई जहाज में सवारी नहीं होती है, और होती है तो दिन में दो-दो हवाई जहाज की सवारी करके मंजिल पर पहुँचना मिलता है। सब किस्मत का खेल है यारों, कहते है ना, घुमक्कडी किस्मत में होती है तो कोई आपको घर नहीं बैठा सकता है।
मुम्बई से नई दिल्ली की हवाई यात्रा
मुम्बई से हमारा जहाज शाम साढे 6 बजे के करीब उड चला था। दिल्ली पहुँचते-पहुँचते रात के सवा 8 बज चुके थे। अंधेरा होते समय बादलों में सूर्य की लालिमा ने मन मोह लिया। बादल हवाई जहाज की खिडकी से ऐसे दिख रहे थे मानो हम नाव में चल रहे हो। सूर्य दूसरी तरफ डूब रहा था। इसलिये सूर्यास्त तो दिखाई नहीं दिया। जब जहाज मथुरा रिफाइनरी के ऊपर उड रहा था तो नीचे रिफाइनरी में फैली रोशनी व चिमनी की उगलती आग हवाई जहाज से साफ देखी जा सकती थी। आगे हरियाणा के फरीदाबाद, गुडगाँव के आसमान से तो नीचे बिजली की रोशनी से जगमगाते शहर बहुत सुन्दर दिख रहे थे। फोटो लेने की कोशिश की लेकिन फोटो में कुछ समझ नहीं आया।
मुम्बई से दिल्ली की हवाई यात्रा में कई बार ऐसे मौके आये जब खराब मौसम के कारण हमारा जहाज अचानक नीचे जाता महसूस हुआ। पेट की हवा निकल गयी। राजेश जी कुर्सी को जोर से पकड लेते थे। मुझे अच्छी तरह याद है दिल्ली के पालम हवाई अडडे पर उतरते ही राजेश जी बोले। कान पकडता हूँ अब कभी हवाई जहाज में नहीं बैठूँगा। ऐसा हर खतरनाक यात्रा में होता रहा है। हर यात्रा के बाद, यात्री जब घर लौटता है तो यही कहता है कि अब से घूमने नहीं जाऊँगा। लेकिन कुछ महीने बाद यात्रा कीडा फिर से काटने लगता है। आखिरकार पुराना डर भूल कर एक नई यात्रा का रोमांच महसूस करना ही जीवन है। जो डर गया वो अपने घर रह गया। जो कुछ खोजना चाहता है वो रोमांच महसूस कर ही लेता है।
आपने इतनी लम्बी यात्रा (19.06.2014 to 30.06.2014) में मुझे झेला दोस्तों, जो-जो भाई पूरी यात्रा पढ सके, उन सभी का धन्यवाद, अभी कई यात्रा लिखनी बाकि है। जैसे ही समय मिलेगा उन्हे भी लिखता रहूँगा। वैसे मन की कहूँ तो लिखने का मन नहीं करता, बहुत मेहनत करनी पडती है। कई-कई घंटे बैठ कर एक लेख तैयार होता है। इससे अच्छा तो तब तक मैं एक यात्रा ही कर आऊँ। आगे से कोशिश रहेगी कि कम से कम शब्दों में यात्रा निपटा दूँ। (समाप्त) (The end)
























1 टिप्पणी:

Jitender Mishra ने कहा…

Sir Aapki yatra Na ho to samay ka Pata nahi chalte

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