सोमवार, 21 अक्तूबर 2013

Kinner Kailash Shivlinga darshan and back to forest house किन्नर कैलाश महाशिला दर्शन के बाद वापसी

किन्नर कैलाश यात्रा के सभी लेख के लिंक नीचे दिये गये है।

KINNER KAILASH TREKKING-07                                         SANDEEP PANWAR
सबसे ऊपर पहुँचकर देखा कि मेरे सीधे हाथ पर किन्नर कैलाश शिवलिंग आकाश को चुनौती देते हुए खड़ा है। अब अपुन और देवों के देव महादेव भोले नाथ का ठिकाना किन्नर कैलाश आमने सामने है। भोले नाथ के प्रतीक शिवलिंग रुपी महाशिला के सम्मुख जाने से पहले मैंने अपने जूते निकाल कर पत्थरों पर ही छोड़ दिये। आखिरी की कुछ दूरी तेजी से चढ़ने के कारण साँस थोड़ी फ़ूली हुई थी कुछ देर रुक कर उसे सामान्य किया गया। मेरे पास ऊँचाई मापने का कोई यंत्र नहीं था जिससे मैं आपको बता सकू कि किन्नर कैलाश शिला कितनी ऊँचाई पर है, फ़िर भी नेट व विकीपीडिया से ली गयी जानकारी से पता लगा कि यह स्थल समुन्द्र तल से लगभग 19000 फ़ुट से ज्यादा ऊँचा है। कुछ जगह तो इसकी ऊँचाई 21000 फ़ुट भी लिखी हुई है खैर असली ऊँचाई कुछ भी हो। मैंने इसे 20000 हजार माना है। यह मेरी अब तक सबसे अधिक कठिन व अधिकतम ऊँचाई तक की गयी ट्रेकिंग रही है। वैसे मेरी बाइक नीली परी भी खरदूंगला की 18358 फ़ुट ऊँचाई तक यात्रा कर चुकी है।



मैंने साँस सामान्य होने के उपराँत सामने दिख रहे शिवलिंग रुपी शिला को राम राम की, लगे हाथ भोले नाथ को कह भी दिया कि अगर हिम्मत है तो फ़िर बुला लेना, जाट देवता संदीप पवाँर इसी मस्त चाल से चलता हुआ फ़िर हाजिर हो जायेगा। चलो दुबारा यहाँ जाना होगा या नहीं यह तो भविष्य में छिपा है लेकिन इस यात्रा में जुड़ा एक और खास पहलू है कि किन्नर कैलाश पर्वत की परिक्रमा भी की जाती है। अगले साल यह परिक्रमा भी की जायेगी। अगले साल मुझे एक अन्य कैलाश आदि कैलाश की भी ट्रेकिंग करनी है जो उतराखन्ड़ के पिथौरागढ़ जिले में चाइना की सीमा के करीब पहुँचकर करनी होती है। अगले साल ही नेपाल में everst base camp (EBC)  की ट्रेकिंग भी करने का इरादा है।
जैसे ही मैं किन्नर कैलाश महाशिला के करीब जाने के लिये ऊपर वाले सपाट पत्थर पर खड़ा हुआ तो वहाँ चल रही तेज व ठन्ड़ी हवाओं ने बता दिया कि यहाँ सीधा खड़ा रहना आसाना कार्य नहीं है। अभी तक मैं इस बड़े पत्थर की ओट में नीचे ही खड़ा था जिससे यह ध्यान ही नहीं रहा कि मैं कुछ देर पहले तक तूफ़ानी हवाओं को झेलता हुआ यहाँ आया था। हवाओं के जोरदार दवाब का अपने शरीर के बल से सामना करते हुए अपने आप को वहाँ खड़ा किया। यहाँ खड़ा होने के बाद मैंने दूसरी ओर नीचे की ओर खाई में देखा तो मेरे होश उड़ गये। खाई की गहराई को देखते ही मेरा गला सूख गया था। किसी तरह मैंने अपने आप को सम्भाला। महाशिला के ठीक नीचे लगे हुए लाल रंग के झन्ड़े व शिला को छूकर वापिस 15-20 फ़ुट पीछे आ गया।  
राकेश भी आता हुआ दिखायी दिया। जहाँ राकेश मुझे दिख रहा था वहाँ से शिला के दर्शन नहीं होते है मैंने राकेश को कहा “बस 10-12 मीटर और आ जाओ। यह देखो यहाँ पर किन्नर कैलाश महाशिला दिख रही है। राकेश ने जैसे मेरी बात सुनी ही ना हो, मेरी बात अनसुनी करते हुए राकेश वही बैठ गया। दो-तीन मिनट बाद राकेश वहाँ से आगे आया और जब उसने महाशिला के दर्शन किये तो भावविभोर हो गया। राकेश जूते उतार कर ऊपर शिला के नजदीक जाने के खड़ा हुआ तो मैंने कहा राकेश भाई जरा सावधानी से जाना क्योंकि ऊपर तेज हवाये चल रही है।
जब राकेश महाशिला के सामने वाली सपाट जगह पर पहुँचा तो दूसरी ओर की गहरी खाई व तेज हवा देख कर वही बैठ गया। मैंने मजाक करते हुए राकेश से कहा क्यों राकेश क्या विचार है चलो इस खाई में कूद कर देखे। राकेश बोला जाट भाई मजाक तो नी कर रहे हो। तुम्हे यह खतरनाक स्टंट मजाक लग रहा है। जाओ तुम भगवान जी के पास जाओ मैं तुम्हारा फ़ोटो लेता हूँ। उसके बाद तुम मेरे फ़ोटो ले लेना। मैं सोच रहा था कि राकेश सीधा खड़े होकर महाशिला के नजदीक जायेगा लेकिन राकेश तो झुक कर आगे जा रहा था। 5 फ़ुट चौड़ी पटटी पर चलना जिसके एक और तेज हवाये और साथ ही गहरी खाई भी वहाँ सावधानी बरतना ही अच्छी बात है। राकेश महाशिला के सामने पहुँचकर हाथ जोड़ कर बैठ गया। उसने भी मेरी तरह देवो के देव महादेव को thanks कहा होगा।
मैंने राकेश का फ़ोटो लिया उसके बाद राकेश का दूसरा फ़ोटो उस जगह से लिया जहाँ से यह शिला फ़ोटो में पूरी आती है और बैठने लायक स्थान भी बना हुआ है। इसके बाद राकेश ने मेरे फ़ोटो लिये। जब मैंने अपने फ़ोटो देखे तो राकेश पर बहुत गुस्सा आया क्योंकि राकेश ने मेरे फ़ोटो लेते समय महाशिला की चोटी गायब कर दी है। अब तक बुजुर्ग बाबा भी दिखायी देने लगे। कुछ देर बाद वह भी वहाँ आ पहुँचे। रामपुर वाले दो बन्दे हमसे पहले ही वहाँ पहुँच चुके थे। रामपुर वाले बाकि बन्दे नीचे कही पत्थरों में अटके पड़े थे। मैंने और राकेश ने कुछ देर शीर्ष पर रुकने के बाद वापसी की उतराई चलने का फ़ैसला किया।
चढ़ाई तो किसी तरह दोनों हाथों व पैरों के सहारे चढ़कर हम यहाँ तक आ गये थे। असली समस्या उतराई की थी जहाँ इन बड़े पत्थरों पर उतरना भी कम जोखिम से भरा हुआ नहीं था। रामपुर वाले दोनों साथियों से मैंने कहा कि हम नीचे जा रहे है। रामपुर वाले बोले कि आप हमसे पहले नीचे गुफ़ा तक पहुँच जाओगे। इसलिये वहाँ पहुँचकर भोजन का कुछ प्रबन्ध कर लेना। गुफ़ा में सुबह के समय हम कई किलो आटा छोड़ कर आये थे उम्मीद थी कि शाम तक गुफ़ा अवश्य पहुँच जायेंगे। गुफ़ा में रात का भोजन अपने हाथों से बना कर खायेंगे। हमने रामपुर वालों को गुफ़ा में मिलने का बोलकर प्रस्थान कर दिया। बाबा जी भोले नाथ के दर्शन कर बेसुध हुए जा रहे थे। उनका चेहरा देखकर ऐसा लग रहा था कि जैसे वह खुशी से रो रहे हो। दोनों बाबा को प्रणाम कर दोपहर के 2 बजे हमने नीचे की राह पकड़ी।
जिस चढ़ाई के बड़े उबड़-खाबड़ पत्थरों को चढ़ते समय हमारा बुरा हाल हो रहा था उतराई में इन्ही विशाल पत्थरों ने हमें बहुत तंग किया। उतराई में कुछ जगह तो ऐसी परेशानी करने वाली आयी थी जहाँ उतरने से पहले यह सोचना पड़ता था कि उतरे कैसे? कई बार तो पत्थर पर अपना पिछवाड़ा टिका कर बैठना पड़ता था। फ़िर दोनों हाथो व दोनों पैरों के सहारे उन पत्थरों में अपना संतुलन बनाकर उतरना पड़ता था। मैं आगे-आगे चल रहा था राकेश पीछे-पीछे आ रहा था। नीचे उतरते समय मुझे अपनी फ़िटनेस का बहुत लाभ हुआ। ऊपर की आधे किमी की उतराई में ही राकेश काफ़ी पीछे रह गया था। रामपुर वाले बाकि बन्दे नीचे उस जगह मिले थे जहाँ पर दूसरी ओर का हरा भरा मैदान पहली बार दिखायी देता है।
मेरे साथ यह समस्या है कि मैं उतराई व चढ़ाई में एक समान गति से ही चढ़-उतर लेता हूँ जबकि मेरे साथ वाले या तो चढ़ाई में पीछे रहेंगे या उतराई में आगे। खैर यहाँ अब इस यात्रा की सबसे खतरनाक उतराई आरम्भ हो गयी थी। यह संकरी नाले नुमा पत्थरों की ढलान उतरना सच में बच्चों का खेल नहीं था। ठीक घन्टा भर इस तेज ढलान को उतरने में लग गया होगा। इस ढ़लान पर जब वह पत्थर आया जहाँ से राकेश चढने में असफ़ल रहा था वापसी में मैंने वहाँ से उतरने की कोशिश ही नहीं की। क्योंकि वहाँ से उतरते समय गिरने की शत-प्रतिशत आशंका थी। इसलिये मैंने पत्थर के नीचे से होकर निकलना ही सही समझा था।
पत्थर के नीचे से निकलने के बाद तीखी ढ़लान में फ़िसलकर गिरने वाले कई बिन्दु थे। वैसे यहाँ फ़िसलकर खाई में गिरने का ड़र तो नहीं था लेकिन फ़िसलकर किसी पत्थर पर जरुर गिरते, उन पत्थरों पर गिरकर भी अपने हाथ पैर के साथ शरीर का पता नहीं कौन सा अंग कहाँ-कहाँ से टूट सकता था। एक दो बार अपने साथ हल्की-फ़ुल्की उई भी हुई। लेकिन बड़ी समस्या नहीं आई। इस चढ़ाई को उतरने के बाद मैंने बड़ी राहत की साँस ली। उतरते समय वैसे साँस तो नहीं फ़ूल रही थी लेकिन राहत की लम्बी साँस लेकर मुझे बहुत सुकून मिला था। यहाँ से आगे के दो-तीन किमी लगभग समतल जैसे ही थे। कहने को मैं समतल कह रहा हूँ लेकिन इन बड़े-बड़े कई-कई फ़ुट ऊँचे पत्थरों के बीच से, ऊपर से, नीचे से, निकलना भी बहुत दुष्कर कार्य है।
जहाँ पार्वती कुन्ड़ से ऊपर जाते-जाते पानी की एक लीटर की बोतल खाली हो गयी वहाँ नीचे आते समय मैंने पार्वती कुन्ड़ तक एक बून्द भी पानी नहीं पिया था। पार्वती कुन्ड से थोड़ा आगे जाने के बाद दो बन्दे ऊपर जाते हुए मिले थे। इन्हे हमने पहले नहीं देखा था हो सकता है कि यह लोग सुबह तंगलिंग गाँव से चले हो। रात में दर्शन करने के बाद यह लोग गुफ़ा में रुकेंगे या वन विभाग के कमरे पर? जब कई किमी लम्बे बड़े-बड़े पत्थरों वाला मार्ग समाप्त हुआ तो मुझे इतनी खुशी हुई कि पूछो मत लगता था कि जैसे मैं पोवारी पहुँच गया हूँ लेकिन असलियत में पोवारी वहाँ से कम से कम 12 किमी दूर तो होगा ही। जब मैंने वन विभाग कमरे वाली पहाड़ी देखी तो मैंने सोचा कि क्यों ना आज ही नीचे उतर लिया जाये।
गुफ़ा अभी काफ़ी दूर थी सुबह के समय गुफ़ा से यहाँ तक आने में दो घन्टे लगे थे। अब उतराई में यही दूरी उतरने में मुझे मात्र आधा घन्टा ही लगा होगा। जब मैं गुफ़ा के करीब पहुँचा तो देखा कि राजस्थान का वह जोड़ा अभी नीचे जा रहा है। यह लोग हमें ऊपर जाते समय उस पत्थर को पार करने के बाद मिले थे जहाँ पर राकेश व बाबा जी पत्थर के नीचे वाले मार्ग से होकर ऊपर गये थे। मुझे देखकर यह बोले कि अरे आप तो काफ़ी तेजी से नीचे उतर रहे हो। हाँ जी, प्रतिदिन साईकिल चलाने वाले ऐसे ही होते है। वैसे यह जयपुर का जोड़ा कैलाश मानसरोवर की यात्रा भी करके आ चुका है। उन्होंने बताया था कि यह लोग अमरनाथ की यात्रा भी कर चुके है। उस जोड़े के पास पहाड़ों में रात बिताने के लिये स्लिपिंग बैग व मैट भी थी जिसे मैंने अपना बैग गुफ़ा में रखते समय देखा था।
मैंने गुफ़ा में पहुँचते ही अपना बैग निकाला। बैग में मेरा मोबाइल भी रखा हुआ था मोबाइल ऑन किया उसकी घड़ी बता रही थी कि समय शाम के पाँच बजने वाले है। गुफ़ा में रात रुकने की बात राकेश को व रामपुर वालों को बताकर नीचे आया था। लेकिन अभी समय देखकर मन कर रहा था कि नीचे चला जाये। राकेश को साथ लिये बिना नीचे जाना सम्भव नहीं था इसलिये राकेश की प्रतीक्षा होने लगी। गुफ़ा में उस रात ठहरने वाले 4-5 नये बन्दे नीचे से आ पहुँचे थे। जयपुर की जोड़ी को मिलाकर कुल 7 लोग गुफ़ा में रात को रुकने वाले थे। यह गुफ़ा बहुत ज्यादा बड़ी नहीं है इसमें मुश्किल 7-8 बन्दे ही सो सकते है। गुफ़ा इतनी तंग है कि इसमें एक आदमी सीधा खड़ा भी नहीं हो सकता है। मुझे अपने बैग रखते समय व निकालते समय झुककर आना-जाना पड़ा था।
गुफ़ा में पहले से मौजूद लोगों के साथ शाम का खाना बनाने की चर्चा की गयी। उनमें से दो बन्दे नीचे नदी से पानी लेने के लिये चले गये। जयपुर वालों के आने के बाद हमने रात के खाने की तैयारी आरम्भ की। जयपुर वाली महिला ने कहा कि पूरियाँ बनाते है वहाँ खाने का रिफ़ान्ड़ तेल भी मौजूद था। अब आग जलाने के लिये लकड़ी की समस्या आ गयी। जो लकड़ी सुबह मैं यहाँ लेकर आया था उसमें से आधी लकडी दिन में आने-जाने वालों ने जला दी थी। अब पाँच छ: बन्दे रामपुर वाले भी थे जो गुफ़ा पर खाने का कार्यक्रम बनाये बैठे थे। लगभग 40-45 मिनट बाद राकेश भी गुफ़ा पर पहुँच गया। मैंने राकेश से कुछ देर विश्राम करने के बाद कहा कि राकेश भाई चलो तंगलिंग चलते है। रात को 9-10 बजे तक तंगलिंग पहुँच जायेंगे।
राकेश को भूख कुछ ज्यादा ही लगती है उसने खाने के बारे में पूछा तो मैंने कहा अगर यहाँ खाने के लिये रुकोगे तो कम से कम घन्टा भर और लग जायेगा। अभी 6 बजने जा रहे है। हम पहले वन विभाग के कमरे तक चलते है वहाँ कुछ खाने को मिला तो ठीक नहीं तो अपने पास रखे बिस्कुट के पैकेट से काम चला लेंगे। राकेश शायद बिस्कुट के पैकेट चट कर चुका था। चलते समय हमने गुफ़ा में मौजूद लोगों से कहा कि अभी एक दो घन्टे में रामपुर वाले 5 बन्दे ऊपर से आयेंगे। आप उनके लिये खाने को बचा कर रख लेना। उन्हे कह देना कि दिल्ली वाले नीचे तंगलिंग जाने के लिये चले गये है। हमने अपने बैग उठाकर गुफ़ा से आगे वन विभाग के कमरे की ओर प्रस्थान कर दिया।
गुफ़ा से नदी की ओर आते समय, वे दोनों बन्दे मिले जो खाना बनाने के लिये झरने से पानी लेने गये हुए थे। उन्होंने कहा कि आप खाना खाये बिना जा रहे हो। हाँ रात को तंगलिंग जाकर रुकेंगे। गुफ़ा से निकलने के बाद नीचे उतरने के बाद पार्वती कुन्ड़ से निकलने वाला साफ़ पानी वाला नाला पार करना था। यहाँ नाला पार करते समय मुझसे एक गलती हो गयी कि एक जगह बर्फ़ के ढेर के बीच से एक बड़ा सा पत्थर निकला हुआ था। एक बार मन में आया कि छोड़ो इस पत्थर को लम्बे मार्ग से चलने में ही भलाई है। लेकिन फ़िर सोचा कि चलो पार कर देखते है इसके आगे गहरी खाई तो है नहीं, जिससे की गिरने का खतरा पैदा हो।
मैंने नीचे 30-40 फ़ुट उतरने के बजाय इस बर्फ़ के बीच निकले पत्थर से होकर आगे बढ़ना चाहा। जब मैं इस पत्थर को पार कर रहा था तो इस विशाल पत्थर पर बर्फ़ पिघल कर बने पानी से गीला होने के कारण मेरा पैर अचानक फ़िसल गया। अचानक फ़िसलने पर, मैंने तुरन्त बर्फ़ से आगे नाले की ओर छलाँग लगा दी। जिस जगह से मैं कूदा था वह जगह कम से कम 7-8 फ़ुट ऊँची थी। बर्फ़ पर फ़िसलने से मेरे शरीर ने जो गति पकड़ी थी उस गतिमान शरीर को काबू करने के लिये मुझे लगातार कई छलांग लगानी पड़ी। ऊपर वाले का शुक्र रहा कि तीन छलाँगे मारते समय पैर किसी ऐसे पत्थर पर नहीं पड़े जहाँ से संतुलन गड़बड़ा जाता। मैंने अपने आप को सम्भाल कर राकेश को देखा वह अभी मुझसे 30-40 मीटर पीछे आता हुआ दिखायी दिया। राकेश ने शायद मुझे फ़िसलकर कूदते हुए नहीं देखा था। अन्यथा वह मुझे जरुर टोकता कि जाट भाई मजाक तो नी कर रहे हो?
अब सावधानी से नदी/झरना पार कर दूसरी ओर पहुँचे। यहाँ से आगे नीचे तंगलिंग गाँव तक पीने का पानी नहीं मिलने वाला था इसलिये अपनी पानी की बोतले फ़िर से भर ली। अब आगे कुछ दूर तक समतल मार्ग था उसके बाद कुछ सौ मीटर की तीखी चढ़ाई थी। जिसके बाद हमें तंगलिंग तक लगातार ढ़लान मिलने वाली थी। धीरे-धीरे यह तीखी चढ़ाई भी चढ़ गये। ऊपर आने के बाद वन विभाग का कमरा साफ़ दिखने लगा था। कमरे से कई लोग निकल कर हमारी ओर आते हुए भी दिखायी दिये। ऊपर यहाँ एक कपड़े पर राकेश की टेड़ी नजर थी वह उसे वहाँ से साथ लेकर जाने वाला था लेकिन समझाने पर मान गया। यहाँ से वन विभाग का कमरा एक किमी दूरी पर तो होगा ही अब चढ़ाई तीखी नहीं थी इसलिये हमने जमकर शार्टकट लगाये। नीचे से आने वाले लोग शार्टकट में ही कही अलग हो गये। नीचे वन विभाग के कमरे तक पहुँचते-पहुँचते हल्का अंधेरा होने लगा था। राकेश की चाल देखकर लग रहा था कि उसके साथ कुछ समस्या है राकेश ने बताया कि उसके एक पैर में छाले हो गये है। पैर में छाले यानि ढलान में और ज्यादा परेशानी होगी। अब क्या करे? नीचे चलते रहे कि रात में यही इसी कमरे में रुका जाये। (यात्रा अभी जारी है।)  





























4 टिप्‍पणियां:

Sundeep Sachdeva ने कहा…

Swarg ke darshan karane ke liye dhanyabaad.........jai baba kinner kailash....om namha shivya....Sundeep Bhai,aapke diye yatra ke tips bhut kaam aayenge.hum hi nahi hamari agli peedhi ke liye bhi.samsat jaankaari with photograph,..sach mein Bahi aapko koti-koti parnaam...

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

अध्यात्म भरती चट्टानें..

SACHIN TYAGI ने कहा…

सन्दिप भाई जय भोले की.अदभूत जगह ह यह लग रहा ह जैसे आप ने संसार का आखरी छोर फतह कर लिया ह.बहुत सुन्दर जगह ह कैलाश.हम शायद ही एसी जगह जा पाए पर आप ने हमे अपनी नजरो से ही भोले बाबा के दर्शन करा दिए धन्यवाद

DJ_knight ने कहा…

मालिक यह किन्नर कैलाश चोटी गूगल पे दिखाई दे रही 'Jorkanden' चोटी ही है क्या... क्यूंकि यह चोटी दुनिया की सबसे तीखी चोटियों में से एक है.... वाकई बहुत मुश्किल है इसपर चढ़ना ....

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