गुरुवार, 2 मार्च 2017

Travel plan Port Blair airport to Mumbai Via Chennai पोर्ट ब्लेयर से चैन्नई होते हुए मुम्बई की यात्रा



अंडमान व निकोबार की इस यात्रा में आपने अभी तक पोर्टब्लेयर का Chidiya Tapu, डिगलीपुर में अंडमान की सबसे ऊँची चोटी Saddle Peak, अंग्रेजों की क्रूरता की निशानी Cellular Jail, Haw lock island के सुन्दर तट और खूबसूरत Neil island, अंग्रेजों का मुख्यालय Ross island, Samudrika संग्रहालय, Mount harriet National Park, Wandoor Beach देखा। इस यात्रा को शुरु से पढना हो तो यहाँ माऊस से चटका लगाकर  सम्पूर्ण यात्रा वृतांत का आनन्द ले। इस लेख की यात्रा दिनांक 30-06-2014 को की गयी थी
JOGGERS PARK & PORT BLAIR TO MUMBAI via CHENNAI पोर्टब्लेयर का जॉगर्स पार्क व पोर्ट ब्लेयर से मुम्बई (वाया चैन्नई) की हवाई यात्रा जॉगर्स पार्क से दिखाई देता पूरा हवाई अड्डा

नया गाँव होटल की कहानी
वंडूर बीच से वापस लौटते समय पोर्टब्लेयर के घंटा घर के सामने से होकर आये थे। नया गाँव, पोर्टब्लेयर स्थित इस होटल में तीसरी बार ठहरे है। पहले दिन भी यहाँ आये थे। इसके बाद डिगलीपुर से आने के बाद भी यही ठहरे थे। तीन रात यहाँ बिताने के दौरान रात्रि का भोजन सिर्फ एक बार करने का मौका हाथ लगा। कही न कही से घूम-घाम कर आते थे तो पेट-पूजा करके ही आते थे। आज रात हम इसी होटल की छ्त पर चौथी मंजिल पर बने ओपन भोजनालय में भोजन करके आये है। भोजन बेहद लजीज/ स्वादिष्ट बनाया हुआ था। रात को समाचार देखने के चक्कर में देर से सोये। सुबह उठने की कोई जल्दी नहीं थी। आराम से सोकर उठे।
होटल में पानी की धार
आज हम होटल के सबसे नीचे वाली मंजिल पर ठहरे है। इस होटल में सबसे नीचे की मांजिल पर रात को हुई एक मजेदार घटना बतानी आवश्यक है। होटल चार मंजिला है। जिस कारण सबसे ऊपर रखी पानी की टंकी के कारण नीचे की मंजिलों पर पानी का जोरदार दबाब बनता है। मैंने नहाने के लिये फुव्वारा पूरा खोल दिया था। अचानक पैनी धार वाला पानी जब शरीर से टकराया तो ऐसा लगा, जैसे पानी में करंट हो। फुव्वारे की इतनी तीखी धार से पहली बार पाला पडा था। फुव्वारा धीमा करके नहाने में ही भलाई समझी।
नहा-धोकर चलने की तैयारी करने लगे। सुबह एक घंटे में हम तीनों तैयार होकर होटल के स्वागत कक्ष पहुँचे। हमारी अंडमान निकोबार (केन्द्र शासित प्रदॆश) के पोर्टब्लेयर व अन्य द्वीप समूह में की गयी इस 10 दिवसीय यात्रा का आज समापन आ चुका है। आज पोर्टब्लेयर से दिल्ली तक हवाई यात्रा करते हुए रात तक दिल्ली जा पहुँचेंगे। हवाई अड्डे के सामने बने जॉगर्स पार्क में दो घंटे बैठकर हवाई जहाजों के उडान भरते व उतरते समय के फोटो लेन के बाद हवाई अड्डे पहुँच जायेंगे। आज दोपहर में हमारी फलाइट है। जो हमें चैन्नई होते हुए मुम्बई ले जाकर छोडेगी। मुम्बई से दूसरी फ्लाईट में सवार होकर आज ही रात होते-होते दिल्ली पहुँचेंगे।
जॉगर्स पार्क से हवाई जहाज के उतरने व उडान भरने की कथा।
होटल से बाहर निकलते ही एक आटो पकडा। आटो ने हमें जॉगर्स पार्क छोड दिया। होटल से इसकी दूरी लगभग एक डेढ किमी ही होगी। पार्क एक पहाडी की ऊँची जगह पर बनाया हुआ है। पार्क की ऊँची जगह से हवाई अडडे का रनवे / हवाई पट्टी पूरी दिखाई देती है। इस पार्क में हम एक बार पहले भी दो घंटे बिता चुके है। पार्क ऊँचाई पर होने से यहाँ उतरने वाले व यहाँ से उडान भरने वाले जहाज एकदम साफ दिखाई देते है। पार्क की तरफ हवाई पट्टी पहाड की तलहटी में समाप्त हो जाती है। इस तरफ पहाड होने से जहाज उतरने व उडने की सम्भावना नहीं है। दूसरी तरफ हवाई पट्टी के बाद भी कुछ दूर तक खेत है खेतों के बाद समुन्द्र दिखाई देता है। इसलिये हवाई जहाज उतरने व उडान के लिये समुन्द्र वाला किनारा सुरक्षित है।
जॉगर्स पार्क में सुबह के समय बहुत सारे लोग घूमने व हवाई जहाज को देखने आये हुए थे। कुछ राजस्थानी महिलाएँ अपनी वेशभूषा में पार्क में भ्रमण कर रही थी। हमारे सामने दो जहाज आये और उडान भर कर चले गये। एक हैलीकाप्टर भी वहाँ उतरा था। हैलीकाप्टर सेना का था। पहली बार तसल्ली से बैठकर हवाई जहाज उडने-उतरने का आनन्द लिया जा रहा था। इससे पहले इस तरह पूरी हवाई पटटी का नजारा मुझे देखने को नहीं मिला था। उतरने व उडान भरते समय की एक वीडियो भी बनाई थी लेकिन उसका साइज बडा होने के कारण उसको यहाँ दिखाना सम्भव न हुआ।
हवाई अडडे का कार्यक्रम
पार्क में बैठे-बैठे दो घंटे हो गये थे। हमारी फ्लाइट का समय नजदीक आ गया है। चलो अब हवाई अड्डे चलते है। वहाँ भी दो घंटे लग जायेंगे। एक बार फिर एक आटो लिया। दो मिनट में आटो ने हमें हवाई अड्डे के प्रवेश द्वार पहुँचा दिया। हवाई अड्डे के प्रवेश द्वार पर तीनों ने एक-एक फोटो लेकर इस यादगार यात्रा के लिये पोर्टब्लेयर को अलविदा कहा। फिर कभी मौका लगा तो मैं एक बार फिर यहाँ सपरिवार आना चाहूँगा। यहाँ के भोले-भाले लोग सभ्य वाहन चालक और अच्छे होटल वालों को एक बार फिर आजमाना चाहूँगा। मुझे पूरी उम्मीद है कि ये सभी मेरी आशाओं पर एक बार फिर खरे उतरेंगे।
हवाई यात्रा में खिडकी वाली सीट का जुगाड कैसे करे
किसी भी हवाई अडडे में प्रवेश करने से पहले पहचान पत्र दिखाना आवश्यक होता है। बिना टिकट व बिना पहचान पत्र वालों की हवाई अडडे के अन्दर प्रवेश करने पर रोक है। सुरक्षा के हिसाब से यह अच्छा कदम है। अन्दर प्रवेश करते ही हम सीधे गो-एयर के काऊँटर पर पहुँचे। हमारी फ्लाईट में अभी दो घंटे का समय है। हवाई जहाज में जल्दी आने का लाभ यह होता है कि आपको मन-चाही सीट मिल जाती है। रेल या बस की तरह आपकी सीट का नम्बर पहले से तय नहीं होता है। मैंने यह बात पहली हवाई यात्रा दिल्ली से कश्मीर के श्रीनगर जाते व आते समय जान ली थी। इस बार भी इस सुविधा का लाभ लेते हुए हमने दो सीट खिडकी वाली ले ली।
हवाई जहाज पर पानी की बोतल व चाकू
टिकट लेते समय ही बडे बैग को हवाई यात्रा कराने वाली कम्पनी को सौपना पडता है। अपने साथ सिर्फ हल्का-फुल्का हैंड बैग ही ले जाया जा सकता है। हैंड बैग भी चैक होकर जाया जा सकता है। हैंड बैग में पानी की सील पैक बोतल ले जाने पर पाबंदी होती है यदि कोई भाई अपने साथ पानी की बोतल ले जाना चाहता है तो उसे सुरक्षा अधिकारी को उसमें से दो घूँट पानी पीकर दिखाना होता है। ऐसा कई बार देखने में आया है कि आतंक फैलाने वाले लोग पानी की बोतल में तेजाब जैसे ज्वलनशील, तरल पदार्थ भरकर ले आये थे। जिसका उन्होंने अन्य यात्रियों पर हमला कर दिया था। इन्ही घटनाओं से सबक लेकर ऐसा सब कुछ करना पडता है।
मेरे बडे वाले बैग में वही चाकू था जो मैंने नारियल काटने के लिये हैवलॉक द्वीप में लिया था। उसे मैंने अपने सेविंग के सामान वाले डिब्बे में रख दिया था। हैंड बैग में चाकू जैसा कोई पैना वस्तु पाया जाना आपके लिये समस्या खडी कर सकता है। बडे बैग भी मशीनों से स्कैन होकर ही हवाई जहाज में रखे जाते है। यदि किसी के बैग में कोई ज्वलशील पदार्थ बिन सूचना के रखा गया हो तो वह भी मुसीबत में पड सकता है। बता कर कोई रखेगा तो उसे तभी बाहर निकालने को बोल दिया जायेगा। श्रीनगर में तो लैपटॉप व कैमरे को ऑन करवा ही आगे जाने दिया जाता है। यदि किसी का कैमरा या लेपटॉप उसी वक्त खराब हुआ हो तो उसकी तो मुसीबत आ गयी, समझना चाहिए।
बडे बैग तो जमा हो गये है। छोटे बैग हमारे पास है। चलो दोस्तो, अब अगले चरण में प्रवेश करते है। अगले चरण में प्रवेश करते समय लाइन थोडी लम्बी है। एक-एक बन्दे को चैक करने के बाद ही आगे जाने दिया जा रहा है। कुछ देर में हमारा नम्बर भी आ गया। आज हवाई अडडे पर कुछ ऐसे यात्री दिखाई दे रहे थे जो हमने इस दस दिनी अंडमान यात्रा में कही न कही देखे थे। ऐसे ही एक जोडा जो कुछ ज्यादा बेशर्म हुआ जा रहा था। वो गुजरात से आया था। गुजरातन के हाव-भाव से लगता है जैसे पहली बार बाहर आयी हो। उसके पहनावे ने उसको तमाशा बना कर रख छोडा था। हवाई अडडा पर मौजूद अधिकतर सवारियाँ उसे ही देखे जा रही थी।
चूने की गुफा में हमारे साथ नाव की सवारी करने वाला एक परिवार भी यहाँ लाइन में लगा मिल गया। नील से हमारे वाले जहाज में लौटा एक जोडा भी यहाँ दिखाई दे रहा था। क्या बात है? लगता है, जैसे आज पूरा पोर्टब्लेयर खाली हो रहा हो। लाईन में खडे होते समय पता लगा कि आज मानसून के चलते इस सीजन की आखिरी फ्लाइट है। अगली फ्लाइट दो महीने बाद आरम्भ होंगी। निजी विमान कम्पनी ऑफ सीजन में दो महीने अपनी उडान बन्द कर देती है। जब यात्री ही नहीं होंगे तो घाटे में कौन चलाना चाहेगा? सरकारी विमानों की वात अलग है। उन्हे तो मौसम खुलते ही जाना पडता है। सरकार लाभ-घाटा नहीं देखती है। सरकार लोगों की भलाई का ख्याल देखती है।
एक घंटे पहले हम टिकट, सुरक्षा जांच, आदि सब कार्य से निपट कर प्रतीक्षालय में बैठ गये। उसी दौरान एयर इन्डिया का एक छोटा हवाई जहाज वहाँ उतरा। उसमें वहाँ के उपराज्यपाल महोदय आये थे। अन्य कुछ सवारियों को उतारने के बाद पोर्टब्लेयर से उसमें कुछ सवारियाँ सवार हुई। थोडी देर बाद वह जहाज अपनी मंजिल की ओर पुन: उड चला। थोडी देर में हमारा जहाज भी आ गया। सबके पास टिकट पर सीट नम्बर लिखे हुए थे। भागम-भाग मचाकर कौन सा रेल के जनरल डिब्बे की तरह सीट पर कब्जा जमाना था। इतना सब कुछ होने पर भी कुछ यात्री अत्यधिक उत्साही हो कर जल्दबाजी मचा ही देते है।
अलविदा अंडमान की धरती
जब लाइन हल्की हुई तो हम भी लाइन में लग गये। अपनी सीट पर जाकर बैठ गये। सभी सवारियों के सवार होते ही जहाज हमें लेकर चल दिया। हवाई पटटी को हम पार्क में बैठकर देख ही चुके थे। अब इसे हवाई जहाज के अन्दर से बैठकर दूसरी बार अनुभव भी कर रहे थे। जहाज पहले तो पार्क की ओर आखिरी कोने तक गया। पार्क की ओर से समुन्द्र की ओर मुडने के बाद हवाई जहाज पर उदघोषणा हुई कि सभी अपनी पेटी चैक कर ले। यदि किसी ने न बाँधी हो तो बाँध ले। सभी यात्री अपनी पेटी पहली घोषणा में ही बाँध चुके थे। अब जहाज उडने के लिये तेज गति से दौडेगा तो इस पल का मुझे बडा मजा आता है। जैसे ही जहाज के पायलट ने रेडी बोला तो मैं कैमरा लेकर अपनी खिडकी वाली सीट पर तैनात हो गया। जहाज अपनी फुल गति से दौडते हुए आकाश में उड गया। अलविदा अंडमान, फिर मिलेंगे। हमेशा याद रहेगा, अंडमान। 
पोर्टब्लेयर से चैन्नै के समुन्द्र के ऊपर यात्रा
हवाई जहाज के उडान भरने के बाद यात्रियों को पेटी खोलने को बोल दिया जाता है। पोर्टब्लेयर से चैन्नै की सीधी दूरी लगभग 1200 किमी है। हवाई जहाज को इसे तय करने में दो घंटे लग ही जाते है। इस दो घंटे की उडान में नीचे नीला समुन्द्र व कभी-कभी छुटपुट बादल देखकर ही समय बिताना पडता है। दो घंटे की उडान में सिर्फ दो-तीन बार समुन्द्र में पानी के जहाज जाते हुए दिखाई दिये। नीचे नीले समुन्द्र में जहाज देखकर अच्छा लगता था। चैन्नई नजदीक आते ही घोषणा हुई। एक बार फिर सबने अपनी पेटी बाँध ली। चैन्नै दिखने लगी है। हवाई जहाज से चैन्नई में बनी मैट्रो दिखाई दे रही है। जिस समय हमने यह यात्रा की थी उस समय तक चैन्नई में मैट्रो आरम्भ हो गयी थी। हमारा जहाज कुछ देर यहाँ रुकेगा। यहाँ कुछ सवारियाँ उतरेगी व कुछ नई सवारियाँ आगे मुम्बई के लिये आयेंगी।
चैन्नै से मुम्बई की हवाई यात्रा
चैन्नई का मरीना बीच आकाश से देखने का मौका दूसरी बार मिल रहा है। चैन्नई की भूमि पर पैर रखने का मौका एक बार भी नहीं मिला। हवाई जहाज के रुकते ही घोषणा हुई कि जो यात्री मुम्बई जा रहे है। वे अपनी सीट पर बैठे रहे। जो यात्री चैन्नई उतरेंगे वे अपना सामान ले जाना न भूले। थोडी देर में जिन यात्रियों को मद्रास उतरना था वो उतर गये तो उनकी जगह बोम्बे जाने वाले यात्री आ गये। हमारा जहाज एक बार फिर अपनी यात्रा पर उड चला। इस बार की यात्रा में समुन्द्र से पीछा छूट गया था। अबकी बार खेत, जंगल, पठार, नदी आदि नजारे आते-जाते दिख रहे थे। समुन्द्र वाली यात्रा में खिडकी का खास लाभ नहीं हुआ। अब खिडकी वाली सीट पर पूरा आनन्द आ रहा था।
आकाश से जमीन पर देखते समय ऐसा लगता है जैसे हम गुगल मैप पर सर्च कर रहे हो। बीच-बीच में कही कोई बडा बाँध या तालाब आता था तो वह अलग ही दिखता था। चैन्नई से मुम्बई पहुँचने में भी लगभग दो घंटे का समय ही लगा। पेटी खोलने बाँधने की प्रक्रिया यहाँ भी चलती रही। मुम्बई आने से पहले पठार एक बार फिर दिखने आरम्भ हो गये थे। थोडी देर में पायलट ने घोषणा की। हम मुम्बई पहुँचने वाले है। सभी अपनी पेटी बाँध ले। मुम्बई में हवाई अडडे पर हवाई पटटी से ठीक पहले हमारा जहाज झुग्गी झोपडी के ऊपर से होकर उतरता है। यहाँ लगता है जैसे हवाई जहाजों की सुरक्षा के साथ खिलवाड किया जा रहा है। झोपडी से कोई भी आतंकवादी आसानी से हवाई जहाज को उडा सकता है। चलो दोस्तों, मुम्बई आ गया है। यहाँ हम बोम्बे की जुहू चौपाटी घूमने जायेंगे। उसके बाद आज ही दिल्ली चले जायेंगे। (क्रमश:) (Continue)































3 टिप्‍पणियां:

Pankaj Sharma ने कहा…

bahut sundar yatra vritant. man prasann ho gaya. aise hi likhte rahein. Shubhkamna!

Pareevrajak Neeraj ने कहा…

badiya

stupid ने कहा…

पूरी यात्रा का मुकमल्ल और खूबसूरत तानाबाना अपने बड़े रूमानी तरीके से बयाँ किया। बड़ा सजीव और सहज लगा। गॉड ब्लेस्स यू।

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