मंगलवार, 25 फ़रवरी 2014

Gufha wale baba - kul devta and communal violence गुफ़ा वाले बाबा का मन्दिर व कुल देवता और साम्प्रदायिक दंगे

 इस यात्रा के दोनों लेख के लिंक नीचे दिये गये है।

01- गुफ़ा वाले बाबा का मन्दिर व कुल देवता और साम्प्रदायिक दंगे

02- पुरा महादेव मन्दिर व शादी समारोह के बाद घर वापसी

GUFHA WALA BABA TEMPLE AND PURA MAHADEV TEMPLE-01
आज 25-11-2013 की यात्रा बहुत ज्यादा लम्बी नहीं है। आज आपको अपने गाँव की यात्रा कराते है। दिल्ली व आसपास के अधिकतर लोगों के तार गाँव से जुड़े हुए है। अपनी जड़ भी उत्तर प्रदेश राज्य में मेरठ मण्ड़ल के अंतर्गत आने वाले बागपत जिले की एक तहसील बडौत कस्बे से यमुना नदी की ओर मात्र 15 किमी चलने पर मेरा गाँव आता है। आजकल लोग अपने पूर्वजों को याद नहीं करते। नकली देवी-देवताओं के पीछे जी जान से लगे लोग अधिक संख्या में देखने को मिलेंगे। अपने कुल में प्रत्येक अच्छे कार्य के शुभारम्भ से पहले कुल देवता के यहाँ हाजिरी लगाने की परम्परा रही है।



सबसे पहले बात परिवार की हो जाये। मेरे पिताजी अपने तीन भाइय़ों में सबसे छोटे थे। अपने परिवार से गाँव में रहने वाले छोटे ताऊजी ओमपाल सिंह गाँव शबगा में ही रह रहे है। बडे ताऊजी हरपाल सिंह दो साल पहले (may 2012) इस दुनिया को छोड अपने छोटे भाई के पास पहुँच चुके है। मेरे पिताजी सन 29-04-1997 में ही इस दुनिया को अलविदा कह गये थे। आजकल बडे ताऊजी का परिवार मध्यप्रदॆश के इन्दौर व खरगोन में निवास करता है। छोटे ताऊजी के परिवार से गाँव में मिलने के लिये वर्ष में दो-तीन बार मिलना हो ही जाता है। दीवाली के मौके पर तो कुल देवता को दिये जलाकर हाजिरी लगानी होती है।
इस दीवाली पर मुजफ़्फ़र नगर व बागपत जिले में चल रहे हिन्दू-मुस्लिम दंगों के कारण गाँव जाना नहीं हो पाया था। कथित हिन्दू नाम की जनता जातिवाद में बहुत बुरी तरह उलझी हुई है। हर बार की तरह अपने आप को दूध का धूला (दूसरों पर आरोप लगाने वाले) कहलाने वाले कथित धर्मनिरपेक्ष राजनीति दलों की फ़ूट ड़ालों शासन करो की गंदी राजनीति के भँवर में हिन्दुस्तान की पढी लिखी जनता, ऐसी उलझी है कि एक दूसरे की खून की प्यासी बन बैठी है।
धर्म कोई भी हो, सभी अपनी जगह सही है। लेकिन इन्हे मानने वाले जब खून खराबे पर उतर आते है तो यही धर्म बुरे दिखाई देने लगते है। यह दुनिया जब तक रहेगी, लोगों में आपसी झगड़े चलते रहेंगे। धर्म के ठेकेदार लोगों को आपस में लड़ाकर लाभ उठाते रहेगें। इन झगडों को राजनीति दलों ने जाट व मुस्लिम झगड़ा साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। जबकि जाट ऐसी बिरादरी है जो लगभग सभी धर्मों में पायी जाती है। हिन्दू-मुस्लिम-सिख-इसाई कोई भी धर्म हो जाट बिरादरी सभी में मिलती है। आज भारत में जितने भी मुस्लिम पाये जाते है उनके (अंधिकाश के) पूर्वज कथित हिन्दू धर्म के ही निकलते है। मुस्लिमों में जाट बहुत में है। फ़िर इन्हे अपने पूर्वजों से इतना बैर क्यों? इन्हे आपस में लड़ाने वाला कौन?
मेरी ससुराल बुढाना कस्बे के पास गाँव मोहम्मदपुर रायसिंह में अन्य गाँवों की तरह कुछ मुस्लिम परिवार कई पीढियों से रह रहे थे। दंगे शुरु होने पर अन्य गाँवों की तरह यहाँ से भी मुस्लिम लोग मुस्लिम बहुसंख्यक गाँव या कस्बे में अपने परिवार सहित चले गये। आज भी अधिकतर गाँवों से गये मुस्लिम लौट कर अपने गाँव वापिस नहीं आये है। सरकार की तरफ़ से काफ़ी भेदभाव किया गया। एक ही समुदाय पर ज्यादातर मुकदमें दायर किये गये। जबकि दोनों पक्षों में लगभग बराबर मौते हुई। सरकारी पक्षपात जानबूझ किया जाता है ताकि राजनेता अपनी रोटी सेक सके। गुटबाजी पैदा की जा सके।
दीवाली नवम्बर के पहले सप्ताह में थी। उस समय दंगे अपने चरम पर थे। इसलिये मैं गाँव नहीं जा पाया। नवम्बर 25 को मेरठ के नजदीक नेक गाँव में एक शादी में शामिल होना था इसलिये तय हुआ कि तभी गाँव भी हो आयेंगे। अपने पास सन 1999 से 2002 के मध्य एक वैन गाड़ी हुआ करती थी। उस दौरान मैंने यह देख लिया था कि चार पहिया गाड़ी अपने काम साल में सिर्फ़ 3-4 बार ही आती है। उस वैन की जरुरत महीने में मुश्किल से ही पड़ती थी। इसलिये मैंने अपनी वैन को चलता कर दिया था कि जा किसी दूसरे का भला कर। अब साल में 3-4 बार जब भी सपरिवार कही जाना होता है तो किराये की गाड़ी लेकर चला जाता हूँ। किराये की गाड़ी लेकर जाने में काफ़ी सुविधा रहती है। अपनी गाड़ी और किराये की गाड़ी में मुश्किल से 600-700 सौ रु का अन्तर आता है।
आज सुबह 7 बजे घर से तैयार होकर गाँव के लिये चल दिये। आगे वाली सीट पर अपुन ने कब्जा जमा लिया था। दोनों बच्चे चाहते थे कि उन्हे आगे वाली सीट पर बैठने का मौका लगे लेकिन बच्चे शैतान के उस्ताद है अत: उन्हे पीछे वाली सीट पर ही रहने दिया। माताजी और श्रीमति जी बच्चों के साथ ही बैठी हुई थी। आज जो गाड़ी किराये पर ली थी उसे मैंने 10 रु प्रति किमी की दर से तय किया हुआ था। आज पूरे दिन कुल मिलाकर 200-225 किमी गाड़ी चलने की उम्मीद थी।
गाड़ी में पीछे भी दो सीटे थी। मेरठ में रहने वाले छोटे भाई के घर सिलाई मशीन का स्टैन्ड पहुँचाना था। मशीन का स्टैन्ड़ पीछे वाली सीट पर रख दिया गया। गाड़ी में सवार होकर गाँव के लिये चल दिये। गाड़ी वाले को रात में ही कह दिया था कि गाड़ी में डीजल रात को भरवा लेना। लेकिन सुबह गाड़ी वाला जब गाड़ी लोनी की जगह लोनी डिपो की ओर मोड़ने लगा तो मैंने कहा, इधर कहाँ जा रहे हो? वह बोला डीजल भराने। इन किराये की गाड़ी वालों की यह आदत बहुत बुरी होती है। डीजल भराकर गाँव की ओर चल दिये। लोनी बार्ड़र से चलते ही लोनी कस्बे की दूरी मात्र 5 किमी है सुबह का समय होने के कारण लोनी आने में ज्यादा समय नहीं लगा।
लोनी कस्बे में गाजियाबाद/मोहनगर वाले मार्ग का तिराहा होने के कारण भीड़भाड़ रहती है। लोनी तिराहे से गाजियाबाद की दूरी 25 किमी है। लोनी रेलवे स्टेशन मात्र 2 किमी। दो-तीन मिनट के बाद लोनी तिराहे से आगे निकल पाये। लोनी तिराहे से आधा किमी चलते ही लोनी पुलिस थाना आता है मेरा शस्त्र लाईसेंस इसी थाने में दर्ज है। आगामी मई माह में शस्त्र लाइसेंस का नवीनीकरण कराने के लिये लोनी थाने में आना पडेगा। पिछली बार 2011 में यहाँ आना पड़ा था। आजकल लोनी तिराहे से आगे लोनी पुश्ते के बीच फ़्लाईओवर निर्माण कार्य प्रगति पर होने के कारण सड़क सिमट कर पतली गली सी बन गयी है। एक बार में केवल एक बस जाने लायक जगह मिल पाती है। बराबर से कोई बाइक वाला भी नहीं निकल सकता। 20 की गति से चलते रहे। कुछ देर में फ़्लाइओवर क्षेत्र पार कर गये।
लोनी पुश्ते से आगे ट्रोनिका सिटी नामक आवासीय व फ़ैक्ट्री इलाका आता है जिसे उत्तर प्रदेश सरकार ने योजना बद्द तरीके से बसाया हुआ है। यह जगह इतनी शानदार है कि इसके सामने दिल्ली की अच्छी से अच्छी आवासीय बस्ती भी फ़ीकी पड़ जाती है। यहाँ से आगे जाने पर मन्डौला गाँव आता है। कुछ वर्ष पहले तक लोनी के बाद मन्डौला गाँव में ही आबादी दिखायी देती थी। लेकिन आजकल मन्डौला से आगे भी आबादी ही दिखायी देती है। मन्डौला में सीधे हाथ एक पुराना पैट्रोल पम्प है। सामने ही मन्डौला बिजली ग्रिड़ है जहाँ से दिल्ली के बड़े हिस्से को बिजली सप्लाई होती है।
थोड़ा आगे चलने पर गाजियाबाद जिले की सीमा समाप्त हो जाती है। डून्ड़ाहेड़ा नामक जगह पर पुलिस का चैक पोस्ट है जहाँ वाहन चैकिंग के नाम पर अधिकतर अवैध उगाही का कार्य किया जाता है। ठीक इसी प्रकार की अवैध उगाही लोनी बार्डर पर दिल्ली पुलिस के चैक पोस्ट पर होती है। जिसे आप प्रतिदिन लाइव देख सकते है जिसका समय दोपहर बाद शुरु हो जाता है। चैक पोस्ट से आगे जाने पर सड़क के उल्टे हाथ एक नव निर्मित बालाजी मन्दिर दिखाई देता है। असली बालाजी तो राजस्थान में है। एल बालाजी तिरुपति में है जहाँ घन्टों लगते है। हमारे देश में एक कमी है कि पहले से जो मन्दिर बने है उनकी हालत तो सुधारते नहीं, खेती की जगह में नये-नये मन्दिर बनाते रहते है। सभी धर्मों के पूजा स्थलों में कमाई का बड़ा फ़ायदा है एक बार लगाना है उसके बाद तो कमाई ही कमाई है। परमात्मा तो एक ही है। लेकिन चालाक व धूर्त लोगों ने नये-नये धर्म बनाकर नये-नये देवता-भगवान अल्ला गोड़ आदि बना रखे है। असली तो एक ही है जिसके बारे में कोई नीं जानता।
इस मन्दिर से थोड़ा आगे जाने पर मसूरी नाम का गाँव आता है। जब मैं छोटा था तो यही सोचा करता था कि देहरादून तो एक ही है लेकिन मसूरी दो क्यों है? अब पता लग चुका है यह मसूरी है जबकि वह मंसूरी है। जिस सड़क से हम जा रहे है यह मार्ग यमुनौत्री हाईवे के नाम से जाना जाता है। यह मार्ग दिल्ली से शुरु होने के बाद लोनी, खेकड़ा, बागपत, बडौत, कांधला, शामली, थाना भवन, सहारनपुर, हर्बटपुर, विकासनगर, ड़ाकपत्थर, बड़कोट होते हुए यमुनौत्री तक चला जाता है।
आजकल इस मार्ग को 6 लेन चौड़ा करने का कार्य प्रगति पर चल रहा है। जिससे हमारी गाड़ी कभी उधर वाली सड़क पर तो कभी इधर वाली सड़क पर आती-जाती थी। सड़क बनाने वाले भी अजीब होते है। एक सड़क दूर तक सीधी नहीं बना सकते? आँख मिचौली वाला खेल खेलते रहते है। लगातार बढिया सड़क के बाद जब घटिया सड़क आती है तो लगता था जैसे स्वर्ग की सड़क छोड़ कर, नर्क की पगड़न्ड़ी पर आ पहुँचे है। खेकड़ा आ गया। सड़क की हालत ऐसी ही बनी रही।
खेकड़ा से बागपत तक सड़क काफ़ी अच्छी थी। यहाँ दोनों ओर की सड़क बन चुकी है। बागपत से मेरठ जाने वाली सड़क बहुत अच्छी बनी है इसे बने हुए कई साल हो गये है इस सड़क को देखकर लगता है कि इसे बनाने वाले ठेकेदार को नेताओं को कमीशन नहीं देना पड़ा होगा जिससे उसने पूरी लग्न/राशि से सड़क बनवायी है। एक अपनी सड़क है जिसे टूटे हुए कई साल बीत गये लेकिन इसे बनवाने की याद सिर्फ़ चुनावी वर्ष में ही आती है।
बागपत से आगे गौरीपुर मोड़ आता है। यहाँ से यमुना पुल पार कर हरियाणा के सोनीपत पहुँचा जा सकता था। इस मोड से आने वाले मार्ग पर कुछ वर्ष पहले एक शादी की बस में बैठ सोनीपत से घर वापिस आ रहा था। मैं उस बस की सबसे आगे वाली सीट पर बैठा था। बाहर भारी बारिश हो रही थी। एक मोड़ पर बस चालक बस से अपना संतुलन खो बैठा। चालक की गलती नहीं थी। चालक ने पहिया मोड़ दिया था। मोड़ पर कीचड़ होने से हमारी बस फ़िसलकर सूखे तालाब में कूद गयी थी। बस तालाब के अन्दर मौजूद पेड़ से ट्कराकर रुकते ही, बस में से कूदने वालों में रेस लग गयी थी। उस दुर्घटना में जान बाल-बाल बची थी। सबसे आगे बैठा होने के कारण मुझपर शीशे के टुकड़े जरुर गिरे थे।
सरुरपुर गाँव से 5 किमी पहले गुफ़ा वाले बाबा के नाम से एक मन्दिर आता है। गुफ़ा वाले बाबा के मन्दिर की इस क्षेत्र में बहुत मान्यता है। बताते है कि बहुत सालों पहले यहाँ पर एक साधु महात्मा रहा करते थे। उन महात्मा को आसपास के गाँव वाले बहुत मान सम्मान करते थे। बाबा एक कुटी में रहा करते थे। बताते है कि इस इलाके में एक मरखना (टक्कर मारने वाला) भैंसा था। एक बार वह भैंसा बाबा के सामने आ गया। जब उसने बाबा पर हमला कर दिया तो भैंसे की टक्कर से बाबा की हालत खराब हो गयी। बाबा ने अपने तप के बल से उस भैंसे को पत्थर का बना दिया। भैंसा पत्थर में बदल गया और जमीन में धंस गया। इस इलाके में कई-कई किमी तक बढिया जमीन है जिसमें पत्थर का छोटा सा टुकड़ा भी नहीं मिलता है। लेकिन जहाँ बाबा को भैंसे ने टक्कर मारी थी और बाबा ने भैंसे को पत्थर का बनाया था वहाँ आज भी भैंसे की पीठ जैसा दिखने वाला पत्थर मौजूद है। मैंने स्वयं वह पत्थर देखा हुआ है। भैंसे की टक्कर से लगी चोट से बाबा भी चल बसे।
गुफ़ा वाले बाबा की याद में मुख्य हाईवे से सटा हुआ एक मन्दिर/स्मारक बनाया गया है जहाँ पर होली व दीपावली के दिन बहुत भारी भीड़ होती है। एक बार दीवाली के दिन मैं यहाँ आ चुका हूँ। उस दिन यहाँ की भयंकर भीड़ देखकर मैंने कहा था कि होली दीवाली के अवसर पर यहाँ कभी भूलकर भी नहीं आऊँगा। उस दिन यहाँ देखा था कि फ़र्श पर पड़ा दूध जोरदार फ़िसलन का कारण बना हुआ था। जिस पर फ़िसलकर मैंने बिन पिये भांगड़ा कर ड़ाला था।
अपुन तो अलग किस्म के भक्त है अत: जब मैंने बाहर से मन्दिर को राम-राम किया तो श्रीमति बोली अन्दर नहीं जाओगे। ना, बच्चे व श्रीमति जी मन्दिर में प्रसाद चढाकर ही माने। मन्दिर के बाहर प्रसाद की बहुत सारी दुकाने है। जिनके सहारे बहुत सारे परिवार अपना रोजगार चला रहे है। एक धर्म स्थल बहुत सारे लोगों की आजीविका का सहारा बन जाता है। गुफ़ा वाले बाबा मन्दिर को पीछे छोड़ गाँव की ओर चल दिये।
बडौत पहुँचने के बाद गाँव जाने के दो मार्ग है एक मार्ग कौताना होकर जाता है तो दूसरा सोनोली व नंगला होकर जाता है। आज कोताना होकर जाने का विचार बनाया था। नंगला वाली सड़क काफ़ी बुरी अवस्था में है। बडौत से कोताना 10 किमी दूर है। कोताना के ठीक पीछे यमुना नदी बहती है। कोताना यमुना के मुकाबले कुछ ऊँचाई पर बसा हुआ है। यहाँ से मेरा गाँव शबगा मात्र 5 किमी रह जाता है। सामने यमुना नदी दिखायी दे रही है। मोबाइल में हरियाणा नेटवर्क भी पकड़ता रहता है।
गाँव के ठीक बाहर अपने कुल देवता का ठिकाना बना हुआ है। जब गाड़ी कुल देवता के सामने पहुँची तो गाड़ी से उतर कर पैदल चलना पड़ा। देवता तक पहुँचने के लिये 100-150 मी चकरोड़ पर चलना होता है। बुग्गी चलने लायक मार्ग को चकरोड़ कहा जाता है। बुग्गी के पहिये के बने निशान को लीक कहते है। खेतों में पानी ले जाने वाली नालियाँ खाल कहलाती है। नालियों की मेंढ को डोल कहते है। कुल देवता पर देशी घी का दिया जलाने की प्रथा है। कुल देवता की एक खासियत होती है कि यहाँ प्रसाद चढाते ही पक्षी उपस्थित हो जाते है। कहते है कि इन पक्षी के रुप में देवता हमारा चढाया गया प्रसाद ग्रहण करके चले जाते है।
कुल देवता के बाद गाँव में रहने वाले छोटे ताऊजी और अपने एकमात्र पारिवार से मिलने जा पहुँचे। आधा घन्टा रुकने के बाद ताऊजी व उनके परिवार को राम-राम बोल मेरठ के लिये चल दिये। हमारे गाँव में यमुना नदी बरसात के दिनों में गाँव के बाहर तक आ पहुँचती है। अबकी बार गाँव से बडौत आने के लिये नंगला - मलकपुर वाला मार्ग चुना गया। बडौत आने के बाद हमें मेरठ जाना था लेकिन बडौत से मेरठ जाने से पहले हमें नेक टिमकिया जाना था। एक मार्ग बिनौली-करनावल-रोहटा होकर मेरठ जाता है तो दूसरा मार्ग बडौत से सराय-पुरा महादेव-बालैनी होकर मेरठ जाता है।

मेरठ में रहने वाले छोटे भाई को फ़ोन कर पता लगाया कि बडौत से मेरठ जाने के लिये कौन सा मार्ग ठीक है। भाई ने बताया यदि सीधे मेरठ आना है तो बालैनी वाला ठीक है लेकिन तुम्हे तो बालैनी वाले मार्ग से आना ही पडेगा। बालैनी वाले मार्ग से नेक टिमकिया गाँव नजदीक पड़ता है। मैंने पुरा महादेव वाले मार्ग से मेरठ जाने का निर्णय किया। बडौत से रेलवे लाईन पार कर सराय-पुरा महादेव मन्दिर वाले मार्ग पर चल दिये। अगले लेख में आपको पुरा महादेव मन्दिर व शादी समारोह का विवरण बताया जायेगा। (यात्रा अगले में जारी है)




















3 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सब एक ख़ून होने के बाद भी एक दूसरे का ख़ून बहाने को उतारू हैं, सबको समझ आये और सब साथ साथ रहना सीखें।

Annapurna Bajpai ने कहा…

बहुत बढ़िया आलेख , इसको साझा करने के लिए आपका आभार ।

दर्शन कौर धनोय ने कहा…

ओ हो ! घूँघट में नई - नवेली ---

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