सोमवार, 21 नवंबर 2011

HAR KI DOON हर की दून, भाग 5

हर की दून बाइक यात्रा-
हर की दून से वापसी में कुछ दूर चलते ही एक मैदान नुमा ढलान आ जाती है जिस पर अपने जोडीदार को पता नहीं क्या ऊपाद सूझी कि वह अचानक से भागने लगा, मैं समझा था कि फ़िर से कोई जंगली जीव दिखाई दिया है, अत: मैं भी कुछ दूर तक उसके पीछे-पीछे भागा और उसको रुकने को कहा। मैंने उसे भागने का कारण पूछा, जब उसने अपने भागने का कारण बताया तो मैंने अपना सिर पकड लिया। आप सोच भी नहीं सकते कि सांगवान क्यों भागा था। चलो बताता हूँ सबसे पहले धर्मेन्द्र सांगवान की जोरदार बढाई करता हूँ कि बन्दा पहली बार किसी पैदल भ्रमण पर आया था और देखो कि पहली बार में ही कितने जबरदस्त व खतरनाक रोमांचक स्थल पर आना हुआ। यहाँ से पहले सांगवान केवल हरिद्धार व ऋषिकेश से आगे नहीं गया था। जब भाई ने कोई खास पहाडी यात्रा भी नहीं की तो उसे पता ही था कि पहाड पर कैसी-कैसी आफ़त आती है। वो तो शुक्र रहा कि पहले दिन मात्र 14 किमी पैदल चले थे, मैं तो उसी दिन हर की दून चला जाता यदि वहाँ रहने का पक्का प्रबंध होता। अब ये ठीक ही रहा सांगवान के हिसाब से कि हम पहले दिन मात्र 14 किमी चलने पर ही रुक गये थे यदि हम उसी दिन आगे चले जाते तो भाई का तो काम पहले दिन ही हो गया था। वैसे मैंने पहले पूछा भी था कि पैदल चलने का कुछ अभ्यास भी किया है कि नहीं, मुझे बताया कि मैं प्रतिदिन 7-8 किमी तो पैदल चल ही लेता हूँ, अत: मैं पूरी तरह आश्वस्त था कि हर की दून की पैदल यात्रा में हम दोनों को कोई समस्या नहीं आयेगी। दूसरे दिन की पैदल यात्रा में हमे ओसला/सीमा से हर की दून जाकर वापस ओसला तक तो आना ही था, अगर हम ओसला दिन 4 बजे तक भी आ जाते तो रात में ताल्लुका रुकने की सोच सकते थे।

यह झरना उसी जगह था जहाँ भालू नजर आया था।
पहला भाग देखना है तो यहाँ            दूसरा भाग देखना है तो यहाँ
                  तीसरा भाग देखना है तो यहाँ                       चौथा भाग देखना है तो यहाँ

भाई ने अन्जाने कहो या जानबूझ कर एक बडी गलती कर दी वो ये कि हर की दून पहुँचने तक सांगवान के सीधे पैर के घुटने में हल्का-हल्का दर्द शुरु हो गया था। जिसके बारे में भाई ने मुझे बताया ही नहीं ताकि उसको कुछ सावधानियाँ बताता कि अब आगे मार्ग में ऐसे चलना। मुझे पता जब चला जब सांगवान ढलान समाप्त होने के बाद बैठा हुआ मिला। मैंने कहा कि क्या बात है बडी जल्दी जाने की सोच रहे हो अभी तो 12 किमी ओसला बाकि है अभी से क्यों भाग रहे हो। तब उसने मुझे बताया कि "मैं जल्दी जाने के लिये नहीं घुटने के दर्द के कारण भागा था, मैं सोच रहा था कि भागने से मेरा पैर खुल जायेगा व घुटना दर्द नहीं करेगा"। उसकी ये बाते सुनकर मैं बोला अबे तेरी तो! तुम्हे पता है कि तुमने तुमने भागकर ये क्या बेडागर्क कर लिया है तुम सौ मी ही भागे हो लेकिन दर्द के कारण ये तुम्हे 20 किमी के बराबर भारी पडेंगे, देख लेना और हाँ अब आगे के सफ़र में ये ध्यान रहे कि जिस पैर में दर्द है उसे उतराई में आगे रखो व चढाई में पीछे यानि कि दर्द वाले को जितना हो सके उतना कम मोडो क्योंकि दर्द वाला पैर मुडने पर नानी याद दिलाता है गौमुख यात्रा में मैं खुद भुगत चुका हूँ। खैर उस समय तक सांगवान के पैर में इतना ज्यादा दर्द नहीं था कि पैदल चला ना जाये हम आराम-आराम से चलते रहे, जहाँ भालू के पैरों के निशान मिले थे हम पानी पी कर आगे बडे, एक झरना आता है उसका फ़ोटो भी लिया था आपने देख ही लिया होगा। यहाँ से एक पेड का लठ जैसा डन्डा तलाश कर दे दिया गया।

प्रकृति का एक दीवाना, प्रकृति के ध्यान में मग्न है।

इसके बाद हमारी चलने की गति जो पहले प्रति घन्टा तीन-चार किमी के मध्य थी अब घट कर 2 किमी पर आ गयी थी। मार्ग आधा तो बिल्कुल हल्की-हल्की उतराई वाला था जिस पर ज्यादा मुश्किल नहीं आई थी, लेकिन जब ओसला व दून के बीच वाली पहाडी की उतराई आयी तो सांगवान भाई की हालत बुरी होने लगी हर कदम पर दर्द होने लगा। इस उतराई को उतरने में ही पूरा एक घन्टा लग गया था। इस उतराई के बाद फ़िर से गेहूँ के खेतों के बीच आ गये थे। यहाँ पर सभी खेतों में गेहूँ की फ़सल बोई हुई थी जब हम वहाँ थे तो गेहूँ लगभग चार या पाँच ईंच के हो चुके थे। लोगों ने चल-चल के खेतों के बीचों बीच से पगडंडी बनाय़ी हुई थी। यहाँ काफ़ी बडा मैदान था जिस कारण खेत भी काफ़ी बडॆ-बडे थे। हर खेत पार करने पर हमें 2-3 फ़ुट नीचे उतरना पडता था जिस पर सांगवान को बडी समस्या आती थी, लेकिन थोडा सा भी मैदान आते ही बन्दा दर्द की परवाह ना करते हुए तेजी से चलता था। धीरे-धीरे ये खेत भी पार हो गये, अब आयी असली समस्या वो गहरी खाई जिस पर जाते समय साँस फ़ूल गयी थी अब यहाँ हमें सांगवान के पैर में दर्द के कारण चढाई के मुकाबले तीन गुणा समय ज्यादा लगा था। किसी तरह भाई ने ये भी पार कर ही ली, अब यहाँ से आगे छोटे वाले पुल तक मार्ग लगभग एकसार सा ही था जहाँ तक कुछ आसानी से चले गये। लठ भी कुछ देर पहले छोड दिया था क्यों कि समतल मार्ग पर लाठी भी भारी लग रही थी। छोटे वाले ऊपर के पुल पर कुछ देर आराम किया गया। उसके बाद यहाँ से सीधा नीचे बडे वाले पुल तक एकदम गहरी ढलान थी। जिस पर सांगवान को उतरने में आधा घन्टा लग गया था, लेकिन बन्दा हिम्मत हारने को तैयार नहीं था। यहाँ पुल से उतरना शुरु करते समय ही हल्की-हल्की बारिश भी शुरु हो गयी थी, लेकिन बारिश इतनी ज्यादा नहीं थी कि हम भीग सके। अपना जवान दर्द को सहता हुआ अपने बलबूते आराम से ही सही ओसला तक आ गया था, शाम के साढे ५ बजने वाले थे। हम ठीक दोपहर 12 बजे चले थे यानि 13 किमी में 5:30 घन्टे का समय लगा था जिसे हम तीन घन्टे का मान कर चल रहे थे।

भोजवृक्ष के पेड यहाँ भी पाये जाते है।

यहाँ ओसला में सबसे पहले हमने उस भोजन बनाने वाले ढाबे वाले से कहा कि भाई कुछ गर्मा-गर्म पानी दे दे नमक डाल के ताकि सांगवान पैर की सिकाई कर सके। जब तक पानी गर्म हुआ तब तक आग के पास बैठकर पैर की सिकाई की गयी थी। कुछ देर में सुभाष गढवाल निगम हाऊस का संचालक भी आ गया, आज के लिये जगह के बारे में कहा तो उसने कहा कि आज तो कुल 14-15 लोग ही यहाँ रुके हुए है ज्यादातर कमरे व डोरमेट्री खाली पडॆ हुए है। धर्मेन्द्र जब तक सिकाई करता रहा, मैंने कमरे में जाकर अपना सामान रख दिया। यहाँ पर एक बंगाली सुरजीत बाबू कुर्सी पर आराम से बैठे हुए थे, जो कि उतराखण्ड के खूबसूरत जगह के बारे में पता कर रहे थे। जब मैंने उन्हें उतराखण्ड के सबसे खूबसूरत बुग्याल पवाँली काँठा के बारे में बताया तो मेरी बात का समर्थन कई लोगों ने किया। सात बजे तक खाना खाने के लिये बुलावा आ गया था खा पी कर हम अपने-अपने बिस्तर में घुस गये थे। आज हमने एक 2 पलंग वाला कमरा लिया था। चूंकि यहाँ बिजली तो थी नहीं अत: मोमबती बुझा दी गयी ताकि सुबह जल्दी उठने में दिक्कत ना हो। रात कब बीती पता ही नहीं चला, सुबह जब आँख खुली तो समय हुआ था ठीक पाँच बजे। अपनी आदत अनुसार यहाँ सांगवान भाई की भी तारीफ़ करनी पडॆगी कि उन्होंने कभी उठने में आलस नहीं दिखाया पहली आवाज में ही बिस्तर छोड देते थे। हम उठने के बाद जरुरी कार्य निपटाने के बाद ओसला के ठन्डे पानी में नहाने का लुत्फ़ भी हम दोनों ने उठाया था।

ये रहा बकरियों का समूह, कम से कम हजार तो रही होगी।

आज की पैदल यात्रा मात्र 14 किमी की ही थी। लेकिन कल की दुर्गति देखते हुए, आज हम 6 घन्टे की यात्रा मान कर चल रहे थे। आज पूरा मार्ग ढलान वाला ही था। दिक्कत थी तो बस सांगवान के दर्द की कहीं ऐसी हालत ना हो जाये कि कहीं तालुका तक भी ना पाये। रहने खाने के पैसा का हिसाब रात में ही कर दिया था। सुबह सबको मिले धन्यवाद किया। हम ठीक सुबह 6 बजे ओसला छोड चुके थे। लगभग 5 किमी चलने के बाद एक गंगाड गाँव आता है जिस तक आने में कोई खास परेशानी नहीं आयी यहाँ उसी चाय की दुकान पर रुककर सांगवान को चाय पिलायी गयी जहाँ जाते समय भी चाय पी थी। सुबह से कुछ खाया भी नहीं था बिस्कुट का एक एक पैकेट भी खाया गया था। लगभग आधा घन्टा रुकने के बाद यहाँ से चले तो सांगवान का शरीर कुछ अकड सा गया था। अब बीच-बीच में दो-तीन जगह मार्ग भी कुछ खतरनाक हो गया था जहाँ सांगवान को थोडी परेशानी आयी थी। लेकिन हम धीरे-धीरे चलते रहे, अन्य यात्री हमसे आगे निकलते रहे। जब कोई हम से आगे निकलता था तो मन में बडी झुंझलाहट होती थी और सांगवान पर गुस्सा भी आता था कि जालिम और भाग ले अब भुगत रहा है। जब तालुका तीन किमी बाकि था तो हम उसी जगह पर आ गये थे जहाँ से जाते समय कूद कर गये थे लेकिन अब तो वहाँ के हालात बेहद खतरनाक हो चले थे। अपनी हिम्मत तो हो जाती उसे पार करने की, लेकिन सांगवान की हालत देखकर नहीं लगा कि वो उसे पार कर लेगा अत: तय हुआ कि गाय-भैंस को चढाने के लिये बनाये गये कच्चे मार्ग से होकर हमें वो पहाड चढना पडा था। चढाई मुश्किल से 200 मी की ही थी लेकिन उसे चढने में पसीने आ गये थे।

ये अनार या कहो सेब जैसे दिखाई देने वाले जंगली नन्हे फ़ल, हमने खूब खाये थे।

अगर मार्ग सही होता तो हमारा आधा घन्टा बच सकता था सबसे बडी बात सांगवान का दर्द जो बढता ही जा रहा था। सांगवान के चेहरे को देख कर लगता था कि बस अब नहीं चलेगा मना कर देगा, लेकिन वो भी ठहरा असली जाट जो कि है तो हरियाणा का, लेकिन गुजरात के अहमदाबाद में रहता है। उसके दर्द की हालत क्या रही होगी वो ही समझ सकता था मार्ग में दो बार खच्चर वाले भी मिले लेकिन उन्होंने ले जाने की मना कर दी थी। किसी तरह उस जगह पहुँचे जहाँ से तालुका सिर्फ़ दो किमी रह जाता है और यहाँ से आगे का बाकि मार्ग एक समान है। हमें ऐसे ठीक-ठाक लोग भी मिले जो ठीक होते हुए भी सांगवान जितना धीरे चल रहे थे। किसी तरह दोपहर के डेढ बजे तालुका के उस ठिकाने तक जा पहुँचे जहाँ हमने जाते समय खाना खाया था। मैंने वापसी में भी खाना खाया लेकिन सांगवान से खाने से मना कर दिया वो शायद दर्द से परेशान था। यहाँ कोई आधा घन्टा रुककर हम आगे बढे अरे हाँ अब पैदल नहीं जाना था हमारी नीली परी दो दिन बाद हमको मिली थी। हम एक बार फ़िर अपनी प्यारी नीली परी पर सवार होकर घर के लिये चल दिये। तालुका से सांकुरी तक के दस किमी के सफ़र में आधा सफ़र बाइक के लिये बहुत ही खतरनाक है। यहाँ जीप चलती है जो दिन में तीन चार चक्कर लगाती है। जिस कारण यात्री ज्यादातर पैदल ही सांकुरी की यात्रा पर निकल जाते है। वापसी में फ़िर से हमें उसी नदी को पार करना पडा जहाँ हमारी बाइक का आधा से ज्यादा पहिया पानी में डूब कर पार करना पडा था। मार्ग में सांकुरी से पहले हमें वे सभी लोग मिले जो तालुका से पहले हमारे से आगे निकल आये थे। लेकिन वे सभी सांकुरी तक पैदल ही आ रहे थे। जब हमने सांकुरी पार की तो कुछ दूर जाने पर हम दोनों एक दम धडाम से बाइक से दूर सडक पर जा गिरे। 

वापसी के हमारे साथी, सभी जोश से भरे हुए थे।

पहले पहल तो समझ ही नहीं आया कि क्या हुआ है? फ़िर बाइक उठायी तो वो हिलने को तैयार ही नहीं थी। सोचा की गियर में होगी क्लच दबा कर चलानी चाही तो भी हिलने को तैयार नहीं। अब अपनी खोपडी सनक गयी कि यार मामला कुछ और है, बाइक किसी तरह किनारे खडी की, ध्यान से देखा कि बाइक का अगला पहिया जाम है जो कि हिलाने पर भी नहीं हिल रहा था। पहले मैं समझा की ब्रेक शू टूट गया है अब अपने साथ पहिया खोलने वाला पाना भी नहीं था अब क्या करे। ये सोच ही रहे थे कि तभी एक ट्रक वहाँ आया हमने उस ट्रक वाले से पहिया खोलने का पाना लिया, पहिया खोल कर देखा कि ब्रेक शू तो ठीक है लेकिन एक ब्रेक शू के ऊपर की रबड सी उतर गयी थी। जिस कारण वो पहिया में अटक रही थी। उसे निकाल कर अलग कर दिया गया। इस मार्ग पर घन्टों में ही कोई वाहन नजर आता है। वो तो हमारी किस्मत अच्छी थी कि वो ट्रक दो मिनट बाद ही आ गया था नहीं तो पता नहीं कितनी देर खडे रहना पडता।  

ओसला में सुभाष निगम(दाये) संचालक व बंगाल से आये सुरजीत बाबू।

अगले भाग में एशिया का सबसे ऊँचा चीड का पेड जिसकी समाधी बनी हुई है......


हर की दून बाइक यात्रा के सभी लेखों के लिंक नीचे दिये गये है। 
भाग-01-दिल्ली से विकासनगर होते हुए पुरोला तक।
भाग-02-मोरी-सांकुरी तालुका होते हुए गंगाड़ तक।
भाग-03-ओसला-सीमा होते हुए हर की दून तक।
भाग-04-हर की दून के शानदार नजारे। व भालू का ड़र।
भाग-05-हर की दून से मस्त व टाँग तुडाऊ वापसी।
भाग-06-एशिया के सबसे लम्बा चीड़ के पेड़ की समाधी।
भाग-07-एशिया का सबसे मोटा देवदार का पेड़।
भाग-08-चकराता, देहरादून होते हुए दिल्ली तक की बाइक यात्रा।
.
.
.
हर की दून बाइक यात्रा-

45 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

चट्टान पर बैठे योगी जैसे लग रहे हैं आप..

Bhushan ने कहा…

बढ़िया और सुंदर विवरण. बकरियों का फोटो बहुत ही सुंदर है.

नीरज जाट ने कहा…

भाई, मेरी सलाह मानो तो अपने साथ किसी ऐसे बन्दे को ले जाया करो जिसे एक तो भरपूर अनुभव हो, दूसरे वो आपसे तेज चलने की हिम्मत भी रखता हो। लेकिन ऐसा बन्दा मिलना मुश्किल है तो समाधान यह है कि अकेले चले जाया करो। बडा मजा आता है अकेले दुर्गम में यात्रा करने में। नहीं तो श्रीखण्ड और हर की दून जैसी दुर्गति होती रहेगी और यात्रा का सत्यानाश भी होता रहेगा।

Babli ने कहा…

आपकी यात्रा का वर्णन पढ़कर ऐसा लग रहा है की मैं भी घूमने चली जाऊँ ! झरना बहुत सुन्दर है!
मेरे नये पोस्ट पर आपका स्वागत है-
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/
http://seawave-babli.blogspot.com

अन्तर सोहिल ने कहा…

एक पैर पीछे रखकर चलना माने उस पैर को घसीटना ही पडा होगा

प्रणाम

PRAVEEN KUMAR GUPTA ने कहा…

संदीप भाई, आपका ब्लॉग में काफी समय से पढता आ रहा हूँ. आपकी लद्दाख यात्रा बहुत अच्छी लगी. हर की दून के बारे में सुना था, आप द्वारा वंहा की यात्रा भी करली हैं, धन्यवाद्, में भी कही न कही घुमने निकालता हूं, पर एक समस्या आती हैं की हर बार कोई न कोई नया बंदा साथ के लिए तलाशना पड़ता हैं, आपकी यात्राएं देख कर आप के साथ जाने का मन करता हैं. आप इतना समय कैसे निकाल लेते हैं. संदीप भाई में एक यात्रा encychlopedia पर काम कर रहा हूं, कृपया अपना कुछ सुझाव दीजियेगा.

rashmi ravija ने कहा…

हमें तो देखने में वे जंगली फल बिलकुल अनार जैसे ही लग रहे हैं...उनका स्थानीय नाम भी लिखना था,ना..

बहुत ही जीवंत विवरण..तस्वीरें, हमेशा की तरह बहुत ही ख़ूबसूरत हैं.

"जाटदेवता" संदीप पवाँर ने कहा…

प्रवीण पाण्डेय जी पहाडों को देखकर तो मन सच में योगी बनने का ही कर जाता है।

नीरज भाई, एक-दो बार और देखता हूँ नहीं तो उसके बाद अकेले ही जाया करुँगा।
वैसे बाइक पर तो अब अकेले ही जाया करुँगा।

"जाटदेवता" संदीप पवाँर ने कहा…

सोहिल भाई, सच में गंगाड से तालुका तक तो पैर जैसे घसीट कर ही लाया गया था। बन्दा इतने दर्द के बावजूद उफ़ तक नहीं बोला था। सांगवान की हिम्मत को मेरा सलाम। यह उसकी पहली पैदल यात्रा थी।

प्रवीण गुप्ता जी, अपने साथ किसी को ले जाने से अच्छा है कि अकेले यात्रा पर चले जाओ। या फ़िर बन्दा पूरी तरह यात्रा करने को तैयार हो। रही बात यात्रा के लिये समय निकालने की, उसके लिये अपुन को कोई समस्या नहीं है। मैं घूमने के मामले में भूखा हूँ और भूखा आदमी भूख के लिये कुछ भी कर सकता है।

रेखा ने कहा…

एक बार फिर से आपका यात्रा -वृतांत काफी रोचक लगा .सारे -के -सारे चित्र भी जीवंत और लुभावने लग रहे थे ..

मनोज कुमार ने कहा…

आपका आलेख पाठकों को साथ बांध कर ले जाता है।
सभी फोटोग्राफ्स लाजवाब हैं।

रोहित बिष्ट ने कहा…

जिंदगी को पूरी शिद्दत के साथ जीना,कोई आपके शौक और ब्लॉग से सीखे,इस बेनजीर जज्बे को सलाम।

संजय @ मो सम कौन ? ने कहा…

कुछ भी कहो, साँगवान भाई की हिम्मत को सलाम करने का मन करता है। बॉडी लैंग्वेज से भी धीरज वाला मनुष्य दिखता है। घुमक्कड़ी में नीरज और संदीप जैसों का अनुभव बहुत है, सही ही कह रहे होंगे लेकिन हमने तो अभी तक यही सुना है कि सफ़र में हमसफ़र जरूर होना चाहिये।
भाई, नीली परी से दो दिन का विछोह तुम्हें ही नही, उस नीली परी को भी भारी पड़ा होगा, तभी तो रूठ गई थी:)हमें तो तुम्हारे साथ नीली परी की तीन-चार किलोमीटर की सवारी करके ही गर्व होने लगा है।

"जाटदेवता" संदीप पवाँर ने कहा…

सही कह रहे हो संजय भाई सांगवान बहुत ही आम इन्सान है, कोई नखरा नहीं, कोई चोंचले नहीं, थोडी सी गडबड यही रह गयी कि बन्दा पहाड पर बिना तैयारी के आ गया था, जबकि ऐसी जगह पर बिना तैयारी आना बेहद परेशानी भरा हो सकता है जो हुआ भी था, बन्दा मेरे साथ एक बार फ़िर बाइक से लेह-लद्धाख यात्रा पर जाना चाहता है।

डॉ टी एस दराल ने कहा…

आज का पूरा विवरण सांगवान पर ही रहा ।
लेकिन बड़ा रोचक रहा ।
यह झरना तो दूर दूसरी ओर नज़र आता है ।
तस्वीर में जो फल नज़र आ रहे हैं शायद उन्हें हम पल्पोटन कहते हैं ।
वैसे हर की दून नए ट्रेकर्स के लिए एक आसान ट्रेक है ।

"जाटदेवता" संदीप पवाँर ने कहा…

दराल साहब, झरना बिल्कुल मार्ग के पास ही था, फ़ोटो देखो इसके पास जो लकडी पडी है उस पर से होकर जाना था, फ़ल का नाम तो मुझे याद नहीं आ रहा है जबकि मैंने भेड वाले से पूछा भी था। पर ये पलपोटन बिल्कुल नहीं है। थोडी सी तैयारी व सावधानी बरतने से यह ट्रेक आसानी से हो जाता है।

Deepak Saini ने कहा…

आपका सफर अच्छा लगा
लगे हाथ हम भी घूम लिए ( वो भी घर बैठे)
आभार

Suman Dubey ने कहा…

स्न्दीप जी नमस्कार, आपकी यायवरी वर्णन रोचक है पर भाई इतने खतरे मोल लेकर ठीक नही ।

Vaanbhatt ने कहा…

हमेशा की तरह लाजवाब पोस्ट...

डॉ.मीनाक्षी स्वामी ने कहा…

सारे फोटो लाजवाब और जीवंत हैं।
और घुमक्कडी.....सचमुच किस्मत से मिलती है।
बडी रोमांचक यात्राएं हैं आपकी।

चैतन्य शर्मा ने कहा…

यह फल तो छोटे छोटे अनार लग रहे हैं..... बहुत ही ज़बरदस्त फोटो हैं सारे

Ramesh Sharma ने कहा…

यायावरी को सलाम..यात्रा का जीवंत वर्णन..

"जाटदेवता" संदीप पवाँर ने कहा…

सुमन दुबे जी खतरा कहाँ नहीं है? अरे भाई जब खतरा हर जगह है तो कम से कम ये कुदरत की सुन्दरता जो सारी दुनिया में भरी हुई है उसे तो देख ही लेनी चाहिए। क्यों अब तो सहमत हो ना।

संजय भास्कर ने कहा…

लाजवाब तस्वीरें लाजवाब यात्रा
वो भी घर बैठे ही हमे पढने और देखने को मिल जाती है .... घुमक्कडी जिंदाबाद

संजय @ मो सम कौन ? ने कहा…

संदीप प्यारे, आज के समय में सच में आम होना ही सांगवान जैसों को खास बनाता है। यकीनन, अगली बार जब वो तुम्हारे साथ जायेंगे तो पहले से ज्यादा अनुभवी हो चुके होंगे। जरूर ले जाना अपने साथ लेह लद्दाख या कहीं भी, अपने को तो ऐसे बंदे बहुत पसंद हैं।

फकीरा ने कहा…

@ramesh sharma ji

आपके यायवरी शब्द ने भूपेन हजारिका जी का गाना याद दिला दिया

संदीप जी मोटर साइकिल से विश्व की सबसे ऊँची सड़क पर जाने की तो अपनी भी इच्छा है
अगर आप जाओ तो मैं भी चलना चाहूँगा...
वैसे तो मेरी दिली इच्छा है कि एक बार सियाचिन ग्लासिएर देख कर आऊँ

कुमार राधारमण ने कहा…

तस्वीरें शानदार
ब्यौरा जानदार

"जाटदेवता" संदीप पवाँर ने कहा…

फ़कीरा भाई आपको जरुर साथ लेकर जाऊँगा, पर बाइक आपको अपनी ले कर जानी होगी, मैं अब से यात्रा पर अकेले ही सवारी किया करूँगा किसी को बैठाऊँगा नहीं, (घरवाली के सिवाय/बाहरवाली कोई है नहीं)। रही बात सियाचीन बेस कैम्प तक जाने की मैं भी जाना चाहूँगा, लेकिन उसके लिये वहाँ पर कोई फ़ौजी जानकार होना चाहिए, अगर बिना जान-पहचान के जाने दिया तो अपनी ओर से पक्का मान कर चलो।

Udan Tashtari ने कहा…

गज़ब का विवरण....ह्म्म्म!!

संतोष त्रिवेदी ने कहा…

'ऊपाद' हमारे बैसवारे में 'उपहंति'के नजदीक है,जिसका अर्थ होता है,शरारत !

Akshitaa (Pakhi) ने कहा…

कित्ती दूर घूम आए...कभी अंदमान भी घूमिये न...

Vidhan Chandra ने कहा…

कामायनी "चिंता सर्ग" की ये पंक्तियाँ आपके लिए फिट बैठती हैं


"हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर,

बैठ शिला की शीतल छाँह

एक पुरुष, भीगे नयनों से

देख रहा था प्रलय प्रवाह |


नीचे जल था ऊपर हिम था,

एक तरल था एक सघन,

एक तत्व की ही प्रधानता

कहो उसे जड़ या चेतन |


दूर दूर तक विस्तृत था हिम

स्तब्ध उसी के हृदय समान,

नीरवता-सी शिला-चरण से

टकराता फिरता पवमान |


तरूण तपस्वी-सा वह बैठा

साधन करता सुर-श्मशान,

नीचे प्रलय सिंधु लहरों का

होता था सकरूण अवसान।"

बेनामी ने कहा…

अरे भाई तुम इन्सान हो या शैतान, ना पैदल 250-300 किमी चलने से डरते हो ना बाइक से 3000-4000 किमी जाने में दूरी चाहे जितनी भी हो, आखिर किस मिट्टी के बने हो। आखिर क्या खाते हो जरा ये बता देना।

Kailash C Sharma ने कहा…

बहुत रोचक यात्रा विवरण...

पी.एस .भाकुनी ने कहा…

@अब तो हद ही हो गयी गयी है ???? आ गयी है।
सदीप जी यकीन मानिये ! आपकी उपरोक्त टिपण्णी ने बहुत हंसाया है ,
आभार...............

Tv100 ने कहा…

आपकी ये पोस्ट बेहद पसंद आई।

Navin C. Chaturvedi ने कहा…

यह एक विलक्षण फोटो है, बहुत अच्छा रिपोर्ताज

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) ने कहा…

हरिद्वार,ऋषिकेश,दून की वादियाँ देखी हुई हैं मगर आपके अंदाज में नहीं.यादें ताजा हो गई.

veerubhai ने कहा…

दुर्गम स्थल पर तपस्या रत ध्यानावस्थित मुनिवर जाट देवता मजा आगया .

प्रेम सरोवर ने कहा…

बहुत रोचक और सुंदर प्रस्तुति.। मेरे नए पोस्ट पर (हरिवंश राय बच्चन) आपका स्वागत है । धन्यवाद ।

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

aakhir क्या खाते हैं hamein bhi bta dena ......:))

Khilesh ने कहा…

धन्यवाद संदीप जी हिन्दी दुनीया ब्लॉग पर Comment करने के लिये!

आया करो ब्लॉग पर कुछ Comment दिया करो!
आपका हमेशा स्वागत है

Surendra shukla" Bhramar"5 ने कहा…

प्रिय संदीप जी अभिवादन .
मजा आ गया हर हर गंगे ..अब आप तपस्या करने बैठ जाओगे जम कर तो और जगह कौन घुमायेगा

.क्षमा तो माँगना ही होगा न ..कहीं आप गुस्सा हो गये तो .....वैसे रचना आप को भायी "बाबा क्षमा करना" ....ख़ुशी हुयी
धन्यवाद आभार
भ्रमर ५

shilpa mehta ने कहा…

कमाआआअल के चित्र हैं - और बहुत अच्छा वर्णन भी | धन्यवाद |:)

mahendra verma ने कहा…

रोचक और मनभावन पर्यटन विवरण पढ़कर आनंद आया।

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...