सोमवार, 6 अगस्त 2012

DELHI TO DEHRADUN चले देहरादून की ओर


दोस्तों नई यात्राएँ तो होती ही रहेंगी, लेकिन कई पुरानी यात्राएं भी है जिनका जिक्र करना जरूरी है अगर नई-नई यात्रा का विवरण ही बताता रहा तो पुरानी का नम्बर कभी भी नहीं आयेगा क्योंकि जिस गति से अपनी नई-नई यात्राओं की संख्या बढती जा रही है उससे तो ऐसा नहीं लगता कि यह सिलसिला जीते जी कभी रुकने वाला भी है। पुरानी यात्राओं में वैसे तो मैंने सबसे पहले देहरादून के पास सह्रसधारा की यात्रा की थी। उसके बाद देहरादून के पास के लगभग सारे स्थान मैंने साईकिल पर ही छानमारे थे। मंसूरी, धनौल्टी, चम्बा, सुरकन्डा देवी, बाइक पर उतराखण्ड के चार धाम गंगौत्री-यमुनौत्री-केदारनाथ-बद्रीनाथ, फ़ूलों की घाटी, हेमकुंठ साहिब, चोपता, रोहतांग, मणिकर्ण, ज्वालामुखी आदि-आदि न जाने कितनी यात्राएँ अभी बाकि है? अबकी बार मैं आपको उन्ही सब पुरानी यात्राओं में से कुछ के बारे में बताने जा रहा हूँ, मेरी कोशिश क्रमवार यात्रा विवरण बताने की रहेगी। समय काफ़ी बीत चुका है जिस कारण सब यात्राओं का समय तो ठीक-ठीक याद नहीं है लेकिन फ़िर भी जितना हो सका, उतना इन्साफ़ जरुर करने की कोशिश जरुर करूँगा। इन यात्राओं में मैंने लगभग सभी साधन प्रयोग किये है जैसे कि साईकिल, बस, रेल, ट्रक, कार आदि तो आज आपको दिल्ली से सहारनपुर तक की रेल यात्रा के बारे में बताने जा रहा हूँ।


सन 1991 की बात है मार्च का महीना समाप्त होने को था। जैसे ही मेरी दसवी की परीक्षा का समापन हुआ, वैसे ही देहारादून के भण्डारी बाग नामक जगह में रहने वाले मेरे मामा जी हरवीर सिंह तोमर का बुलावा आ गया था कि संदीप आ जा, कुछ दिन के लिये घूमने आ जा। मुझे देहरादून गये कई साल बीत गये थे। इससे पहले जब मैं देहरादून गया था तो उस समय मैं बहुत छोटा था। जिस कारण उस समय की कोई घटना मुझे याद भी नहीं है। मैंने अपनी माताजी व पिताजी (1997 में देहान्त) से देहरादून जाने के बारे में बात की तो उन्होंने कहा कि नहीं अभी तुम अकेले जाने लायक नहीं हुए हो! दो-तीन दिन तक मैं उन्हें मनाता रहा कि नहीं मैं अब इतना छोटा नहीं हूँ कि दिल्ली से देहरादून तक अकेला भी नहीं जा सकता हूँ। जब मैंने उन्हें कहा कि मैं अपने व मामा के गाँव में भी तो अकेला आना-जाना कर लेता हूँ। मैं पूरा पता भी लिखकर साथ लेकर जाऊँगा। साथ ही मामा जी का मोबाइल नम्बर, अरे याद आया उस समय मोबाइल तो चालू ही नहीं हुए थे। मामा जी यहाँ भारत संचार निगम लिमिटेड का तार वाला फ़ोन था जिसको हम लोग लैंडलाईन फ़ोन कहते है। मैंने मामाजी को अपने आने के कार्यक्रम के बारे में बता दिया उन्होंने अपने घर पर आने के मार्ग के बारे में अच्छी तरह मुझको समझा दिया था।

मैं एक सप्ताह की देहरादून यात्रा पर जाने की तैयारी करने लगा। यह मेरी पहली, ऐसी लम्बी यात्रा थी, जिस पर मैं अकेला जा रहा था। मैंने तीन-चार जोडी कपडे अपने थैले में भर लिये। उस समय दाडी-मूँछ तो आयी ही नहीं थी अत: दाडी बनाने का सामान तो था ही नहीं। कुछ रुपये पैसे आने-जाने के किराये के लिये ले लिये। चूंकि हमारा घर रेलवे लाइन के नजदीक ही है जिस कारण कही भी आने-जाने के लिये ज्यादातर हम या हमारे पडौसी भारतीय रेलवे का ही प्रयोग किया करते है। हमारा निवास स्थान दिल्ली-शाहदरा-लोनी-खेकडा-बागपत-बडौत-कांधला-शामली-थाना भवन-सहारनपुर वाली रेलवे लाईन पर स्थित है। इस रुट पर बस व रेल लगभग एक समांतर दूरी पर ही रहती है बल्कि दो-तीन बार एक दूसरे को काटती हुई यानि कि फ़ाटक पर मेल-मिलाप करती हुई चलती है। मैंने ज्यादातर यात्रा अपने रूट पर चलने वाली लोकल ट्रेन में ही की है। आजकल तो महाभीड के कारण ट्रेन में बेहद ही मारामारी मची रहती है, कोई बीस साल पहले इतनी बुरी हालत नहीं होती थी। आज ट्रेन में इतनी मारामारी होने की मुख्य वजह ट्रेन का किराया बेहद सस्ता होना है। मुझे अच्छी तरह याद है कि आज से लगभग 12-13 साल पहले लोनी से हरिद्धार तक जाने का रेल से लोकल किराया लगभग 33 रुपये लगता था। क्या आप बता सकते है कि आज कितना किराया लगता है। चलिये यह भी मैं ही बता देता हूँ आज की तारीख में लोनी से हरिद्धार तक जाने का किराया दो रुपये घट गया है, 31 रुपये मात्र में कोई भी यह यात्रा कर सकता है।

मैंने अपने घर के नजदीक के स्टेशन से सहारनपुर जाने वाली दिन की सबसे पहली लोकल ट्रेन से जाने का पक्का निश्चय कर लिया था। उस दिनों दिन की सबसे पहली सवारी गाडी सुबह छ: बजे हमारे यहाँ आती थी। आज यह गाडी सुबह साढे पाँच बजे हमारे यहाँ आ जाती है। इसका कारण यह है कि अब एक सवारी गाडी की संख्या और बढा दी गयी है जिस कारण इस सवारी गाडी के समय में थोडा सा बदलाव करना पडा था। मैं ट्रेन के समय से लगभग आधा घन्टा पहले स्टेशन पहुंच जाने में ही भलाई समझता हूँ। इससे लाभ यह होता है कि हमें ना तो रेलगाडी छूटने की चिंता रहती है ना बिना टिकट यात्रा करने का डर क्योंकि अगर हम समय से स्टेशन पहुँच जायेंगे तो हमें आसानी से टिकट भी मिलेगी व हमारी रेल भी नहीं छूटेगी। मैंने अपनी टिकट लोनी से सहारनपुर तक की ले ली थी। लोनी से सहारनपुर लगभग 150 किमी दूरी पर स्थित है। इस रूट पर चलने वाली सवारी रेलगाडी इस दूरी को तय करने में चार-पाँच घन्टे का समय ले लेती है। वैसे तो ना जाने, कितनी बार? इस रूट पर मैने लोकल सवारी गाडी के लोकल डिब्बों में बैठकर यात्रा की है, लेकिन हर बार ऐसा लगता है कि जैसे आज पहली बार रेल की यात्रा की है।

वैसे मैंने कई महीनों तक अपनी डयूटी भी इन्ही लोकल ट्रेन से की है लेकिन इनके चक्कर में ज्यादातर देरी हो जाने के कारण मैं साईकिल या बाइक से ही डयूटी करने जाता हूँ। आजकल दिल्ली में वातानुकुलित बसे भी चलती है जिस कारण अपुन भी गर्मी-गर्मी के दो-तीन महीने इन एसी बसों का लुत्फ़ उठा रहे है। पूरे महीने का खर्च मात्र 1015 रु में। स्टेशन पर खडे होकर जब ट्रेन का इन्तजार किया जाता है तो बडा मजा आता है और जब ट्रेन लेट हो जाये तो और भी आनन्द बढ जाता है, जब ट्रेन लेट हो जाये तो कोई बन्दा एक बार बोल दे कि आ गयी ट्रेन, फ़िर देखो कैसे लोग अपनी-अपनी जगह-जगह छोड कर ट्रेन में बैठने को उतावले हो जाते है। लेकिन लोगों को निराशा मिलती है कि किसी ने झूठ बोला है। खैर मैं ट्रेन के इन्तजार में खडा हुआ था। ट्रेन आ गयी वाली घटना तो लगभग रोज ही एक बार हो ही जाती है। जैसे ही ट्रेन आयी मैं भी अन्य भीड के साथ उस ट्रेन में सवार हो गया था। शामली तक तो अपना आना-जाना लगा ही रहता था। जिस कारण यहाँ तक का क्षेत्र कुछ जाना-पहचाना सा लगता था। लेकिन शामली के बाद जैसे ही ट्रेन आगे बढी तो मैंने अपनी नजरे खिडकी से नहीं हटायी। ट्रेन जैसे-जैसे आगे बढती थी बिल्कुल ऐसा लगता था जैसे मैं कोई फ़िल्म देख रहा हूँ। ट्रेन के डिब्बे मे लोगों का उतरना-चढना चलता रहा उससे मुझ पर कोई फ़र्क नहीं पड रहा था। क्योंकि मैंने ट्रेन में सवार होते ही खिडकी वाली सीट हथिया ली थी।


उस दौर में गाडियाँ सुबह-सुबह खाली सी रहती थी एक आज का समय है कि दिन हो या रात सवारी गाडी हो या सुपरफ़ास्ट हर कही भीड की मारामारी मची हुई है। अगर ऐसे ही भीड बढती रही तो अन्दाजा लगा लो कि आगे आने वाला समय कितना खराब व भंयकर होने वाला है? इसका ट्रेलर बोले तो रिहसल अभी से दिखाई देने लगा है। सहारनपुर आने तक मैंने खिडकी से अपनी नजरे नहीं हटायी थी बल्कि मैं यह कहूँ कि नजरे हटाने का मन ही नहीं कर रहा था तो ज्यादा सही रहेगा। बीच-बीच में मैं अपनी आँखे डिब्बे के अन्दर भी घूमा लेता था लेकिन वहाँ तो वही कई घन्टे पुराने चेहरे ही नजर आते थे। बीच-बीच में एक-दो चेहरे बदल भी जाते थे। जब ट्रेन किसी स्टेशन पर कुछ देर के लिये खडी हो जाती थी तो प्लेटफ़ार्म पर सामान बेचने वाली की आवाजे आने लगती थी। कई सवारियाँ भी खिडकी से कुछ ना कुछ खरीद भी लेती थी। जब कोई स्टेशन आने वाला होता था तो उससे कुछ देर पहले डिब्बे में हल्का सा जलजला आता था जिस कारण कई सवारियाँ अपनी-अपनी जगह से ईधर-उधर हो जाती है, यह जलजला ट्रेन चलने के बाद कई मिनट तक बना रहता था। तब कही जाकर ट्रेन में शांति का राज कायम हो पाता था। उसके बाद वार्तालाप का दौर शुरु हो जाता था। यह सिलसिला तो हमेशा, हर जगह, हर एक के साथ होता रहता है, फ़िर मैं क्यों बता रहा हूं? चलो अपनी आगे की यात्रा के बारे में बताता हूँ, अगली किस्त में.................यहाँ से देखे  

11 टिप्‍पणियां:

संजय @ मो सम कौन ? ने कहा…

सही है,बीच बीच में पुराने संस्मरण, यात्रा वृतांत भी आते रहें|
इस लाईन की गाड़ियों में अपने लिए सबसे बड़ा चार्म शाम के बाद खिड़की से बाहर जुगनुओं का चमकना देखना रहता था| पहली बार जुगनू यहीं देखे थे|

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

कोच के अन्दर स्टेशन आने के पहले की शान्ति और ट्रेन जाने के बाद की शान्ति में बहुत अन्तर होता है।

प्रवीण गुप्ता ने कहा…

बचपन की यादे भी ऐसा ही लगता हैं की जैसे कल की बात हो, वो बीते हुए दिन याद आते हैं, कोई लोटा दे मेरे बीते हुए दिन. वन्देमातरम..

Rajesh Kumari ने कहा…

आपकी इस उत्कृष्ट प्रस्तुति की चर्चा कल मंगलवार ७/८/१२ को राजेश कुमारी द्वारा चर्चा मंच पर की जायेगी आपका स्वागत है |

रविकर फैजाबादी ने कहा…

शुभकामनायें ।

दर्शन कौर धनोय ने कहा…

कोई लौटा दे तुम्हारे बीते हुए दिन ....वो यादें ..वो अरमान ....जो आज तुमने फिर से दोहराई है ......क्या बात है ....आशीर्वाद है इसी तरह सफ़र करते रहो ....

डॉ टी एस दराल ने कहा…

ट्रेन या बस की खिड़की से बाहर देखना हमें भी हमेशा बहुत अच्छा लगता था .
अब तो देखने का अवसर ही नहीं मिलता क्योंकि खुद ड्राईव कर रहे होते हैं .

Suresh kumar ने कहा…

संदीप भाई सही बात है पुरानी यात्राएं भी जरुर लिखनी चाहिए !पर एक बात जरुर कहना चाहूँगा ,आपने काफी दिनों बाद पोस्ट लिखी है !हमारी भूख नहीं मिटी , आपने इस पोस्ट में पूरी खुराक नहीं दी है ! एक बात और है अगर आप पुरानी पोस्ट लिखोगे तो आप की नई पोस्ट भी
एक दिन पुरानी हो जाएगी !नयी -नयी पोस्ट लिखिए बीच -बीच में पुरानी पोस्टभी लिखिए ! माफ़ करना भाई ....

Shanti Garg ने कहा…

बहुत ही बेहतरीन और प्रभावपूर्ण रचना....
मेरे ब्लॉग

जीवन विचार
पर आपका हार्दिक स्वागत है।

कौशल किशोर मिश्र ने कहा…

ab kar di na jaat wali baat ....


puri kahani ek baar main nahi batani...

jai baba banaras....

Sanju ने कहा…

Very nice post.....
Aabhar!
Mere blog pr padhare.

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