शनिवार, 19 अक्तूबर 2013

Parwati kund to Kinner Kailash rock पार्वती कुन्ड से किन्नर कैलाश शिवलिंग/शिला तक

किन्नर कैलाश यात्रा के सभी लेख के लिंक नीचे दिये गये है।

KINNER KAILASH TREKKING-06                                         SANDEEP PANWAR
गौरी/पार्वती कुन्ड़ में नहाने की बात सुनते ही राकेश अपना तकिया कलाम बोला “मजाक तो नी कर रहे हो।“ मैंने कहा, “नहीं राकेश भाई मैं मजाक नहीं कर रहा हूँ देखो सूरज महाराज भी निकले हुए है।“ एक मिनट भी नहाने में नहीं लगेगा क्योंकि पानी कितना ठन्ड़ा है यह तो तुम देख ही चुके हो। फ़टाफ़ट गोली की रफ़तार से पानी में घुसना और मिसाईल की रफ़तार से बाहर निकल आना। राकेश बोला जाट भाई वो देखना उधर क्या लिखा है? राकेश की बतायी दिशा में देखा तो नहाने के अरमान समाप्त हो गये। वहाँ लिखा था पार्वती कुन्ड़ में स्नान करना सख्त मना है। मैं भले ही अधिकतर पुजारी व भिखारी को अच्छा नहीं मानता हूँ लेकिन अच्छी बात पर हमेशा अमल करता हूँ वहाँ लिखा था कृपया पार्वती कुन्ड़ की पवित्रता बनाये रखने में सहयोग करे, यहाँ स्नान ना करे। जब हम जैसे घुमक्कड़ ही ऐसी कुदरती स्थलों पर गन्दगी फ़ैलायेंगे तो आम लोगों को कैसे रोक पायेंगे? इसलिये मैंने स्नान करने की इच्छा पर वही विराम लगा दिया। कोई बात नहीं, यहाँ ना सही, नीचे किसी नदी पहाड़ी नाले के स्वच्छ जल में स्नान कर अपनी स्नान की भूख मिटा लेंगे।






कुछ देर वही कुन्ड़ किनारे एक ढ़ंग के पत्थर पर बैठकर कुछ देर तक विश्राम करते रहे। तब तक रामपुर वाले बन्दे भी पार्वती कुन्ड़ तक पहुँचने शुरु हो गये थे। रामपुर वालों की टोली में सभी ने गांजे/भाँग जैसा किसी पदार्थ का नशा किया हुआ था। जैसे ही इनमें से पहले दो बन्दे पार्वती कुन्ड़ के पास पहुँचे तो पानी भरने के लिये अपनी बोतले लेकर कुन्ड़ के किनारे पहुँच गये। किनारे जाते ही उनमें से एक बन्दे ने नहाने के इरादे से अपने पूरे कपड़े उतार दिये है। वह बन्दा सम्पूर्ण नग्न होकर पार्वती कुन्ड़ में घुस गया। मुझे इस बन्दे पर बहुत गुस्सा आया था लेकिन एक बार मना करने पर वह नहीं माना तो दुबारा मैंने उसे नहीं रोका। उनको वही नहाते छोड़कर मैं और राकेश आगे किन्नर कैलाश शिवलिंग की अपनी मंजिल की ओर चल दिये। रामपुर वाले बन्दे कुन्ड़ से कितनी देर बाद वहाँ से आगे चले मुझे नहीं पता।

पार्वती कुन्ड़ के चारो ओर बड़े-बड़े पत्थर बिखरे हुए है, इन्ही विशाल कई-कई फ़ुट ऊँचे पत्थरों के बीच से होकर हम आगे बढते रहे। यहाँ से आगे कुछ दूरी तक निशान के रुप में बनाये जाने वाले छोटे पत्थर रखे हुए दिखायी ही नहीं दिये जिससे हम सीधे चलते रहे। यहाँ पत्थरों की कालोनी में कुछ जगह तो इतने बड़े-बड़े पत्थर थे कि अगले पत्थर तक पहुँचने के लिये पहले वाले पत्थर से नीचे कूदना पड़ता था फ़िर अगले पत्थर पर चढ़ने के लिये दोनों हाथों के सहारे उस पर आरोहण किया जाता था। कई बार तो बड़े-बड़े पत्थरों के बीच से खुद को हाथों के सहारे झूलाते हुए आगे बढ़ते जाते थे। आगे चलते हुए एक बार ऐसी जगह पहुँच गया कि वहाँ से आगे जाने का मार्ग ही नहीं सूझा तो मैने राकेश से कहा, राकेश भाई अब ऊपर की तरफ़ चले या नीचे की तरफ़। हमने ऊपर यानि उल्टे हाथ की दिशा में मुड़कर सामने वाले पत्थरों पर चढ़ना शुरु किया। यहाँ चढ़ने के बाद हमें आगे बढ़ने के लिये मार्ग मिल गया था। हम धीरे-धीरे लेकिन बेहद ही सावधानी व संयम से उन पत्थरों से होकर आगे बढ़ते रहे।

 आगे चलते रहने पर एक बुजुर्ग हमें दिखायी दिये। जब हम आगे जा रहे थे तो यह बुजुर्ग हमारी ओर आते दिखायी दे रहे थे लेकिन जब हम इनके पास पहुँचे तो यह हमारे से आगे-आगे चलने लगे। मैंने सोचा कि हो सकता है कि बाबा जी आगे अकेले जाने से हिचक रहे हो, जब हम दिखायी दिये तो उनकी हिम्मत बंधी और वह हमसे आगे-आगे चलने लगे। मुझसे रहा नहीं गया मैंने बाबा जी से पूछ ही लिया कि बाबा जी अभी मैंने आपको वापिस आते हुए देखा था अब आप फ़िर से आगे चलने लगे। आखिर क्या बात है? बाबा जी बोले कि मैं रात भर इन्ही पत्थरों में अटका रहा। मैं कल ही किन्नर कैलाश के दर्शन कर लेता लेकिन मैं मार्ग भटक गया था। अब आप दिखायी दिये तो मेरी हिम्मत बंधी है। लेकिन ऊपर तक का मार्ग तो हमें भी नहीं मालूम है क्योंकि मैं भी पहली बार जा रहा हूँ। पीछे-पीछे रामपुर वाले बन्दे आ रहे है उनमें से दो-तीन बन्दे पहले भी यहाँ आ चुके है। हम अभी तो आगे चलते है यदि हमें मार्ग भटकने की नौबत आयेगी तो रामपुर वालों का सहयोग मिल जायेगा।

पत्थरों की यह विशाल खाई श्रीखन्ड़ के पत्थरों की याद दिला रही थी। यहाँ के पत्थर काफ़ी बड़े है जबकि श्रीखन्ड़ वाले पत्थर काफ़ी छोटे-छोटे से थे, लेकिन बड़े पत्थर होने से यहाँ भटकने की काफ़ी ज्यादा आशंका बनी रहती है क्योंकि यहाँ पर पेन्ट आदि से लगाया गया निशान, कभी-कभार आधे-पौने घन्टे में ही दिखायी देता है। हम जिस विशाल खाई के उल्टे किनारे पर चल रहे थे उसके सीधे किनारे पर ढेर सारी बर्फ़ दिखायी दे रही थी। उस बर्फ़ पर पहाड़ के ऊपर से बड़े-बड़े पत्थर लुढक कर कभी-कभार आते रहते थे जिससे उस सुनसान बियाबान इलाके में पत्थर टूटने की भयंकर आवाज बड़ी ड़रावनी लगती थी। जिन बड़े पत्थरों के बीच से होकर हम आगे जा रहे थे उनमें पत्थर टूटकर गिरने का खतरा नहीं था। यदि हमें उन पत्थरों के बीच से पत्थर टूटने की कोई आवाज आती तो हम झट से किसी पत्थर की ओट में बैठने के लिये पहले से ही चौकन्ने थे।

आगे जाने पर एक जगह मार्ग भूलभूलैया की तरह अटकाने वाला मिल गया। यहाँ उल्टे हाथ पर एक विशाल चट्टान से आगे जाने के बारे में या ऊपर जाने का स्पस्ट संकेत नहीं दिखाई दिया। यहाँ दो तरह की मुश्किल थी कि यदि हम ऊपर देखते थे तो वहाँ पत्थर ही पत्थर दिखायी देते थे। यह स्थान श्रीखन्ड़ के नैन सरोवर से आगे मिलने वाली तीखी पहाड़ी का भी परदादा है। मुझे चढ़ाई से ड़र तो नहीं लगता है लेकिन सच्ची बात यह भी है कि चढ़ाई को देखकर एक बार गला तो सूखता ही है। फ़िर गले को गीला करने के लिये भले ही बोतल का एक घूंट पानी कम करना पड़ता हो। यहाँ जिस लम्बी खाई में चलते हुए हमें घन्टा भर हो गया था उस खाई में एकदम आखिर में ठीक सामने एक दर्रा जैसा दिख रहा था। मैं अब तक यही सोच रहा था कि हमें वो सामने वाला दर्रा पार कर अगले पहाड़ पर जाना है। लेकिन अनुभव भी बड़ी काम की चीज है। मैंने और राकेश ने आगे के सही मार्ग का फ़ैसला करने के लिये कुछ समय अवश्य लिया था लेकिन आखिरकार मुझे अपने 22 साल के पहाड़ी घुमक्कड़ी यात्रा का अनुभव यहाँ आगे का सही मार्ग तय करने में मिला।

जिस बड़ी विशाल चट्टान के नीचे हम खड़े थे वहाँ से देखने पर आगे की मार्ग की कोई सुध-बुध दिखायी नहीं देती थी। इसलिये तय हुआ कि सामने दिख रहे पत्थरों पर दूर तक भी निशान बनाये जाने के पत्थर रखे हुए नहीं है। हो सकता है कि यहाँ 100 मीटर दूरी तक पत्थर छोटे है इसलिये निशान बनाने वाले पत्थर सर्दी में बर्फ़बारी के कारण गिर गये होंगे। आगे कुछ दूर तक जाकर देखा जाये। लेकिन आगे बढ़ने से पहले उल्टे हाथ कुछ दूर ऊपर की दिशा में भी मार्ग की सम्भावना की खोज पहले की जाये। कही पता लगे कि हम असली मार्ग छोड़कर किसी और इलाके में भटकते फ़िर रहे है। हम अभी कम से कम 17000 फ़ुट ऊँचाई के आसपास खड़े थे।

पहले ऊपर वाली दिशा में जाने का फ़ैसला हुआ। यह फ़ैसला एकदम सही साबित हुआ था क्योंकि यहाँ दो-तीन बड़े पत्थरों से आगे निकलते ही एक तीर का निशान दिखायी दिया जो बता रहा था कि इसी सामने वाली तीखी पथरीली धार पर चढ़ते चले जाना है। यहाँ से थोड़ा सा और आगे बढ़ते ही हमें लोगों के आने-जाने से एकत्र हुए छोटे-छोटे पत्थर व मिट्टी का ढेर दिखायी दिया। ऐसा ढेर हर उस मोड़ पर मिलता है जहाँ ऊपर से आता हुआ कोई पगड़न्ड़ी नुमा मार्ग मूड़ने के बाद आगे निकल जाता है। इस पथरीली लेकिन भयंकर चढ़ाई पर चढ़ने में बहुत आनन्द आया था। मुझे ऐसी ही चढ़ाई पर मजा आता है। इस चढाई पर मेरी हालत भी उस समय देखने लायक रही होगी क्योंकि राकेश ने मुझे कई बार कहा था जाट भाई ठीक तो हो ना? मुझे लगता था कि राकेश अपना तकिया कलाम यह ना कह दे कि जाट भाई मजाक तो नी कर रहे हो?

ऐसी भयंकर स्थिति में मैं मजाक नहीं किया करता हूँ। हम पत्थरों की ऐसी खतरनाक जगह में से होकर ऊपर जा रहे थे यदि उस समय वहाँ उपर से कोई पत्थर नीचे की ओर आने लगता तो फ़िर ऊपर वाला परमात्मा ही जानता कि क्या होता? यहाँ इस तीखी पथरीली ढ़लान के बीच में हमें ऊपर से आते कई बन्दे मिले ये वही लोग थे जो सुबह हमने गुफ़ा में देखे थे। मैंने उनसे पूछा कि अभी कितना बचा है उनका जवाब था कि बस आधा-पौना घन्टा और लगेगा। बस आधा-पौना घन्टा, इतनी विकट परिस्थिति में आधा घन्टा तो बीच में साँस लेने के लिये रुकने में लगना था। मैं समझ गया कि अभी एक घन्टे से ज्यादा समय लगने वाला है। इस तीखी ढ़लान में बुजुर्ग बाबा जी हमारे पीछे-पीछे ही लगे हुए थे। बाबाजी की उम्र कम से कम 65-70 साल तो रही ही होगी। राकेश 27 साल का व मैं 37 साल का। उन्हे ऊपर जाते हुए देखते हुए मुझे सोचने को विवश किया कि इन्सान अगर चाहे तो किसी भी उम्र में क्या कुछ नहीं कर सकता है।

इसी तीखी पथरीली धार वाली भीषण चढ़ाई में एक जगह ऐसी आई कि हमारे सामने एक ऐसा बड़ा पत्थर आ गया, जिसको आगे चल रहे राकेश को उसे पार करना मुश्किल हो गया। राकेश ने दो कोशिश की भी, दोनोंबार लेकिन असफ़ल रहा। तभी साथ चल रहे बाबा जी ने सुझाया कि वो देखो बराबर में बड़े पत्थर के नीचे से लेटकर निकलने लायक सुरंग नुमा मार्ग है। सबसे पहले बाबाजी उस बड़े पत्थर के नीचे से लेटकर सरकते हुए निकल गये। बाबाजी के बाद राकेश भी लेटते हुए उस पत्थर के पार निकल गया। अब तक रामपुर वाले बन्दों में से तेज चलने वाले दो बन्दे भी हमारे पास आ पहुँचे थे। यहाँ मैंने रामपुर वाले बन्दे का उस पत्थर पर चढते हुए फ़ोटो ले लिया था जहाँ राकेश व बाबा जी अटक गये थे। मैंने भी इसी पत्थर से होकर ऊपर चढ़ना चाहा, चूंकि राकेश यहाँ नाकाम हो चुका था इसलिये मेरे मन में यह ड़र था कि अगर मैं यहाँ से गिरा तो मुझे उठाकर एक तरफ़ बैठाने के लिये अब कोई भी नहीं है इसलिये मैंने अत्यधिक सावधानी व अनुभव से यह पत्थर कसकर पकड़ा और सीधा इसके ऊपर पहुँच गया। इस पत्थर पर चढ़ते समय मेरा अनुभव बता रहा था कि ऐसी जगह जगह हाथों की ग्रिप जरा भी ढीली नहीं होनी चाहिए।

यहाँ से ऊपर जाने के बाद मैंने देखा कि राकेश व बाबा जी अभी तक ऊपर नहीं आये है। मैंने आवाज लगायी तो राकेश बोला आ रहा हूँ जाट भाई, अरे तुम अभी तक ऊपर नहीं आये। इस जगह से आगे जाने के बाद हमे एक राजस्थानी पति-पत्नी का जोड़ा मिला। उन्होंने हमें बताया कि बस यह तीखी पथरीली धार 100 मीटर बाद समाप्त हो जायेगी। शुक्र रहा कि थोड़ी देर बाद वह पथरीली धार समाप्त हो गयी। धार समाप्त होने के बाद एक समस्या आ गयी कि जैसे ही हम इस धार के शीर्ष पर पहुँचे तो वहाँ हमें जोरदार ठन्ड़ी हवा ने तंग करना आरम्भ कर दिया। इस धार के दूसरी ओर दिखायी देने वाली घाटी रिब्बा घाटी थी। हम एकदम पथरीली घाटी से होकर आ रहे थे जबकि दूसरी ओर हरी भरी विशाल घाटी दिखायी दे रही थी।

मैं अभी तक विन्ड़ शीटर पहने बिना मात्र टी शर्ट में ही चल रहा था लेकिन यहाँ कि तेज ठन्ड़ी बर्फ़ीली हवाओं ने बैग में से विन्ड़ शीटर पहनने पर मजबूर कर दिया। सिर पर ओढने के लिये बैग से टोपी भी निकालनी पड़ी। रामपुर वाले बन्दे ने बताया कि बस किन्नर कैलाश आ गया समझो। समझो मतलब अभी दूर है क्या? नहीं वो देखो उस चोटी के ठीक पीछे किन्नर कैलाश शिवलिंग वाली शिला है। अभी तक सुबह के 10 बजे के बाद से अब तक जैसा पथरीली चट्टानों से होकर हम आ रहे थे उस चोटी को देखकर यह विश्वास हो गया कि आगे का बचा खुचा मार्ग भी वैसे ही पत्थरों से होकर जाने वाला है। हम एक दर्रे नुमा जगह पर खड़े थे जिस कारण हवा बेहद तेज गति से हमसे टकरा रही थी। हमने कुछ मिनटों में ही वहाँ से आगे बढ़ना शुरु कर दिया।


बाबा जी लगातार हमारे साथ चल रहे थे। आगे जाने पर एक पत्थर की ओर इशारा करके बाबा जी ने बताया कि मैं कल रात को यहाँ रुका था। बाबा जी के पास एक कम्बल था जिसके सहारे उन्होंने वहाँ रात काटी थी। जिस जगह बाबा जी रात भर ठहरे थे वहाँ से किन्नर कैलाश शिला मुश्किल से आधा किमी ही बची होगी। यह आधा किमी की दूरी पार करने में हमें काफ़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। अत्यधिक ऊँचाई पर आने के कारण हमें साँस लेने के लिये बार-बार रुककर साँस लेनी पड़ती थी। अब सचमुच हालत देखने लायक थी लेकिन अब राकेश ने एक बार भी नहीं कहा कि जाट भाई ठीक तो हो ना? राकेश पर थकान या पहाड़ की ऊँचाई हावी होती जा रही थी, चूंकि राकेश को माऊन्टेन सिकनेस नामक बीमारी नहीं है। इसलिये राकेश व बाबा जी बहुत ही सावधानी व आराम से पत्थरों को पार कर उनपर धीरे-धीरे चढ़ते कूदते से आ रहे थे। मुझसे अब इतना धीमा चढ़ना बर्दास्त नहीं हो रहा था इसलिये मैंने आखिरी के 300-400 मीटर दे दनादन चढ लिये। ऊपर पहुँचकर देखा कि मेरे सीधे हाथ पर किन्नर कैलाश शिवलिंग आकाश को चुनौती देते हुए खड़ा है। अब अपुन और देवों के देव महादेव भोले नाथ का ठिकाना किन्नर कैलाश आमने सामने है। (यात्रा अभी जारी है।)   



















5 टिप्‍पणियां:

  1. सन्दीप भाई राम-राम.बहुत बढिया यात्रा वर्नण
    बुढे बाबा को सलाम जो पुरी रात खतरनाक ठण्ड ं मे गुजारी.रामपुर वाले नशे की लत के कारण अपनी बुद्धी भर्स्ट कर बैठे ओर पवित्र पारवती कुन्ड मे स्नान कर उसे गन्दा कियी.चट्टाने बहुत विशाल है रास्ता मै

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  2. बाबा जी का एक फोटो तो होना चाहिए था.

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  3. भाई जी यात्रा का वर्णन पढ कर मजा आ गया और आपके घुम्मकडी जज्बे को सलाम नही राम राम करता हूँ आप ऐसे ही पर्वतो की ऊचाई को छूते रहे...

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  4. बहुत खतरनाक ... पत्थरो का गिरना ...बहुत सोचनीय स्थति ...पर तुम्हारे होश्ले को सलाम ..

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