शुक्रवार, 24 अगस्त 2012

MUSSOORIE- GUN HILL and KAMPTY FALL मसूरी- गनहिल व कैम्पटी फ़ॉल

               यह सीरीज शुरू से यहाँ से देखे                                          इस पोस्ट से पहला भाग यहाँ है  
जिस दिन मसूरी जाना था, वह दिन मेरे लिये बहुत बडी खुशी का दिन था। अरे बन्धु, मसूरी जाने के नाम पर तो आज भी लोग जान छिडकते है मैं तो फ़िर भी बीस साल पहले की बात बता रहा हूँ कई लोग सोच रहे होंगे कि क्या जाट भाई भी फ़ालतू की बिना फ़ोटॊ वाली यात्राएँ लिखे जा रहा है? लेकिन मैं जानता हूँ कि मेरे लिये यह बिना फ़ोटो वाली कई यात्राएँ कितनी कीमती है? बिना फ़ोटो यात्रा लिखने पर यह तो पता लगा कि कुछ लोग सच में लिखा हुआ पढना पसन्द करते है। केवल फ़ोटो देखने ही नहीं आते है। हाँ तो दोस्तों शुरु करते है अपनी पहली मसूरी यात्रा विवरण, सुबह कुछ ज्यादा ही जल्दी आँख खुल गयी थी, या यूँ कह सकते हो कि रात को ठीक से नींद ही नहीं आ पायी थी। कारण आप सब जानते ही हो कि यही आज वाला यात्रा का पंगा। पंगे व पहाड से याद आया कि दोनों में मुझे बहुत मजा आता है। सुबह सबसे पहले उठकर नहा धोकर तैयार हो गया, मामीजी ने सुबह सात बजे ही खाना बना कर दे दिया था। उस दिन शायद मामाजी की दोनों लडकियों का परीक्षा फ़ल आने वाला था। उनके परीक्षा फ़ल से ज्ञात हुआ कि वे भी C.B.S.E  से सम्बंधित स्कूल में ही पढते है जैसे हम दिल्ली में पढते है। देहरादून का गुरु राम राय पब्लिक स्कूल केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड से मान्यता प्राप्त है। मैं और बबलू (नवीन) तैयार होकर रेलवे स्टेशन के बीच से होते हुए मसूरी अडडे पर जा पहुँचे, वैसे भी भण्डारी बाग से मसूरी अडडा आने-जाने के लिये मुख्य सडक से होकर जाना पडता है, लेकिन जिन लोगों को मालूम है, वे सीधे स्टेशन से होते हुए उस अडडे तक चले जाया करते थे। आजकल शायद स्टेशन पर खासकर प्लेटफ़ार्म पर भी टिकट (plate form) लेकर जाना पडता है। उस समय हर आधे घन्टे पर मसूरी के लिये बस मिला करती थी आज क्या स्थिति है मुझे नहीं मालूम? मैं चाहता तो मामाजी को फ़ोन करके पता कर सकता था लेकिन मुझे यह बात ठीक नहीं लगी इसलिये पता नहीं किया।





मैं पहली बार मसूरी जा रहा था तो इसका सीधा सा मतलब था कि बस में सबसे आगे वाली सीट पर ही बैठना था। किस्मत से बस में घुसते ही जैसे ही आगे वाली सीट पर अपनी नजर दौडाई तो खुशी के मारे दिल दिलदार हो बगीचा-बगीचा(बाग-बाग) हो गया। सबसे आगे की सीट खाली बची हुई थी। बबलू मुझसे पिछली वाली सीट पर विराजमान हो गया था। कुछ देर बाद ही बस चल पडी थी। देहरादून के इसी बस अडडे से यमुनौत्री के लिये भी एक बस प्रतिदिन सुबह-सुबह चला करती है। यमुनौत्री वाली बस लगभग पूरे साल चलती थी। अगर किसी बन्धु को उस बस के आज के समय के बारे में मालूम हो तो बता देना। बस स्टेशन से बाहर आकर मुख्य सडक पर आते ही बस अपनी रफ़्तार पकड ही लेती थी, हरिद्धार जाने वाले मोड से विपरीत दिशा यानि मसूरी की ओर अपनी बस चल देती थी, यहाँ इस मार्ग पर जिसका नाम गाँधी रोड था। जब बस कुछ आगे जाने पर दिल्ली बस अडडे पर पहुँची थी तो वहाँ से भी कुछ सवारियाँ बस में चढी थी। यहाँ से बस घन्टाघर के आगे से होते हुए सीधे राजपुर रोड पार करती हुई चलती रहती थी। घन्टाघर से ही उल्टे हाथ पर चकराता मार्ग है जहाँ से मसूरी गये बिना विकासनगर-कालसी होते हुए, चकराता जा सकते है। आजकल इस सडक पर बहुत भीड रहती है लेकिन बीस साल पहले की बात ही कुछ और थी। घन्टाघर से थोडा सा आगे चलते ही आबादी समाप्त हो जाती थी लेकिन आज शायद दस किमी आगे तक भी आबादी पहुँच गयी है। उस समय राजपुर गाँव के बीच से होकर सडक मसूरी जाया करती थी। वहाँ एक पुलिस चैक पोस्ट भी हुआ करता था। आजकल राजपुर गाँव से कुछ किमी पहले ही डियर पार्क यानि हिरण पार्क के आगे से होती हुई मुख्य सडक ऊपर की ओर चली जाती है। पहाड पर चढते समय आजकल एक शिव मन्दिर इस इलाके में बहुत प्रसिद्ध हो गया है लेकिन बीस साल पहले इसको शायद ही कोई-कोई जानता था। मैंने उस समय इसे नहीं देखा था, अब पता नहीं उस समय यह यहाँ था भी या नहीं? 

जैसे-जैसे हमारी बस ऊपर पहाडों में चढती जा रही थी, मेरी उमंगे जवां होती जा रही थी। वो कहते है ना जवानी सौलह साल की, हाँ था तो मैं भी उस समय सौलह साल का ही तो फ़िर मेरी उमंगे जवां क्यों नहीं होती? अब तक मैंने इतने ऊँचे पहाड पर वाहन में बैठ कर नहीं देखा था। बस चालक कई मोड पर तेजी से मोडता हुआ चला रहा था। कभी-कभी सामने से कोई वाहन जब किसी मोड पर अचानक से आ जाता था तो एक पल को लगता था कि बस हुई टक्कर। लेकिन टक्कर से ज्यादा मुझे एक चीज से घबराहट होने लगी थी। मसूरी से कोई 15 किमी पहले सडक के किनारे पर कुछ ज्यादा ही गहरी खाई आ गयी थी। जब हमारी बस वहाँ पर खाई के ऊपर उन मोड से मुडती थी तो मुझे ऐसा लगता था कि हमारी बस का एक अगला पहिया खाई के ऊपर से हवा में घूमता हुआ मुड रहा है। मैंने खिडकी से बाहर कई बार मोड पर बस का अगला पहिया देखना चाहा कि क्या वाकई में बस का पहिया सडक पर ही है या खाई के ऊपर से होता हुआ मुड रहा है। मेरी कई कोशिश के बाद भी मुझे बस का अगला पहिया दिखाई नहीं दिया तो मुझे डर सा लगने लगा था कि बस में अगला पहिया है भी, कि नहीं। जैसे-जैसे मसूरी नजदीक आती जा रही थी। खिडकी से ठन्डी हवा के झोके अन्दर आकर यह संदेशा देते जा रहे थे कि अब मंजिल ज्यादा दूर नहीं है। वो तो मामीजी का शुक्र है कि उन्होंने स्वेटर पहने बिना घर से आने नहीं दिया था। नहीण तो, यकीनन हीं मसूरी की ठन्ड में तीन कू तीना बन जाना आम बात है, हमारे यहाँ गाँव में जब कोई ठन्ड लगने से सिकुड जाता है तो हम उसे कहते है देखो कपडे नहीं पहन सकता था, हीरो बना घूम रहा था। अब देखो इसे यहाँ मुडा-तुडा तीन कू तीना बना बैठा है। बिना उचित कपडे पहनकर पहाड पर जाना मूर्खता होती है। मुर्खता में तीन कू तीना बन जाना पक्का है। उस मीठी-मीठी ठन्ड में आगे बस के इन्जन के पास बैठना बहुत सुकून दे रहा था। बस चालक ने बस देहरादून से मसूरी के बीच में कही भी नहीं रोकी। वह सीधा मसूरी स्थित बस अडडे पर रोक कर ही बोला था। चलो जल्दी खाली करो

बस से उतर कर हम दोनों सामने पुलिस चौकी में जा पहुँचे। अब आप सोच रहे होंगे कि संदीप भाई का पुलिस चौकी में क्या काम? अरे भाई उस पुलिस चौकी में बबलू के मामा का लडका कार्य करता था। उसकी डयूटी मसूरी थाने में ही थी। हम दोनों लगभग आधे घन्टे उसके पास बैठे रहे। उसने हमें बताया था कि कुछ दिन पहले ही यहाँ जमकर बर्फ़बारी हुई थी, जिसमें हुई ठन्ड में पाँच किलो की रुई वाली रजाई भी कम पड रही थी। बर्फ़ का नाम सुनकर शरीर में एक झुरझुरी सी दौड गयी थी। उस समय तक मैंने बर्फ़ सिर्फ़ फ़्रिज या दुकानों में ही देखी थी। मेरी बर्फ़ की हसरत लेह-लद्धाख बाइक यात्रा LEH BIKE TRIP ने पूरी की थी। जिसका वर्णन मैं यहाँ सबसे पहले कर चुका हूँ। उसके बाद हम वहाँ से देहरादून की सबसे ऊँची चोटी गन हिल की ओर जाने के लिये मसूरी पुलिस थाना (MUSOORIE POLICE STATION) के सामने जा पहुँचे, मैंने बबलू से पूछा पहले पुलिस चौकी, अब पुलिस थाना आखिर क्या बात है? लगता है कि तुम्हारे जानने वाले सारे के सारे पुलिस में ही है क्या? बबलू बोला अरे नहीं भाई मैं थाने-वाने में नहीं आया हूँ। हम सीधे गन हिल पर जा रहे है यह थाना तो मार्ग में आ जाता है, हमें यहाँ नहीं जाना है। पहाड पर सीधे जाना भी तो एक करिश्मा है, क्योंकि पहाड के सीधे रास्ते भी तो टेडे मेढे होते है। अत: हम उस सीधे कहो या टेडे-मेढे पैदल मार्ग पर ऊपर की ओर चढते हुए गन हिल पर चढे जा रहे है। हम लगभग बीस मिनट चलते रहे। बीस मिनट के पैदल मार्ग ने हमारी हालत पतली कर दी थी। कहाँ तो थोडी देर पहले हमें ठन्ड लग रही थी, उल्टे अब हमें गर्मी लग रही थी। किसी तरह हम साँस फ़ूलाते हुए गनहिल पर पहुँचे तो ऊपर जाकर वहाँ से चारों ओर का नजारा देख अपनी थकान छूमन्तर/गायब हो गयी। गनहिल में मैंने पहली बार किसी पहाड के सबसे ऊपरी छोर पर खडे होकर नीचे वाले छोटे पहाड व घाटी देखने का अनुभव किया था। 
जब हम गनहिल पर टहल रहे थे तो वहाँ पर लगभग स्थाई रुप से डेरा जमा चुके कुछ दुकानदार मौजूद थे। जिसमें से कई फ़ोटो की दुकाने व कई जादू सिखाने वाले भी थे। वैसे वहाँ खाने वाले भी थे। लेकिन मुझे उनसे कुछ काम नहीं था मैं सीधा एक जादू वाले के पास गया, उसने अपने कुछ करतब दिखाने शुरु कर दिये। मैंने उसके बारे में जानना चाहा तो वो बोला कि आपको जिस खेल के बारे में जानना है आपको पहले उसे खरीदना होगा, उसकी यह शर्त सुनकर अपुन चुप हो गये। एक-दो बन्दे और वहाँ पर आये, उसने उन्हे भी दो-तीन खेल दिखाये, वो जादू वाला सिर्फ़ उसे ही सिखाता था जो उसका सामान खरीदता था, लेकिन मेरे पल्ले एक भी नहीं पडा कि वो करता कैसे है? उसके कुछ खेल मुझे अभी तक याद है जैसे एक छोटी सी प्लास्टिक की शीशी जिसे वो जमीन पर लिटा देता था और कहता था कि तुम भी लिटा कर देखो, मैंने कई बार कोशिश की थी लेकिन हर बार वो शीशी तिरछी खडी हो जाती थी। उसने ताश के पत्तों के भी कई खेल दिखाये थे। एक लोहे के छल्ले में से दूसरा छल्ला निकालना दिखाया था। मेरे पल्ले एक भी नहीं पडा था। अपना आधा घन्टा खराब( मनोरंजन) कर हम गन हिल के दूसरे कोने की ओर बढ चले कि मुझे कुछ फ़ोटो की दुकाने दिखाई दी, मन तो हुआ था कि एक-दो फ़ोटो खिंचवा लिया जाये। लेकिन मैं फ़ोटो नहीं खिंचवा पाया था। उसके बाद मैं दो साल बाद फ़िर से वहाँ गया था, उस समय मुझे हल्की हल्की दाडी मूँछे भी आनी शुरु हो गयी थी। हम जैसे नये नवेले को देखकर तब एक फ़ोटो वाला हमारे पीछे पड गया कि अरे भाई आप तो बादशाह के कपडे में अपना फ़ोटो खिचवा कर देखो हमेशा मुझे याद करोगे। स्टाइल में फ़ोटो खिंचवाना मुझे पसंद नहीं था। मैंने फ़ोटो वाले से कहा देख भाई मैं कूदता हूँ इस पत्थर से नीचे चार-फ़ुट की ऊँचाई से उसे तुम्हे ऐसे दिखाना है कि जैसे मैं गनहिल से नीचे घाटी मॆं कूद रहा हूँ। वो मान गया और अपना कैमरा लेकर जमीन पर लेट गया। जब मैंने उस पाँच फ़ुटिया पत्थर से छलांग लगायी तो उसने मेरी फ़ोटो लिया था। वहाँ लिया गया फ़ोटो बहुत बेहतरीन आया था। मैं पोस्ट में लगाने की सोच रहा था लेकिन वह फ़ोटो स्कैन नहीं किया हुआ था। किसी और पोस्ट में लगा दूँगा।
गनहिल में अंग्रेजों के समय दोपहर के ठीक बारह बजे तोप से एक गोला दागा जाता था। उससे शायद लोगों को समय का पता लग जाया करता होगा। इस गनहिल से एक तरफ़ खाई में देखने पर देहरादून घाटी दिखाई देती है। अगर मौसम मेहरबान हो तो। दूसरी और हिमालय की बर्फ़ से ढकी चोटियाँ जिनमें बन्दर पूँछ मुख्य है। बाकि और कौन-कौन सी है वहाँ जाकर देख लेना। बीस साल पहले की मंसूरी और आज की मसूरी में जमीन आसमान का अन्तर आ चुका है, पहले जहाँ बहुमंजिल होटल सीमित संख्या में थे, वही आज कई किमी तक फ़ैले हुए है। अब यहाँ घर कम होटल ज्यादा है। पहले यहाँ हरियाली ज्यादा दिखाई देती थी, आज मकान/होटल ही होटल दिखाई देते है। पहले गनहिल से देखने पर घाटी में देहरादून दूर दिखाई देती थी लेकिन आजकल लगता है कि देहरादून जैसे मसूरी की तलहटी में ही बसी हुई हो। गनहिल के पीछे टिहरी गढवाल जिले की पहाडियाँ दिखाई देती है।
गनहिल देख कर नीचे उतर आये। अब हमारी इच्छा कैम्पटी झरना/फ़ॉल देखने की हो रही थी। हम सीधे उस जगह जा पहुँचे, जिसे लाईब्रेरी चौक कहते है। यहाँ से कई मार्ग अलग होते है एक मार्ग वो जहाँ से देहरादून से आये थे। उसके साथ वाला मालरोड जिस पर जाने पर पुलिस थाना आता है जहाँ से गनहिल पर पैदल भी जाते है। गनहिल जाने के लिये ट्राली भी उपलब्ध है, अत: जो मेहनत ना करना चाहता हो चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है। मेहनत करने के लिये, है ना हमारे जैसे सिरफ़िरे। बीस साल पहले कैम्पटी जाने के लिये इसी लाईब्रेरी चौक से जीप मिल जाया करती थी। लगभग घन्टा भर इन्तजार करने के बाद हमें भी एक जीप मिल गयी थी। जैसे ही जीप आगे बढी तो आगे का मार्ग देखकर अपने रोंगटे खडे होने शुरु हो गये थे। पहले तो सुबह बस वाले ने हालत खराब की थी। अब रही सही कसर यह जीप वाला निकाल रहा था। चूंकि मैं पहली बार इस मार्ग पर जा रहा था तो आगे कितनी ढलान है? मुझे मालूम नहीं था। जीप वाला ढलान पर भी तेजी से जीप दौडा रहा था। जब कोई मोड आता था तो तेजी से ब्रेक लगाते हुए मोड लेता था। वैसे लाईब्रेरी चौक से कैम्पटी फ़ॉल तक मात्र 15 किमी की दूरी में ही कई सौ मोड है जिनमें से कई तो बडॆ भयंकर लग रहे थे। आधे घन्टे में यह फ़ॉल दिखाई देने लगा। कुछ देर बाद जीप वाला बोला कि उतर जाओ। हम जीप से उतर कर पैदल ही नीचे की ओर बढ चले।

कैम्पटी फ़ॉल जाकर देखा तो वहाँ काफ़ी ऊपर से जमकर पानी गिर रहा था, कई लोग वहाँ स्नान कर रहे थे। हमने उस समय तो नहीं, लेकिन चार साल बाद वहाँ स्नान जरुर किया था। जब हम मियाँ बीबी दोनों यमुनौत्री से वापस आ रहे थे, उस यात्रा के बारे में बातऊँगा। थोडी देर वहाँ रुककर हम वापिस घर की ओर लौट चले। मसूरी से चलते ही अंधेरा होने लगा था। अंधेरा होने के बाद जैसे-जैसे हमारी बस देहरादून की ओर उतर रही थी वैसे-वैसे बिजली से जलने वाले बल्ब से घाटी का शानदार नजारा दिखाई दे रहा था। हम रात को लगभग आठ बजे घर पहुँच पाये थे। देहरादून व उसके आसपास के लगभग ज्यादातर स्थान मैंने देख लिये थे। यह मेरी यहाँ की पहली यात्रा थी, अब तक मैं शायद दस से ज्यादा बार यहाँ जा चुका हूँ। बस से सिर्फ़ दो बार, बाइक से चार-पाँच बार, कार से तीन बार यहाँ की यात्रा हो चुकी है। जब सब देख लिया तो मुझे अपने घर की याद आने लगी थी।(जब तक कुछ बचा हुआ था जब तक नहीं आयी थी।) दो-तीन दिन मामाजी के यहाँ रुकने के बाद मैं दिल्ली सीमा स्थित लोनी बार्डर LONI BORDAR  वाले अपने घर के लिये लौट चला था। देहरादून से वापसी बस से की थी जिसमॆं देहरादून से सीधी बस हमारे घर के पास के लिये मिलती थी, आज भी मिलती है। इस यात्रा को समाप्त हुई भले ही बीस वर्ष बीत गये हो लेकिन मुझे हमेशा ऐसा लगता है कि जैसे यह कल की ही बात हो। सिर्फ़ यही यात्रा ही नहीं लगभग सारी यात्रा मुझे मौखिक रुप से याद है। आजतक मैंने जो भी लिखा है यादों के झरोखे से लिखा है। क्यों मेरा कहना कुछ गलत तो नहीं लग रहा है? अब देखते है किस यात्रा का नम्बर आयेगा। वैसे अभी सोच रहा हूँ कि हिमालय की ही यात्रा कराता रहूँ। क्योंकि अभी भी हिमालय की कई यात्रा बाकि है। (कुल शब्द 2614)
आपका क्या विचार है? मेरी मानोगे या आप भी कुछ कहोगे, जय राम जी की................


4 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सुविधा रास्तों को बहुत लम्बा कर देती है..पैदल सीधा रास्ता होता है..

संजय @ मो सम कौन ? ने कहा…

कहना क्या है भाई, यही कहेंगे कि बिंदास विवरण पढकर मजा आ गया| ये भी याद आ गया कि गन हिल पर हम गए थे तो दो जने एक के बाद एक कुल मिलाकर पांच केतली चाय पी गए थे, (केतली से कप में डालते डालते ही चाय पानी बन जाती थी, गर्मी लाने के चक्कर में एक के बाद एक केतली मंगाते जा रहे थे) और उसके बाद ब्लैडर फुलाकर फुदकते रहे थे इधर उधर:)

सुज्ञ ने कहा…

मनोरम सफर को मनोरम शैली में बिछा दिया आपने हमारे समक्ष!! लाजवाब!!

Suresh kumar ने कहा…

संदीप भाई दूसरी यात्राओं की तरह मसूरी यात्रा भी बहुत ही मजेदार रही ! आप कोई भी यात्रा लिखिए हम उसे जरुर पढ़ेगें !
राम -राम

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