शुक्रवार, 20 दिसंबर 2013

Tabo to Dhankar Monastery, Spiti ताबो से धनकर मोनेस्ट्री

किन्नौर व लाहौल-स्पीति की बाइक यात्रा के सभी लेख के लिंक नीचे दिये है।
11- सतलुज व स्पीति के संगम (काजिंग) से नाको गाँव की झील तल
12- नाको गाँव की झील देखकर खतरनाक मलिंग नाला पार कर खरदांगपो तक
13- खरदांगपो से सुमडो (कौरिक बार्ड़र) के पास ममी वाले गियु गाँव तक (चीन की सीमा सिर्फ़ दो किमी) 
14- गियु में लामा की 500 वर्ष पुरानी ममी देखकर टाबो की मोनेस्ट्री तक
15- ताबो मोनेस्ट्री जो 1000 वर्ष पहले बनायी गयी थी।
16- ताबो से धनकर मोनेस्ट्री पहुँचने में कुदरत के एक से एक नजारे
17- धनकर गोम्पा (मठ) से काजा
18- की गोम्पा (मठ) व सड़क से जुड़ा दुनिया का सबसे ऊँचा किब्बर गाँव (अब नहीं रहा)
20- कुन्जुम दर्रे के पास (12 km) स्थित चन्द्रताल की बाइक व ट्रेकिंग यात्रा
21- चन्द्रताल मोड बातल से ग्रामफ़ू होकर रोहतांग दर्रे तक
22- रोहतांग दर्रे पर वेद व्यास कुन्ड़ जहां से व्यास नदी का आरम्भ होता है।
23- मनाली का वशिष्ट मन्दिर व गर्म पानी का स्रोत

KINNAUR, LAHUL SPITI, BIKE TRIP-16                                       SANDEEP PANWAR

ताबो मोनेस्ट्री सुबह के समय देखी जा सकती थी लेकिन चित्रकारी वाले कमरों में फ़ोटो लेनी पर रोक होने के कारण, हमारी रुचि ताबो मोनेस्ट्री स्थित चित्रकारी वाले कमरों को देखने में नहीं रह गयी थी। मोनेस्ट्री में चित्रकारी वाले कमरे सुबह 9 बजे के बाद बाहरी लोगों के लिये खोले जाते है। इस प्रकार ताबो से चित्रकारी देखने के बाद चलने में ही 10 बज जायेंगे। मैंने कह दिया, मुझे नहीं जाना मोनेस्ट्री देखने? स्पीति में आगे और बहुत सारी मोनेस्ट्री आयेंगी, उन्हे देख लेंगे। सामने वाले पहाड़ पर हिमालय की अजंता ऐलौरा वाली गुफ़ाएँ बतायी गयी थी। अब उन्हे भी छोड़ दिया गया। अगले साल एक बार फ़िर इस मार्ग पर अपनी यात्रा की सम्भावना है बचे कुचे स्थल उस यात्रा के लिये भी रहने चाहिए ना। यदि सब कुछ एक बार में ही देख लिया तो उसके बाद यहाँ घन्टा बजाने के लिये नहीं बचेगा। सामने वाले पहाड़ पर ऊपर की ओर तिब्बती भाषा में कुछ लिखा था, हमारे पल्ले नहीं पड़ा कि क्या लिखा था।

हम तीनों ने अपना सामान पैक किया भी नहीं था कि हैलीपेड़ पर स्थानीय लोगों का आवागमन भी शुरु हो गया। हैलीपेड़ के किनारे से खेतों में जाने का मार्ग बना हुआ था। जिससे होकर स्थानीय लोग आ-जा रहे थे। हैलीपेड़ स्पीति नदी के काफ़ी नजदीक था। रात भर स्पीति के पानी की आवाजे आती रही। ताबो से बाहर आये और हाइवे पर पहुँचते ही उल्टे हाथ मनाली की ओर चलने लगे। यदि सीधे हाथ मुड़ जाते तो वापिस शिमला की ओर चलने लगते। ताबो से एक किमी आगे जाने के बाद ताबो ब्रिज के नाम से लोहे का एक पुल दिखायी दिया। यह पुल जिस नदी/नाले पर बना है हो सकता है कि उसका नाम ताबो नाला/ नदी रखा गया हो। स्पष्ट स्थिति क्या है? हमें वहाँ कुछ पता नहीं लग पाया।

पुल के सामने बाइक रोककर फ़ोटो लिया और आगे चल दिये। पुल पार कर ही रहे थे कि पुल के नीचे ताजा और साफ़ पानी बहता हुआ दिखाई दिया। सुबह यह सोचकर बिना फ़्रेस हुए चले थे कि आगे जहाँ भी सड़क किनारे साफ़ पानी मिलेगा, वही जरुरी कार्य से निपटा जायेगा। पुल पार करते ही बाइक को नदी किनारे ले जाने का मार्ग देख लिया। बाइक नदी किनारे ले जाकर रोक दी। सबसे पहले यहाँ के फ़ोटो लिये गये, उसके बाद जरुरी कार्य पूर्ण किया गया। नदी का पानी बहुत ठन्ड़ा था। हाथ-मुँह धोने में नानी याद आ गयी। राकेश नदी का पानी देखते ही नहाने की बात करता था। मैंने राकेश को कहा, राकेश नहा कर चले। जाट भाई, मजाक तो नी कर रहे हो? हाथ मुँह धोने के बाद दोनों साथी भूख से निपटने के लिये सेब खाने लगे। उन्हे सेब खाते देख मैने सोचा कि जब तक ये सेब खाते है तब तक आगे की मंजिल पर पैदल निकल लिया जाये।

मैंने अपना रकसैक बैग कंधों पर लाद लिया। दोनों को वही छोड़कर पैदल ही काजा की ओर चलने लगा। मैं अभी 300-400 मीटर ही गया था कि सड़क किनारे ऊल्टे हाथ की ओर सेब का बगीचा दिखायी दिया। मन किया कि एक सेब तोड़ कर स्पीति घाटी के सेबों का स्वाद चखा जाये। आखिर हमें भी पता लगे कि ताबो का सेब कितना रसीला है? पूह में हमें किसी ने बताया था कि काजा की ओर जाने पर सेब में मिठास बढती जाती है। सेब के बाग और सड़क के बीच एक दीवार थी जो पत्थरों को एक दूसरे के ऊपर टिका कर बनायी हुई थी। इस दीवार की हालत ऐसी थी कि यदि इसके ऊपर से होकर बाग के अन्दर जाने की कोशिश की जायेगी तो यह ढह सकती है। अंगूर खटटे है, वाली बात अमल करना मेरे लिये ठीक था। बिना सेब लिये (खटटे सेब छोड़) मैं आगे चल दिया। हिमालय के शीत मरुस्थल कहे जाने वाले इस इलाकी में पैदल चलने का अलग अनुभव रहा। उन दोनों का कुछ पता नहीं था, तब तक मैं 1 किमी आगे निकल चुका था।

पैदल चलते हुए मैंने देखा कि सीधे हाथ एकदम कच्चा पहाड़ है। बाइक पर होते तो शायद यहाँ रुकते भी नहीं। मैं वही खड़ा हो गया। कुछ देर बाद दोनों बाइके भी आ गयी। मैंने उनको इशारे से ऊपर वाला कच्चा पहाड़ दिखाया। राकेश बाइक से उतरकर कच्चे पहाड़ पर चढने की कोशिश करने लगा। राकेश जितना ऊपर जाता, खिसक कर उसका आधा नीचे आ जाता था। कई बाद कोशिश करने पर भी राकेश ज्यादा ऊपर नहीं पहुँच पाया। वही से राकेश का फ़ोटो लेकर, अपनी बाइक पर सवार हो गये।

स्पीति किनारे कटिंग वाले पहाड़ तो हर मोड़ के बाद गजब नजारे दिखायी देने आरम्भ हो गये। हमारी बाइक हर कुछ मीटर पर रुकने लगी। सड़क किनारे ढहने वाले स्टाइल में खड़े इन मिसाइल नुमा पहाडों को देखकर रोमांचक यात्रा का पूरा लुत्फ़ उठाया जा रहा था। प्रत्येक मोड़ से आने से पहले ही सोचने लगते कि आगे कैसा नजारा आने वाला है? एक मोड़ पर मजेदार नजारा दिखाई दिया। जिसमें देखने से ऐसा लगता था कि किसी ने जानबूझ कर पहाड़ को काटा हो, हम इस उम्मीद में आगे निकल गये कि पहाड़ पर कुदरत की ऐसी कारीगरी आगे भी मिलेगी, लेकिन अफ़सोस नहीं मिली। उसके फ़ोटो हमने लिये ही नहीं।

सुबह से चलते हुए काफ़ी देर हो चुकी थी। सूर्य महाराज अपनी गरमी दिखाने लगे थे। अब उतराई चल रही थी। साईकिल पर सामने से एक बन्दा आता हुआ दिखाई दिया। उसके लिये चढाई समस्या बन गयी थी। गियर वाली साईकिल में पहले गियर के बावजूद उसके सारे जोर लग चुके थे। हम नदी के फ़ोटो लेने के लिये रुके हुए थे। इससे बढिया तो वह पैदल चढाई कर लेता। कम से कम इतनी दिक्कत तो ना होती? हमें उसके साथ कोई वार्तालाप करने की आवश्यकता नहीं थी। उसकी दिशा अलग था हमारी दिशा अलग।

थोड़ा आगे चलने के बाद उतराई समाप्त हो गयी थी समतल भूमि थोड़ी देर रही। यहाँ हमें एक विदेशी भी मिला। हमने इस विदेशी से के साथ बातचीत किये बिना, आगे निकल गये थे। हमें बाद में मनु ने बताया कि मैं उस विदेशी के साथ बातचीत करके आया हूँ। वह साईकिल से भारत भ्रमण में लगा हुआ है। मनु को उसने बताया कि वह फ़्रांस का रहने वाला है और एक साल से भारत में घूम रहा है। एक साल से साईकिल पर अन्जान देश में अकेले घूमना जहाँ उसकी भाषा जानने वाले भी कम ही मिलने वाले है, काबिले तारीफ़ कार्य है। सिचलिंग गाँव से पहले सड़क किनारे बने यात्री प्रतीक्षालय में यह विदेशी ठहरा था।

धनकर गोम्पा की ताबो से दूरी 31 किमी है। आगे चलने पर सिचलिंग नाम का एक गाँव जैसा आता है। यहाँ से धनकर गोम्पा सामने दिखाई देता है। ताबो से 22 किमी जाने के बाद सिचलिंग गाँव से आगे धनकर जाने वाला लिंक आता है। सिचलिंग गाँव में चाय की एक दुकान थी यहाँ पर अपने दोनों शेरों (बाइक चलाने में किसी के कम नहीं) ने चाय वाला टानिक पिया था। अपने शेरों को खुराख मिलती रहनी चाहिए। इन्जन में तेल जायेगा तो काम होगा ना। अपना इन्जन दूजी किस्म का है जो खाता कम है। लेकिन जब खाता है जमकर खाता है।

जब तक दोनों साथियों ने चाय पी मैंने एक सेब का काम तमाम कर ड़ाला। मुझे सेब खाते देख एक स्थानीय भूखा कुत्ता वहाँ आ गया। मैंने उसे थोड़ा सा सेब ड़ालकर देखा तो उसने खा लिया। मैंने अपने बैग से एक सेब निकाल कर उस स्वान को दे दिया। वह मेरे हाथ से सेब लेकर वही बैठकर खाने लगा। कुत्ते को सेब खाते मैं आश्चर्य चकित था। चाय की दुकान पर बिस्कुट उपलब्ध नहीं थे। यहाँ मनु/ राकेश बिस्कुट लेने के लिये दूसरी दुकान पर गया था। चाय और सेब खाकर अच्छा नाश्ता हो गया था। सिचलिंग गाँव में भी एक गोम्पा बताया गया है। जिसका नाम न्यू धनकर गोम्पा है।

सिचलिंग से पार करते ही शुरु होने वाले लिंक मार्ग की धनकर गोम्पा/ मठ तक कुल 8-9 किमी की चढाई आरम्भ हो जाती है। सिचलिंग गाँव से आगे जाने पर लिंक मार्ग मुख्य मार्ग से अलग हो जाता है थोडी देर समतल भूमि पर चलने के बाद चढाई शुरु होते ही दे दनादन 14 लूप है। आगे चढाई थी मनु को आगे जाने दिया था। मनु की बाइक ऐसी तीखी चढाई पर मुश्किल से चढ पाती थी। मनु के जाने के कुछ देर बाद हम भी धनकर के लिये चल दिये।

आगे लूप समाप्त भी नहीं हुए थे कि दौराहा मिल गया। यहाँ हमारे लिये असमंजस की स्थित थी कि मनु कौन से मार्ग पर गया होगा? एक दो मिनट सोचते रहे, तभी मनु ऊपर वाले मार्ग पर जाता हुआ दिखायी दिया। हम मनु के पीछे लग गये। लूप समाप्त हुए भी नहीं थे कि धनकर गोम्पा की पहली झलक दिखायी दी। गोम्पा हमारे सामने था लेकिन दूरी का हिसाब लगाये तो गोम्पा अभी भी 2 किमी दूर बचा था। हम इस सड़क पर चलते रहे। आखिरकार धनकर गाँव के ऊपरी हिस्से में हमारा आगमन हुआ।

धनकर गोम्पा तक पहुँचने से पहले कुदरत का नायाब नमूना हमारे सामने था। मिसाइल की तरह शंकु आकार मिट्टी के बहुत सारे ढेर हमारी आँखों के सामने थे। मैंने राकेश से कहा देख भाई, मिटटी की मिसाइल बड़ी ड़रावनी लग रही है। इनके सामने से बाइक तेजी से निकालना, कही पता लगे कि ये सारे हमारे ऊपर लुढके हुए है। जब हम इन मिसाइल के बीच पहुँचे तो मैं राकेश से कहा, राकेश बाइक रोक ले, इनका फ़ोटो भी तो लेना है। गिर गये तो देखी जायेगी।

अगले लेख में धनकर गोम्पा देखकर काजा का की गोम्पा मठ (किब्बर वाला) तक की यात्रा के बारे में बताया जायेगा। धनकर गोम्पा से काजा की दूरी 34 किमी बाकि थी। की गोम्पा के बाद किब्बर गाँव देखने जायेंगे। जिसे एशिया का सबसे अधिक ऊँचाई पर स्थित सड़क मार्ग से जुड़ा गाँव होने की मान्यता थी। वापसी में स्पीति व पिन नदी का संगम दिखते हुए आगे जायेंगे। (यात्रा अभी जारी है।)



















8 टिप्‍पणियां:

SACHIN TYAGI ने कहा…

जाटभाई की जय, भाई पुरे मजे ले रहे हो इस यात्रा के चलो अच्छा है आपके बहाने हम भी घुम रहे ही है इन जगहो पर.

Ajay Kumar ने कहा…

BHAI JI,, apka kaun sa engine hai DIESEL ENGINE......... or photo mein JATDEVTA likhna kyo band kar diya?????????

राजीव कुमार झा ने कहा…

रोमांचक यात्रा विवरण.

राजीव कुमार झा ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (21-12-2013) "हर टुकड़े में चांद" : चर्चा मंच : चर्चा अंक : 1468 पर होगी.
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है.
सादर...!

o.p.laddha ने कहा…

जाट भाई आपकी हिम्मत की तो दाद देना पड़ेगी क्योंकि इतने दुरूह स्थानोंपर बाइक से जाना बहुत ही मुश्किल काम है और आपने इसे बहुत ही खूबसूरती से निभाया है। आपके लेख की जान तो असल में आप द्वारा लिए गए सुन्दर फोटो ही है जो बहुत कुछ कह जाते है। उत्तम लेख के लिए बधाई।


Vaanbhatt ने कहा…

लोमहर्षक यात्रा...

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

बड़ी ही रोचक व साहसिक यात्रा है आपकी।

दर्शन कौर धनोय ने कहा…

बहुत ही सुंदर फोटू है --और हमेशा ध्यान रखो कि जो फोटू २ -३ बार लगा चुके हो वो कम लगाओ --जैसे कि पुल के फोटू ?
इसके बदले में वो फोटू लगाओ जो हमने देखे न हो और जिन बातों को लिखते हो उनके ज्यादा से ज्यादा फोटू लगाया करो ?
ये पहाड़ क्या हवा से इस तरह कि आकृति के बन गए है या कुछ और कारण है ?

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