बुधवार, 13 नवंबर 2013

Dharamshala to Bridge धर्मशाला से करेरी मार्ग वाले पुल तक

करेरी-कांगड़ा-धर्मशाला यात्रा के लिंक नीचे दिये है।

01- आओ करेरी झील धर्मशाला देखने चले।
02- धर्मशाला से करेरी गाँव की ट्रेकिंग भयंकर बारिश के बीच।
03- करेरी गाँव के शानदार नजारे, और भूत बंगला
04- धर्मशाला की ड़ल लेक।
05- धर्मशाला के चाय बागान के बीच यादगार घुमक्कड़ी।
06- कुनाल पत्थरी माता मन्दिर, शक्ति पीठ माता के 52 पीठ में से एक।
07- नगरकोट कांगड़ा का मजबूत दुर्ग / किला
08- मैक्लोड़गंज के भागसूनाग स्विमिंग पुल के ठन्ड़े पानी में स्नान  Back to Delhi


KARERI-KANGRA-DHARAMSHALA-02

करेरी गाँव धर्मशाला शहर से लगभग 20-25 किमी दूर है। करेरी गाँव सड़क से जुड़ चुका है। लेकिन वाहन मिलने की सभावना नहीं के बराबर होती है। यदि धर्मशाला से करेरी तक की दूरी वाहन से तय की जाये तो यही दूरी बढकर 40 किमी तक पहुँच सकती है। बस से धर्मशाला उतरने के बाद राकेश बोला, जाट भाई हम चार लोग है जहाँ तक पक्की सड़क है वहाँ तक कार कर लेते है। ना भाई कार वाला ज्यादा पैसे माँगेगा। एक बार पता कर लेते है। मैंने कहा "तुम्हे कार में जाने की ज्यादा इच्छा है तुम्ही कार का किराया पता कर आओ।" राकेश और मनु टैक्सी वालों के पास बात करने चले गये। मनु का दोस्त और मैं वही लेंटर के नीचे खड़े रहे। कार वाले ने उस जगह तक पहुँचाने के 1500 रु माँग लिये, जहाँ तक गाड़ी जा सकती थी। यह दूरी यदि किसी ऑटो या बस से तय की जाये तो मुश्किल से 200 रु भी नहीं लगने वाले। मैंने कहा, यहाँ से शेयरिंग आधार पर चलने वाली सूमो या अन्य छोटी गाडियाँ उस ओर जरुर चलती होगी, जहाँ से ट्रेकिंग शुरु होती है। चलो उसका पता करते है।




लोकल बस ने हमें जहाँ उतारा था, उससे थोड़ा सा आगे जाने पर एक तिराहा जैसा है जहाँ से मैक्लोड़गंज जाने के लिये गाडियाँ उल्टे हाथ मुड़ती है। बारिश अपने पूरे वेग से झमाझम बरस रही थी। राकेश और मेरे पास बारिश से बचने के लिये फ़ोन्चू नामक बुरका था। यह वाटर प्रूफ़ बुरका (फ़ोन्चू) इतना अच्छा जुगाड़ है कि बारिश कितना भी जोर लगा ले इसके अन्दर रहने वाला बन्दा और उसका बैग नहीं भीग सकता। यह बहुत हल्का व खुला जुगाड़ है। मनु और उसका दोस्त/रिश्तेदार बारिश से बचने के लिये छतरी खरीदने चले गये। थोड़ी देर में वे तीन छतरी खरीद लाये। तीसरी किसकी ले आये? तीसरी छतरी राकेश की थी। क्यों भाई फ़ोन्चू पर विश्वास नहीं है क्या? नहीं जाट भाई छतरी की आवश्यकता भी पड़ ही जाती है।

जोरदार बारिश के बीच हम चारों मैक्लोड़गंज तिराहे की ओर चल दिये। छतरी वाले साथी 100 मीटर दूरी पार करने में तंग हो गये। मनु एक पार्किंग में घुस गया। मैंने पूछा "क्या हुआ?" मनु बोला जाट भाई छतरी में बैग भीगने से नहीं बच पा रहा है। चलो सामने दो-तीन दुकाने दिख रही है उनमें फ़ोन्चू हुआ तो ले लो। मनु सामने वाली दुकान में फ़ोन्चू लेने पहुंच गये। वहाँ फ़ोन्चू तो था लेकिन उसकी हालत ऐसी नहीं थी कि वो पहाडों की बारिश को एक घन्टा भी झेल पाता। हम फ़ोन्चू लिये बिना जोरदार बारिश में ही धर्मशाला के मैक्लोड़गंज तिराहे से सूमो या बस के जरिये आगे जाने के लिये खड़े हो गये।

हमे तिराहे पर खड़े हुए 5 मिनट ही हुए होंगे कि एक मिनी बस आ गयी। उस बस में इतनी भीड़ थी कि उसमें आम इन्सान का घुसना ही कठिन था और हमारे पास तो मोटे-ताजे बड़े-बड़े रकसैक बैग थे। हमने दूसरी बस की प्रतीक्षा करनी बेहतर समझी। दो-तीन मिनट ही बीते होंगे कि एक सूमो आ गयी। सूमो में हमारे बैठने के लिये तो जगह थी लेकिन यहाँ रकसैक परेशानी बन गये। सूमो वाला हम चारों को लेकर जाने बिना मानने वाला नहीं था। उसने कहा आप लोग घुसो तो सही, बैग भी किसी ना किसी तरह एडजस्ट हो जायेंगे। हम चारों उस सूमों में घुस गये। मैं और राकेश पीछे वाली सीटों पर बैठ गये। बड़ी मुश्किल से पीछे वाला दरवाजा बन्द हो सका। कुछ देर बाद हमारी सूमो एक जगह जाकर रुक गयी। यहाँ पता लगा कि कुछ दिन पहले ही लम्बी चली बारिश के कारण यहाँ सेना के इलाके का एक पहाड़ खिसक कर नीचे सरक गया है।

खिसके पहाड़ को देखकर आगे बढे। आगे जाकर उस जगह पहुँच गये, जिसको स्थानीय लोग ठेके के नाम से बुलाते है। यहाँ मोड़ पर शराब का एक ठेका भी बना हुआ है यहाँ से करेरी व ड़ल लेक का मार्ग उल्टे हाथ अलग होता है। बारिश अपने पूरे शबाब पर बरस रही थी। सूमो से उतरते ही सबसे पहले फ़ोन्चू ओढना पड़ गया। यहाँ से आगे जाने के लिये मन कर रहा था कि पैदल ही निकल ले, लेकिन हमारे पास 5-6 किलो का टैन्ट था, उसे लादकर पहाड पर चढ़ने की तो मजबूरी थी लेकिन सड़क पर उसे बेफ़ालतू में क्यों ढोया जाये? मनु व राकेश सामने से एक ऑटो ले आये। हम चारों उस ऑटो में सवार हो गये। ऑटो वाला भी बड़ा ड़रपोक किस्म का बन्दा था। वह बोला कि आप चारों को पीछे वाली सीट पर बैठना होगा। अगर हमारे पास बैग नहीं होते तो पीछे वाली सीट पर सभी समायोजित हो सकते थे, किन्तु बैग के कारण हममें से एक को आगे बैठना ही पड़ा। चालक बोला आगे आर्मी चैक पोस्ट है वहाँ उतरना होगा। ठीक है उतर जाऊँगा। अब चल तो सही।

ऑटो हमें लेकर ठेके नामक जगह से आगे चल पड़ा। कुछ दूर चलते ही आर्मी वाला इलाका आ गया यहाँ एक चैक पोस्ट के पास मैं उतर गया। चैक पोस्ट से आगे निकलते ही एक मोड़ था। मोड़ पार करते ही जो शानदार चढाई थी उसे देख मसूरी आर्यसमाज मन्दिर वाली वो चढ़ाई याद आ गयी, जहाँ से होकर छोटी गाडियाँ धनौल्टी की तरफ़ निकल जाती है जबकि बड़ी गाडियाँ कई किमी लम्बा चक्कर लगाकर आती है। एक बार मैं अपनी बाइक से अपनी माताजी के साथ उस मार्ग से जा चुका हूं जिसके बारे में आपको बताया जा चुका है। चढ़ाई इतनी खड़ी है कि ऑटो मुझे लिये बिना ही इस चढ़ाई पर चढ़ने में मना करने की हालत तक आ पहुँचा। मैंने सोचा कि लगता है कि ऑटो को धक्का लगाना पडेगा लेकिन मेरे पहुँचने से पहले ही ऑटो ने वह चढ़ाई पार कर ली। यह चढ़ाई ड़ल लेक तक बनी रहती है। ड़ल लेक से होते हुए हम आगे चलते रहे। बारिश रुकने का नाम लेने को तैयार नहीं थी।

ड़ल से उल्टे हाथ मुड़ते ही एक मन्दिर दिखाई दिया। सीधे हाथ ड़ल झील का हरा पानी दिख रहा था। अपना ऑटो बिना रुके आगे बढ़ता रहा। ड़ल के आसपास बारिश के कारण घूमने की इच्छा भी नहीं हुई थी। यहाँ ड़ल के आगे निकलते ही सड़क Y आकार में विभाजित हो जाती है। हमारा ऑटो उल्टे हाथ ढलान वाली दिशा में चलने लगा। अब आगे का मार्ग पूरी तरह ढ़लान वाला दिखाई दे रहा था। सड़क की हालत बारिश के बावजूद अच्छी थी। दो किमी जाने के बाद सतोवरी नामक जगह आ गयी। ऑटो वाले ने बताया कि बस यहाँ तक आती है। जबकि सड़क अभी भी दो किमी आगे तक बनी हुई है। सतोवरी से आगे सड़क के दोनों ओर शानदार हरियाली छायी हुई है। हम ऑटो की सवारी का लुत्फ़ उठा ही रहे थे कि अचानक सड़क समाप्त हो गयी। ऑटो वाला बोला आपको इससे आगे पैदल ही जाना होगा। 

बारिश कम होने का नाम लेने को तैयार नहीं हो रही थी। हमने ऑटो वाले को उसके 150 रु दे दिये। लगे हाथ उसका मोबाइल नम्बर भी ले लिया गया कि यदि बारिश के कारण हमें एक दो किमी से ही वापिस आना पड़ा तो ऑटो वाले को बुला लेंगे। ऑटो वाला बोला, अगर मुझे बुलाओगे तो पूरे 300 रुपये चार्ज लगेगा। ऑटो वाला हमें छोड़ कर चला गया। जहाँ यह सड़क समाप्त हो रही थी उसके ठीक आखिरी किनारे पर एक कार, कई स्कूटर व बाइक खड़ी हुई थी। हो सकता है कि नजदीक ही कोई गाँव हो जिनकी बाइके यहाँ खड़ी हो। ऑटो से बाहर निकलते ही बारिश से बचने के लिये अपना फ़ोन्चू ओढ लिया गया था। कैमरा बारिश के पानी के ड़र से बैग के अन्दर पैक किया हुआ था। राकेश ने अपना मोबाइल निकाल और यहाँ के कई फ़ोटो ले ड़ाले। 

फ़ोटो सैसन समाप्त होने के बाद हमने करेरी गाँव की ट्रेकिंग आरम्भ कर दी। सडक से उतरते ही पहला कदम कच्ची जमीन पर पड़ा तो पैर सीधा दो इन्च कीचड़ के अन्दर समा गया। मैंने सोचा कि हो सकता है कि मेरा पैर गलत जगह पड़ा हो लेकिन अगले कुछ कदम बेहद सावधानी से रखने के बावजूद हमारे कदम कीचड़ में ही घुस रहे थे। पगड़न्ड़ी की हालत इतनी ज्यादा खराब हो चुकी थी कि हमें पगड़न्ड़ी छोड़कर उसके किनारे-किनारे आगे बढ़ना पड़ा। कोई सौ मीटर चलने के बाद पगड़न्ड़ी की हालत कुछ बेहतर मिली। पक्की पगड़न्ड़ी थी अन्य कोई मार्ग दिखाई भी नहीं दे रहा था इसलिये उस पगड़न्ड़ी पर सीधे चलते रहे। नीचे एक अन्य मार्ग उतरता हुआ दिखाई दिया लेकिन देखने से लगा कि यह नदी तक जाने का मार्ग होगा। जबकि वह असली मार्ग था। जो करेरी जा रहा था।

हम पगड़न्ड़ी पर बढते जा रहे थे कि हमारे सामने एक बरसाती नाला आ गया। मैंने कहा कि लगता है कि हमने बरसात में यहाँ आकर भूल की है। चलो यही से लौट चलते है। अभी तक हम केवल आधा किमी चलकर आये है बारिश के कारण मार्ग की बदहाली देख ही रहे है। बारिश के कारण सारे पहाड़ पिलपिले हुए पड़े है। अगर कही पहाड़ खिसक गया तो हम अटक जायेंगे। चलो यही से लौट चलते है। अगर मैं अकेला होता तो वही से लौट आता। लेकिन साथी करेरी से पहले लौटने की बात मानने को तैयार नहीं हुए। तीनों बोले जो हो जाये करेरी गाँव पहुँच कर ही दम लेंगे। चलो ठीक है। पहले यह नाला पार करो। बरसाती नालों का पता नहीं होता कि कितना गहरा निकल जाये। इसलिये मैं सबसे आगे पानी में घुस गया। पानी में घुसने से पहले मैंने राकेश की छड़ी पानी में घुसाकर पानी की गहराई नाप ली।

नाले में लगभग दो फ़ुट पानी तो होगा ही, मुझे अपनी पैन्ट घुटने से भी ज्यादा ऊपर करनी पड़ गयी। अभी तक हम भीगने से बचे हुए थे लेकिन नाले को पार करने के चक्कर में सबकी पैन्टे भीग गयी। किसी तरह तूफ़ानी नाला पार किया। यह शुक्र रहा कि नाला में पानी की गति बहुत ज्यादा नहीं थी। अगर पानी की गति तेज होती तो पानी में पैर टिकाने मुश्किल हो जाते। किसी तरह एक दूसरे के सहारे नाला पार किया। नाला पार कर कुछ आगे बढे ही थे कि मुझे अपने पैर के पंजे पर जौंक दिखायी दी। जौंक देखते ही मेरे कान चौकन्ने हो गये। आँखे पहले ही सजग थी अन्यथा जौंक दिखायी ही नहीं देती। मुझे साँपों से उतना ड़र नहीं लगता, जितना जौंक से लगता है सांप इन्सान से ड़र कर भागता है जबकि जौंक इन्सान के चिपकने को तैयार रहती है। जौक की आदत ऐसी होती है कि शरीर से चिपकने के बाद हटाये हटती नहीं है।

मैंने जौंक देखते ही अपनी चप्पल निकाली और जौंक पर दे दनादन मारना शुरु कर दिया। लगभग 7-8 चप्पल मार खाने के बाद जौंक मेरे पैर से अलग हुई। मुझे चप्पल से अपना पैर पीटते देख अन्य साथी बोले क्या हुआ? जौंक चिपट गयी थी। सब अपने पैर देख लो जौंक जरुर चिपकी होगी। हम चार में से तीन बन्दों को जौंक चिपकी हुई मिली। आगे बढ़ते रहे। एक नाला और आ गया। यह थोड़ा आसान था आसानी से पार हो गया। इसे पार करते ही एक गाँव दिखायी दिया। नाम याद नहीं आ रहा है। यहाँ गाँव वालों से करेरी गाँव का मार्ग पूछा उन्होंने बताया कि आप लोग गलत आ गये हो। अरे, अब फ़िर वापिस जाना होगा। 

गाँव वालों ने बताया कि नहीं वापिस जाने की जरुरत नहीं पडेगी। गाँव से एक खतरनाक पगड़न्ड़ी सीधा नीचे जाती है। खतरनाक पगड़न्ड़ी का नाम सुनते ही आँख हद से ज्यादा खुलने लगी। शुक्र रहा कि फ़टी नहीं, बड़ी मुश्किल से आँखे ठीक की। गाँव वालों ने बताया कि गाँव से जो पगड़न्ड़ी नीचे जा रही है बेहद तीखा ढलान है पूरा मार्ग कीचड़ व लम्बी घास से भरा पड़ा है। अगर आप लोग उस ढलान से सावधानीपूर्वक उतर गये तो फ़िर कोई समस्या नहीं आयेगी। इस पगड़न्ड़ी से आप बहुत जल्द नीचे वाले मार्ग में मिल जाओगे। हम अभी बाते कर ही रहे थे कि गाँव में घरों में अपना झन्ड़ा लहराती हुई जौंक दिखाई देने लगी। आगे खाई पीछे कुआँ। पीछे वाला मार्ग देख ही लिया है। आगे खाई वाला भी देखते है कि कैसा होगा? 

हम गाँव से नीचे जाने के लिये चल दिये। सबसे आगे मुझे ही रहना था। मैं बीच-बीच में जौंक भी देखता जा रहा था कि कही कोई चिपक कर लव-लव ना कर रही हो। इस ढलान में एक जगह जबरदस्त कीचड़ मिला। कीचड़ में घुसे बिना आगे जाना मुमकिन नहीं हो पाया। कीचड़ से निकल कर पानी की तलाश में नीचे उतरते रहे लेकिन तीखी ढलान पर पानी मिलना भी दुश्वार हो गया। आखिरकार कीचड़ सने पैरों से यह ढलान उतरनी पड़ी। इस ढलान में एक जगह लोहे की तार से मार्ग बन्द मिला लेकिन वहाँ लगे लकड़ी के फ़ट्टों पर निगाह जाते ही आगे का मार्ग मिल गया। यहाँ से आगे लम्बी घास से होकर निकलना पड़ा। लम्बी घास में साँप होने का अंदेशा हो जाता है लेकिन हमें सांप की चिन्ता नहीं थी। यह ढलान असली पगड़न्ड़ी में जाकर मिल गयी। सभी साथ उतर रहे थे। एक बार फ़िर सबने अपने पैर देख ड़ाले कि कही जौंक ना चिपकी हुई हो?

यहाँ से आगे निकलते ही एक ऐसा मोड़ आया जहाँ कई पगड़न्डियां नीचे जाती हुई दिखायी दी। पहाड़ के किनारे जाने के बाद पता लगा कि हम किसी से भी नीचे उतर जाये सभी नदी पार करा रही है। यहाँ आगे एक नदी थी जिसको पार करने के लिये कई पगड़न्ड़ी बना दी गयी थी। हम इस पुल को पार कर आगे बढ़ चले। कुछ दूर चलते ही एक नदी दिखायी देने लगी। थोड़ा सा और आगे बढे तो नदी किनारे सड़क दिखायी दी। बारिश अब कुछ हल्की हो चली थी। जौंक के आतंक के कारण हम बिना रुके नीचे उतरते जा रहे थे। जैसे ही सड़क के नजदीक पहुँचे तो वहाँ कुछ घर व दुकाने दिखायी देने लगी। दुकान देखते ही नमक की याद आयी। 

सड़क पर जाते ही हम बारिश से कुछ देर तक राहत पाने के इरादे से यात्री प्रतीक्षालय में घुस गये। यहाँ सबने अपने-अपने कपड़े अच्छी तरह खंगाल ड़ाले। सभी के पैरों मॆं जौंक चिपकी हुई पायी गयी। हमारी जौंक तो किसी तरह छूट भी गयी लेकिन मनु के पैर पर एक जौंक चढ़कर घुटने से भी 7 इन्च ऊपर पहुँच गयी थी। मनु बार-बार घुटने से ऊपर खुजली महसूस कर रहा था। यह जौंक बहुत मुश्किल से छूट सकी। सभी जौंक छुड़ाने के उपरांत मनु एक दुकान पर गया और वहाँ से नमक का एक किलो का पैकेट ले आया। जब तक मनु नमक लेकर आया, तब तक हम सड़क किनारे बने यात्री प्रतीक्षालय में बैठे रहे। जो जौंके हमने अपने शरीर से हटाई थी वे यात्री प्रतीक्षालय में अपना झन्ड़ा बुलन्द करती दिखायी दे रही थी। मनु जो नमक लाया, उसका प्रयोग करके सभी जौंकों का काम तमाम कर दिया गया।

यहाँ से आगे बढने पर एक पुल दिखायी देने लगा। पुल तक का मार्ग साधारण मार्ग है। बहुत हल्की-फ़ुल्की चढ़ाई ही इस सड़क पर दिखायी दी। यहाँ सड़क पर साफ़ पानी आर-पार बह रहा था मैंने अपने पैर साफ़ किये। एक किमी की दूरी तय करने के बाद यह पुल आ गया। पुल पर खड़े होकर नदी में देखा तो नदी का साफ़ पानी देखकर मन खुश हुआ। हमारी खुशी ज्यादा देर तक नहीं रह पायी क्योंकि पुल के दूसरी ओर देखने गये तो वहाँ पुल के दूसरी तरफ़ कुछ लोग जमा हुए थे। गाँव के लोग किसी खास कार्य की तैयारी में गाँव से दूर जुटे हुए थे। हम पुल से आगे उस भीड़ की ओर बढ़ गये। 

यहाँ खड़े एक स्थानीय व्यक्ति से पूछा कि गाँव वालों की भीड़ यहाँ क्यों जमा है? उसने बताया कि करेरी गाँव के निचले वाले हिस्से में रहने वाली दो चचेरी बहने अपनी गाय-भैस नदी किनारे चरा रही थी। उनकी भैंस भूस्खलन के कारण नदी में गिरने वाली थी। ये दोनों बहने उस भैंस को बचाने के चक्कर में खुद नदी में बह गयी। किस्मत देखो, जिस भैंस के चक्कर में वे दोनों बहने नदी में गिर गयी थी वह भैंस सुरक्षित निकल आयी थी। (अगले लेख में आपको करेरी गाँव के खूबसूरत नजारे दिखाये जायेंगे)






















5 टिप्‍पणियां:

  1. जाट भाई अक्षरक्ष याद रहती है आपको हमें तो अपनी यात्रा जिसे एक महीना भी नही हुआ उसे याद करने के लिये भी फोटोज का सहारा लेना पडता है

    ऐसी खतरनाक जोंक मैने पहले कभी नही देखी जो खून पी पीकर लम्बी होती जाती हैं

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  2. रोमान्चं व दिलचस्प पोस्ट थी ये पढ कर मजा आया.

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  3. भाई जी फ़ोन्चू पर पूरा विश्वास था कि मेरे कमेँट पर पानी नही फिरेगा सुबह 09:00 AM से कमेँट करने की कोशिश कर रहा हूँ पर हो ही नही रहा था (कारण था नेट की तकनिकी दिक्कत) चलो फ़ोन्चू कुल मिला कर ठीक रहा।

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  4. रोमांचक यात्रा साझा करने के लिए धन्यवाद...अगली कड़ी का इंतज़ार रहेगा...

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  5. बहुत ही रोमांचकारी यात्रा है जहाँ इंसानो ने नहो जोको ने स्वागत किया। .---तभी तो कहावत है कि --'क्या जौक कि तरह चिपके को भाई हाहा हाहा एक फोटू इस भागयशाली जौक का भी होता तो दीखता कि ये होती कैसी है ?

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