बुधवार, 31 मई 2017

Autobiography by Doctor Kulbhushan (Ajay) Tyagi चिकित्सक कुलभूषण/अजय त्यागी की आत्मकथा

दोस्तों, आज आपको किसी घुमक्कड स्थल के भ्रमण की जगह, एक घुमक्कड दोस्त के जीवन का लेखा-जोखा दिखाता हूँ। इन दोस्त की जीवन गाथा इनकी खुद की लिखी हुई है। यह गाथा हजारों लोगों को प्रेरणा देने का कार्य भी करेगी। ज्यादा कुछ न लिखते हुए, आप नीचे दिये गये लेख को पढिये और जानिये कि कैसे-कैसे झटकों के बाद भी एक साधारण सा मानव जीवन की भयंकर लहरों से लडकर अपनी मंजिल पा ही लेता है।

पहले आप्रेशन की तैयारी
मेरा जीवन परिचय-
मेरा जन्म सन 1988 में हुआ था। जब मैंने होश सम्भाला तो पाया कि पिता जी का एक छोटा सा पेट्रोल पंप था। हमारा पैट्रोल पम्प शाहपुर में मित्तल मार्किट के पास था, जो शामली मुज़फ्फरनगर रोड पर एक छोटा सा कस्बा है। माता जी बहुत ही धार्मिक प्रवृति की है। आज भी 2 घंटे सुबह व 2 घंटे शाम को पूजा करती है। पूरा परिवार सुबह 4 बजे उठ कर, नहा धो कर, पिता जी, मै और छोटा भाई लगभग 6 बजे पेट्रोल पंप पहुच जाते थे। 
हम वहाँ कुछ घंटे क्रिकेट खेल कर पढने के लिये स्कूल चले जाते थे। पिता जी को भी क्रिकेट का बहुत शौक था। वह भी अच्छा खेलते थे। इस तरह देखा जाये तो मुझे यह शौक विरासत मे मिला है। मै भी ठीक-ठाक बैटिंग और बोलिंग दोनों ही कर लेता हूँ। क्रिकेट खेलने का लाभ यह हुआ कि मैं अपने मेडिकल कॉलेज की टीम में कई साल से ओपनिंग करता आ रहा हूँ। 
खैर, जब मैं सरस्वती शिशु मंदिर में चतुर्थ कक्षा में था। एक रोज जब स्कूल से घर आया तो देखा कि पिता जी नीचे लेटे हुए है। माता जी रो रही है। तब पिताजी को पैरालिसिस का पहला अटैक आया था। उनके शरीर का आधा हिस्सा paralysed हो गया था। अगले 3 साल तक लगातार पिता जी का इलाज चलता रहा। तीन साल के इलाज के दौरान लगातार खर्च होता गया और जो भी जमा-पूँजी गहने वगैरह हमारे पास थे, सब बिक गये तो माताजी सबको लेकर गॉव वापिस आ गयी। गाँव में लगभग 6 महीने रहने के दौरान पिता जी काफी हद तक ठीक हो गए तो उन्होंने पुनः शाहपुर आकर, खाद की एक एजेंसी खोल ली। किस्मत से यह काम भी जम गया। हम लोग शीघ्र ही फिर से खाते-पीते हो गए। लगभग 2 साल तक सब ठीक रहा। अचानक, पिता जी को दूसरी बार पैरालिसिस का अटैक आया। इसका इलाज भी 2 साल तक चला। लम्बी बीमारी से परिवार की आर्थिक स्थिति का वही बुरा हाल हो गया, जो हमारे साथ पहले भी हो चुका था।
अब मैं कक्षा 9 में पहुँच चुका था तो मेरी माताजी ने मुझे अपने डॉक्टर चाचा के पास पढ़ने के लिए मेरठ भेज दियामेरे 2 चाचा डॉक्टर है। इस तरह देखा जाये तो मैं अपने परिवार का पाँचवा डॉक्टर हूँ। (एक चाची व भाई भी डाक्टर ही है।)
मैंने कक्षा 9 मेरठ के गवर्नमेंट इंटर कॉलेज से पास की है। खैर, माता जी के अथक प्रयासों से पिता जी पुनः ठीक हुए। इस बार उन्होंने गाँव में ही गुड बनाने का क्रेशर खोल लिया। यह काम भी शीघ्र जम गया तो उन्होंने मुझे गाँव में अपने पास बुला लिया। पिता जी क्रेशर में तैयार गुड को, हर महीने ट्रक में लेकर पंजाब, गुजरात, या राजस्थान जाया करते थे। मैं भी कभी-कभी उनके साथ चला जाता था। गुड बेचने के दौरान मैंने कई स्थलों का भ्रमण किया। यहाँ से मेरी घुमक्कड़ी की शुरुआत हुई थी।
12 वी कक्षा पास करने के बाद, मै राजस्थान के कोटा में मेडिकल परीक्षा की तैयारी करने चला गया। इस साल फिर से पिता जी को पैरालिसिस का अटैक आया। घर की परिस्थिति ऐसी बनी कि मैं अपनी मेडिकल की तैयारी बीच मे छोड़ कर वापस लौट आया। घर खर्च चलाने के मैंने एक स्कूल मे 1500 रुपये महीने की नौकरी कर ली। निजी स्कूल में पढाने के साथ ट्यूशन भी पढ़ाने लगा।
इसके दो साल बाद पिता जी व माता जी से मेरी शादी के विषय़ पर विवाद हो गया। मैं गुस्से में घर छोड़ कर चला आया। शाम को पिता जी को फ़ोन करके जानकारी दी कि जब मैं डॉक्टर बन जाऊंगा तो ही वापस घर आऊँगा। मैंने दिल्ली मे 6000/- रूपया महीने की एक नौकरी कर ली। जिसमे मैं साइकिल पर घर-घर जाकर पत्रिकाएँ बेचता था। लगभग 8 महीने बाद, मुझे एक कॉल सेंटर मे 10000 रूपया महीने की नौकरी भी मिल गयी। अब इसके बाद मैंने घर आना-जाना भी शुरू कर दिया। पिता जी ने इसके बाद मुझसे कभी बात नहीं की। मेरा और पिताजी का, मेरे  डॉक्टर बनने का सपना कही खो चुका था। मै सिर्फ नौकरी पेशा बन कर रह गया था।
खैर, 1 साल बाद मुझे एक और काल सेंटर मे 18,000/- महीने की नौकरी मिली, जो 2 साल में बढ़ कर 28,000/- तक पहुँच गयी। सन 2011 में मैंने अपने छोटे भाई को अपने पास मेडिकल परीक्षा की तैयारी करने के लिए बुला लिया। मैंने उसका एडमिशन कोचिंग संस्थान मे करा दिया। जहाँ उसे दिक्कत होती, मै भी पढ़ा देता था लेकिन उस साल उसका सिलेक्शन नहीं हो पाया। अगले 6 महीने यू ही निकल गए। इस बीच वो कोचिंग सेंटर बंद हो गया जहाँ भाई पढ रहा था।
मैंने अपने छोटे भाई के लिए एक नया कोचिंग सेंटर तलाश किया। नये सर से टाइम लेकर में उनसे मिलने पहुँच गया। उन्होंने मुझसे अनेक सवाल पूछे। जिनका मैंने जवाब दे दिया। वो खुश हो गए और आधी फीस पर पढ़ाने को तैयार हो गए। अगले दिन उनका कॉल आया और पूछा की तुम क्यों नही आये? तो मैंंने कहा, "सर मैं खुद के लिए नहीं, छोटे भाई के लिए आपके पास आया था।" तो सर ने कहा कि तुम भी तैयारी करो, मैंने कहा, "सर इतने पैसे नही है कि दोनों भाईयों की फीस भर सकूँ। तो उन्होंने कहा कि नौकरी छोड़ दो, मै आधी फीस में ही तुम दोनों भाइयों को पढ़ा दूंगा। मैंने एक महीने तक सोच-विचार कर नौकरी छोड़ कर मेडिकल की पढाई में लग गया। सन 2012 का मेडिकल परीक्षा का रिजल्ट आया तो उसमें मेरी 242 वी रैंक के साथ सेलेक्शन हो गया। मैंने पिता जी के नंबर पर काल किया और हम दोनों काफी देर तक रोते रहे।
खैर, पिता जी की अस्वस्था को देखते हुए, मैंने मेरठ मेडिकल कॉलेज चुना। मेरठ मेरे घर के पास था। अतः पिता जी का इलाज भी वहाँ सम्भव हो जाता। मेरठ से देल्ही भी पास था। अतः खर्च चलाने के लिये मेरी नौकरी भी हो जाती। मेडिकल में एडमिशन लेने के 3 महीने बाद ही पिता जी का देहांत हो गया। मै बहुत परेशान हो गया था। इस कारण 2 महीने तक कॉलेज भी नहीं जा पाया।
मेरी एक पारिवारिक मित्र डाक्टर मधु जी की कोटद्वार के सिद्धबली बाबा मे बहुत श्रद्धा है। उन्होंने मुझे वहाँ जाने को बार-बार कहा। एक दिन मैं कोटद्वार सिद्धबली दर्शन के लिये आया। फिर वहाँ से पौड़ी घूमने के लिए निकल गया। सतपुली से आगे एक प्रेग्नेंट/गर्भवती औरत जीप में बैठी। जिसे ब्लीडिंग हो रही थी। उसे बहुत दर्द हो रहा था। उसकी जितनी मदद हो सकती थी उतनी मदद की गयी।
बस यही टर्निंग पॉइंट था। वापस कालेज आया और पढाई मे जुट गया। हर महीने जो दवाई इकठ्ठा होती थी उसे उत्तराखंड के दूर-दराज गाँव में जाकर दे आता था। आज भी ये सिलसिला कायम है। छोटे भाई का सिलेक्शन नही हो पाया तो पिछले साल उसने तैयारी छोड़ दी
एक बहुत महत्वपुर्ण घटना तो रह ही गयी कि मेडिकल में एडमिशन के 1 महीने बाद पिता जी ने मेरी शादी अपने एक मित्र की बेटी से करवा दी थी। जिसको उसके भाई ने सम्पति के लालच मे घर से निकाल दिया था। इस लड़की ने कठिनाइयों के समय मेरा जी जान से साथ दिया है।
अभी तक हमारे कोई बच्चा नहीं है। हम दोनों ने आपसी सहमति से तय किया था कि बच्चे का विचार जीवन में कामयाबी के बाद ही आयेगा।
यह मेरी कहानी पिता जी के जन्मदिवस पर उनको समर्पित है।                       

पिताजी व माताजी

मेडिकल कालेज में पहला इनाम

मेडिकल कालेज बैच मेट
 
मेरा पहला मरीज


घुमक्कडों के साथ कुछ पल

22 टिप्‍पणियां:

Shyam Sunder ने कहा…

Dr saab ki mehant aur lagan ko bahut samman ,jo unhone itni lagan se ye sab hasil kar paaye
Unke mata ,pita ko bhi namaskar jinhone unka har samy saath diya

Bahut badhai ho aapke carrer ke liye

Manjeet Chhillar ने कहा…

संघर्ष की ऐसी गाथा, वाकई हर एक के लिए प्रेरणा का स्त्रोत बनी रहेगी। मित्र अजय त्यागी को जीवन में सदैव सफलता मिले।

Rakesh bishnoi ने कहा…

dr. shahb aapne fir ahsash dilwa diya ki sangresh karne walo ki kabhi haar nahi hoti .... maan gaye aapko bus aage bhi aap esse hi rahoge yahi umid hai aapse

Vasant Patil ने कहा…

अजयभाई ने आजतक जो संघर्ष किया उसका मीठा फल उन्हें मिला,तुफनोंसे लड़ने वाले की कभी हार नहीं होती, डरनेवालोंकी नैय्या कभी पार नहीं होती,
सलाम है डॉक्टर साहब

Vasant Patil ने कहा…

अजयभाई ने आजतक जो संघर्ष किया उसका मीठा फल उन्हें मिला,तुफनोंसे लड़ने वाले की कभी हार नहीं होती, डरनेवालोंकी नैय्या कभी पार नहीं होती,
सलाम है डॉक्टर साहब

amit lavaniya ने कहा…

प्रेरणादायी आत्मकथा आपकी कहानी बहुत लोगों को प्रेरणा व कठिन समय में धैर्य से काम लेने की हिम्मत देगी बहुत कठिन समय झेलने के बाद सफ़लता की ख़ुशी कई गुणी होती है 👍💐💐

Naresh chaudhary ने कहा…

अपने सारे ग़मों को ‘दृढ़ इच्छशक्ति’ में बदलकर जीवन में सतत संघर्ष करने के हौंसले को सलाम 🙏

Dev Rawat ने कहा…

जिसने हार नहीं मानी जीत उसी की होती है
डॉक्टर त्यागी जी को सलाम

lokendra parihar ने कहा…

महान सख्शियत वाले हमारे मित्र अजय जी को मेरा प्रणाम आपने दुःख भरे दिन बीते रे भैया अब सुख आयो रे गीत को आज सही साबित किया

shripat rai ने कहा…

जीवन मे बहुत से ऐसे लम्हे आते है जी आदमी हतोत्साही हो जाता है और ऐसा होते आत्म विश्वास की कमी सोंचने समझने नही देता । पर इस आत्मकथा को पढ़कर ये सम्बल मिलता है कि विपरीत परिस्थिति में सकारात्मक संघर्ष नई ऊंचाइयों की ओर ले जाता है और डॉ अजय इसका प्रमाण है । बहुत बधाई और शुभकामनाय ।।। जाट देवता को साधुवाद ।।।।

Rohit kalyana ने कहा…

जाट भाई भावुक कर दिया अजय जी के जीवन ने, इंसान हैं या हिमालय जो हर मुसीबत में अटल खड़ा रहा । बहुत-बहुत धन्यवाद् ऐसे देव-पुरुष के बारें में रूबरू कराने के लिए । दुआ करता हूँ अजय जी एवेरेस्ट से भी ऊँची उंचाईयों पर जायें ।

anubhav kumar ने कहा…

Sandeep Bhai aapne bhahut achha kia ishko blog pr upload karke, ye sabhi logo k liye prerna ka source baneega... DR. tyagi aapke junun Aur sad-gi ko hands-off....

umesh jangid ने कहा…

मंजिल मिले ना मिले
ये तो मुकदर की बात है!
हम कोशिश भी ना करे
ये तो गलत बात है...
जिन्दगी जख्मो से भरी है,
वक्त को मरहम बनाना सीख लो,
हारना तो है एक दिन मौत से,
फिलहाल वक़्त के साथ जिन्दगी जीना सीख लो..!!

अजय भाई जी की एक सच्ची कहानी जैसे अजय भाई ने किसी मूवी का किरदार निभाया हो । अजय भाई आप हमेशा नई ऊंचाइयों को छुओ और आप बड़े नेकदिल इंसान है
आपका का ऋणी
उमेश

sachin gawade ने कहा…

Sir ji aap ki story ham sabhi ko prerana deti rahegi.

दर्शन कौर धनोय ने कहा…

सेल्यूट अजय आपको ओर आपकी मेहनत को 👍ईश्वर आपके जीवन में उन्नति और तरक्की दे

anil sharma ने कहा…

नमन अजय भाई आपके हौसले को।

Mahesh Gautam ने कहा…

बुलंद होंसले हो तो ज़ाहिर है मिलना मंज़िल का.. जुनून हो तो ख्वाब बदलते हैं हकीक़त में खुद-ब खुद.......डॉ साब आपके लिए.....साभार संदीप भाई

Mahesh Gautam ने कहा…

बुलंद होंसले हो तो ज़ाहिर है मिलना मंज़िल का.. जुनून हो तो ख्वाब बदलते हैं हकीक़त में खुद-ब खुद.......डॉ साब खास आपके लिए.....साभार संदीप भाई

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा आज गुरूवार (01-06-2017) को
"देखो मेरा पागलपन" (चर्चा अंक-2637)
पर भी होगी।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Pareevrajak Neeraj ने कहा…

हर इन्सान के जीवन में उतार चढाव आते हैं लेकिन कुछ ही लोग जीवन क उतार में खुद को संयमित कर भविष्य के लिए झूझ रहे होते हैं ऐसे लोग ही स्वर्णिम भविष्य के हक्कदार होते हैं |

Chandresh Samadhiya ने कहा…

अजय भाई ने जीवन की कठिनाइयों का बखूबी सामना करके आगे बड़े जो कि कइयों के लिए एक जीवंत उदाहरण है और हम सभी को उनसे प्रेरणा लेनी चाहिए

Chandresh Samadhiya ने कहा…

साथ ही संदीप भाई आपका भी हृदय से आभार जो आपने अपने एक साथी की संघर्षपूर्ण जीवनगाथा को अपने ब्लॉग के माध्यम से अधिक से अधिक लोगों के सामने लाये जिससे हर वो व्यक्ति जो आपके ब्लोग्स को पड़ता होगा अजय भाई से सीख सके कि " रुक जाना नहीं तू कहीं हार के.... ओ राही चला चल" जय हो������

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