बुधवार, 21 सितंबर 2011

पौंटा साहिब गुरुद्धारा से दिल्ली तक


देख लो हथनीकुण्ड बैराज जाने का मार्ग बोर्ड के मोड पर खडे होकर भीगे हुए कपडे दिखाये जा रहे है।

हमारी यह श्रीखण्ड महादेव यात्रा आज अन्तिम (समाप्ति) भाग 14 तक आ पहुँची है। 
अब तक हम दिल्ली (DELHI) से पिन्जौर गार्डन (PINJORE GARDEN, शिमला (SHIMLA), कुफ़री (KUFRI), नारकण्डा (NARKANDA), सैंज (SAINJ), जलोडी जोत (JALORI PAAS), रघुपुर किला (RAGHUPUR FORT), सरेउलसर झील (SAROLSAR LAKE), अन्नी (ANNI), रामपुर बुशहर (RAMPUR BUSHAHR), बागीपुल (BAGHIPUL), जॉव (JAON), सिंहगाड (SINHAGAD), थाचडू (THACHADU), काली घाटी (KALI GHATI, काली कुंड (KALI KUND), भीम डवार (BHEEM DWAR), पार्वती बाग (PARVATI BAGH), नैन सरोवर (NAIN SAROVAR), भीम शिला (BHEEM SHILA), एवं श्रीखण्ड महादेव दर्शन (SRIKHAND MAHADEV DARSHAN) करने के बाद वापसी में रामपुर (RAMPUR) से रोहडू (ROHRU), त्यूणी (TUNI), चकराता(CHAKRATA), टाईगर फ़ाल (TIGER FALL), कालसी (KALSI), सम्राट अशोक का शिलालेख (ASHOK SHILALEKH), विकास नगर (VIKAS NAGAR), हर्बटपुर (HERBERTPUR), आसन्न बैराज (AASAN BAIRAJ) यमुना पुल (YAMUNA RIVER BRIDGE) होते हुए यहाँ श्री पौंटा साहिब गुरुद्धारे (PAONTA SAHIB GURUDWARA) तक आ पहुँचे है। 
यहाँ से अब सिर्फ़ सहारनपुर (SAHRANPUR), शामली (SHAMLI), कांधला (KANDHLA), बडौत (BARAUT), बागपत (BAGHPAT), खेकडा (KHEKRA), लोनी (LONI), होते हुए दिल्ली (DELHI) तक जाना है। जो यहाँ से सिर्फ़ 235 किमी दूर है अगर अम्बाला से जायेंगे तो 305 किमी जाना होगा।   

पहाड समाप्त होते ही कुछ आगे जाने पर हथनीकुण्ड बैराज जाने का मार्ग भी आता है।

इस यात्रा को शुरु से देखने के लिये यहाँ चटका लगाये।




अब दिल्ली ज्यादा दूर नहीं है। सहारनपुर पार करने के बाद लिया गया है।


रात को ठीक 10 बजे तक सब सो गये थे क्योंकि सुबह सबको जल्दी चलना था। सिर्फ़ नीरज की दोपहर की नौकरी के कारण जल्दी जाना पड रहा था बाकि तीनों की छुट्टी थी। तय हुआ था सुबह पाँच बजे तक यहाँ से चल देना है, तभी 12-1 बजे तक दिल्ली जा पायेंगे। सुबह चार बजे का अलार्म लगाया था तो बजना भी चार बजे ही था। मैंने उठकर देखा तो लोगों की चहल-पहल चारों ओर थी ऐसा लग ही नहीं रहा था कि सुबह के चार बजे है, मैंने सोचा कि कही नितिन के मोबाइल में समय तो गलत नहीं है, विपिन को उठाया तो देखा कि उसके मोबाइल में भी यही समय हुआ था। इसके बाद सबको उठाया गया, अब नीरज की तरह बिना पेट तन साफ़ किये चलना अपने तो बस की बात नही है। नीरज को छोडकर बाकि तीनों नहाने धोने के लिये चले गये। जब नहाने धोने वाली जगह जाकर देखा तो वहाँ तो लम्बी कतार लगी थी बारी-बारी से सब काम हो रहा था, किसी तरह पेट तो साफ़ हो गया लेकिन जब नहाने वाली कतार में देखा कि यहाँ तो अपना स्थान दस के बाद आ रहा है यानि 11 वॉ स्थान, तो जी अपना नहाना रद्द हो गया, क्योंकि नहाने में कम से कम एक घन्टा जरुर लग जाता। इसी काम से निपटने में साढे चार बज गये थे।

इस बोर्ड में यमुनौत्री की दूरी गलत लिखी हुई है, इसमें 100+ कर देना सही हो जायेगी।

वापस उसी जगह आये जहाँ हमारा सामान रखा हुआ था तो देखा कि नीरज बिल्कुल नैन सरोवर वाली मुद्रा में (साक्षात दर्शन वाली पोस्ट में फ़ोटो भी लगा हुआ है) अब तक बैठा हुआ था। मुँह को घुटनों के बीच दबाये बैठा था, सबने एक दूसरे को देखा लेकिन किसी ने कुछ नहीं कहा क्योंकि एक तो उस दिन उस का जन्मदिन था, दूसरा नीरज का रवैया ऐसा था कि विपिन व नितिन नीरज से ज्यादा घुलमिल नहीं सके। मेरा क्या मैं ठहरा अलग किस्म का इंसान ऐसे नखरों का मुझ पर कोई फ़र्क नहीं पडता है। ज्यादा से ज्यादा क्या होगा, आगे से हमारे साथ यात्रा पर नहीं जायेगा, बस। वैसे हमारे जैसी यात्रा करना नीरज जैसे आलसी इंसान के बस की बात नहीं थी वो तो पता नहीं कैसे उसने हमारे साथ सहारनपुर तक यात्रा कर ली, नहीं तो नीरज तो रामपुर (वो तो चकराता टाईगर फ़ाल व पौंटा साहिब का लालच था) से भागने की सोच रहा होगा कि कहाँ फ़ँस गया इन बाइक वालों के चक्कर में। इस सफ़र से नीरज व विपिन ने एक बात तो जान ही ली होगी कि आराम वालों के लिये बाइक नहीं है और मैं कहता हूँ कि मेरे जैसे मनमौजियों के लिये बस का सफ़र नहीं है। नीरज के इरादे हमारे साथ जाने के तो नहीं थे, ये उसने रात को ही कह दिया था कि मुझे सहारनपुर या अम्बाला तक ही तुम्हारे साथ जाना है जिस कारण रात को ही हमने सारा हिसाब किताब कर लिया था जो कि एक बंदे का खर्चा आया मात्र 2425 रुपये। जिसमें पेट्रोल का 1075 रुपये मिलाकर था बाकि रात का रुकना, खाना, पीना सब कुछ मिलाकर था। सबने अपने-अपने हिस्से का हिसाब चुका दिया था। किसी का किसी पर कोई बकाया नहीं रहा था।   
रामपुर मनिहारन वो जगह है जहाँ पर तत्कालीन  अमेरिकी राष्ट्रपति बिल किलंटन ने एक COMPUTER संस्थान का उदघाटन किया था।

इसी बीच बाहर बारिश भी हो रही थी बारिश रुकने का इंतजार नहीं किया जा सकता था। ठीक पौने पाँच बजे हमने अपने रैन कोट, हैलमेट पहन कर अपने बैग उठा लिये थे। यहाँ से बाहर आने के बाद उसी मार्ग से वापस चल दिये जिससे कल आये थे। बारिश ज्यादा तेज तो नहीं थी फ़िर भी परेशान कर रही थी। कुछ ही देर बाद घने जंगलों से होते हुए हर्बटपुर से सहारनपुर जाने वाला मार्ग आ गया था, यहाँ से सीधे हाथ दिल्ली व उल्टे हाथ चकराता और देहरादून की ओर मार्ग जाता है यहाँ से कुछ आगे जाते ही अंधेरा भी समाप्त हो गया था बीच में एक बार फ़िर कुछ किलोमीटर पहाडों का सफ़र आता है। पहाड पूरी तरह समाप्त भी नहीं हुए थे कि देखा कि बारिश रुक गयी थी। यहाँ कुछ देर रुक कर अपना सामान ठीक किया व आगे के सफ़र पर चल दिये। बारिश में कुछ भीगे तो थे आगे जाते-जाते वो भी सूख गये थे, मार्ग की हालात कही-कही तो खराब आ जाती थी वहाँ आराम से निकल जाते थे। सही मार्ग आते ही फ़िर से अपनी बाइक 50 के आसपास भाग लेती थी। नीरज ने सुबह-सुबह सबका मूड खराब कर दिया था। 


नानौता फ़ाटक पार करने के बाद आम का भरपेट स्वाद लिया जा रहा है।

लगभग साढे सात बजे हम सहारनपुर के स्टेशन के नजदीक आ गये थे। यहाँ से कुछ पहले एक चौराहा आता है जिससे सीधे हाथ अम्बाला, जगाधरी, यमुनानगर की ओर जा सकते है, व उल्टे हाथ छुटमलपुर होते हुए देहरादून, मंसूरी, रुडकी हरिद्धार जाया जा सकता है, सहारनपुर के स्टेशन पर नीरज को छोडा, विपिन भी रात में बोल रहा था ट्रेन से जाने कि लेकिन उसे पता नहीं क्या हुआ उसने बाइक से ही आगे का सफ़र करने के लिये कहा। चारों लठ तो नीरज ही लाया था उसके लठ उसे दे दिये और अब हम चार चंडाल से तीन तिगाडे काम बनाने के लिये रह गये थे। सहारनपुर स्टेशन के बराबर से ही पुल द्धारा रेलवे लाईन पार हो जाती है। सुबह कोई ज्यादा भीड भाड भी नहीं थी। इस शहर को पार करने के बाद विपिन मेरी बाइक पर आ गया था। यहाँ भी बीच-बीच में मार्ग ही हालत कुछ अच्छी नहीं थी, हम मस्ती में झूमते हुए इस मार्ग पर जा रहे थे कि एक बोर्ड नजर आया जिस पर दिल्ली व चकराता की दूरी लिखी हुई थी। नीरज के जाने के बाद अब हमे घर जाने की भी जल्दी नहीं थी, हमारी तो आज छुट्टी थी नौकरी की जल्दी तो सिर्फ़ नीरज को ही थी और वो ही पौने पाँच बजे चलने पर भी गुब्बारे की तरह मुँह फ़ुलाये बैठा था। अब पता नहीं गुस्से के कारण या फ़िर पेट के प्रेशर के कारण उसने मुँह फ़ुला रखा था, पर पौंटा साहिब से लेकर सहारनपुर तक उसने अपने मुँह का जो नमूना बना रखा था वो देखने लायक था?

शामली से पहले एक बोर्ड का है।

मार्ग में रामपुर मनिहारन के पास एक जगह आम की बिक्री हो रही थी तो हमने तीन बंदों के लिये पूरे ढाई किलो आम ले लिये। वैसे आम खाने की बात नीरज भी कर रहा था लेकिन उसने पता नहीं क्या खाया होगा। ननौता फ़ाटक पार करने के बाद हमने एक जगह सरकारी नल देखकर बाइक रोक ली व सारे आम आपस में बाँट कर खाये, आम खाते समय एक शर्त लगायी थी कि जिसके आम बचेंगे उसे कोई भी खा लेगा जो अपने आम पहले समाप्त कर लेगा, इस कारण सबने फ़टाफ़ट आम अपने-अपने आम निपटाये थे लेकिन ऐसी नौबत नहीं आयी कि दूसरे के हिस्से के भी खाने पड जाये क्योंकि सबका पेट अच्छी तरह भर गया था। इस जल्द बाजी में सबका एक-एक आम तो फ़ट भी गया था। जिस कारण कपडे पर भी गिर गया था वो तो नलका पहले ही देख लिया था जिस कारण अपने हाथ व मुँह अच्छी तरह धो लिये थे। सारे आम निपटा कर ही आगे के लिये चले थे। अब मार्ग बीच-बीच में कभी सही कभी खराब आ जाता था। जब हमने थाना भवन पार किया तो देखा कि मार्ग एकदम मस्त था जिस पर हमने 70-80 की रफ़तार से बाइक भगायी थी, धीरे-धीरे हम शामली के तिराहे पर आ गये यहाँ से एक मार्ग उल्टे हाथ मुजफ़्फ़र नगर, हरिद्धार की ओर व सीधे हाथ दिल्ली की ओर चला जाता है। यहाँ आकर हमें भोले के भक्त काँवर लाते हुए मिले, कुछ आगे जाने पर रेलवे फ़ाटक भी आ जाता है यही पर उल्टे हाथ शामली का रेलवे स्टेशन भी है, फ़ाटक पार करने के एक किमी बाद एक चौराहा और आता है जहाँ से सीधे हाथ पानीपत की ओर व उल्टे हाथ मेरठ की ओर जाया जा सकता है। हमे तो दाये बाये के चक्कर में पडना नहीं था, अत: हम तो नाक की सीध में चलते रहे जिस पर एक कस्बा काँधला, रमाला, (यहाँ से आगे दिल्ली तक सडक मस्त बनी हुई है) बावली, (क्षेत्र का सबसे बडा गाँव) बडौत, (जहाँ से मेरा गाँव मात्र 12 किमी दूर रह जाता है) आता है इसके कुछ किमी आगे जाने पर एक मन्दिर आता है जो कि गुफ़ा वाले बाबा के नाम से क्षेत्र में प्रसिद्ध है। यहाँ भी कुछ देर आराम किया गया बाबा को भी नमस्कार किया गया। 

ये शामली तिराहे का फ़ोटो है।
तिराहे से आगे आने के बाद हरिद्धार से आ रहे कांवडियाँ का फ़ोटो लिया गया है।
उसी जगह से कुछ देर बाद एक और फ़ोटो लिया था।
शामली फ़ाटक पार करने के बाद सडक के बीचों बीच ये मंदिर बना है। पता नहीं क्यों मंदिर-मस्जिद सडक को घेर कर बनाते जाते है?

कुछ देर रुकने के बाद आगे के सफ़र पर चल दिये अब आगे जाने पर एक जगह आती है जिसे गौरीपुर मोड के नाम से नाम से जानते है। यहाँ से भी सीधे हाथ एक मार्ग यमुना नदी को पार करता हुआ सोनीपत की ओर चला जाता है इस मोड से सोनीपत मात्र 22 किमी रह जाता है। यहाँ से कुछ आगे जाने पर बागपत जिला मुख्यालय आ जाता है तथा कुछ और आगे जाने पर बागपत शहर भी आ जाता है। बागपत शहर के चौराहे से उल्टे हाथ जाने वाली सडक से मेरठ व आगे गढ-गंगा जाया जा सकता है यहाँ से मेरठ मात्र 50 किमी है मेरठ बाईपास मात्र 40 किमी रह जाता है। दिल्ली शाहदरा मात्र 32 किमी व लोनी बार्डर मात्र 28 किमी रह जाता है दिल्ली का बस अडडा भी सिर्फ़ 38 किमी बाकि रह जाता है। दोपहर के 11 बज गये थे फ़िर से कुछ खाने का मन हुआ तो (आज सिर्फ़ आम ही तो खाये थे) यहाँ मैं व विपिन एक पेड के नीचे रुक गये लेकिन नितिन का कोई पता नहीं था। कुछ देर पहले ही तो कहा था कि बागपत में घुसते ही खाना खायेंगे। तो कहाँ रह गया जब काफ़ी देर हो गयी तो वापस जाकर देखा तो अपने हेलमेट को ठीक करवा रहा था जिसका शीशा टूट गया था। नया शीशा लगवाकर वापस उसी जगह आये जहां विपिन खडा था। विपिन का भूख से बुरा हाल था अब तीन घन्टे पहले के खाये आम कहाँ गये पता ही नहीं चला, सामने ही पनीर के गर्मागर्म ब्रेड पकौडे बन रहे थे यहाँ एक-एक समौसा व ब्रेड पकौडा खाया गया। जिससे सबका पेट फ़ुल हो गया था। इस सारे खाने पीने में लगभग एक घन्टा लग गया था। हम खा पी कर ठीक सवा बारह बजे यहाँ से चले थे। करीब एक बजे हम लोनी बार्डर आ गये थे। विपिन को घर चलने को बोला तो उसने बोला नहीं भाई ऐसी हालत में नहीं फ़िर कभी नहा धो कर आऊँगा। विपिन को शाहदरा मैट्रो स्टेशन की ओर जाने वाले आटो में बैठा कर हम दोनों यमुनोत्री मार्ग से 300 मीटर दूर अपने घर की ओर चले गये। घर पहले ही फ़ोन कर दिया था जिससे सबको पता ही था। हमें देखकर सब बडे खुश थे और हम उन सबसे ज्यादा। जय भोले नाथ ....................

शामली से आगे एक गाँव में सडक के हालात देख लो।
लो जी ये एक बहुत ही खास स्टेशन है जहाँ रेलवे लाईन व सडक में सिर्फ़ 50 मी का ही फ़ासला है। स्टेशन व बस स्टाप आमने सामने है।
हमारी बाइक तो रह ही गयी थी।
बडौत शहर में प्रत्येक रविवार लगने वाला पशु मेला।

एक चित्र और उसी मेले का।

बडौत शहर तहसील को पार करते ही बडी नहर के किनारे ये काँवड पंडाल लगा हुआ था।
ये है इस यमुनौत्री मार्ग पर स्थित सबसे प्रसिद्ध जगह जो गुफ़ा वाले बाबा का मन्दिर के नाम से जानी जाती है।

बागपत में मेरठ जाने वाले मोड का बोर्ड है।


अगर आप यहाँ जाना चाहते है तो चटका लगाये             नीरज जाट जी,     &      विपिन गौड जी



अच्छा जी अब अलविदा, ये यात्रा यहाँ समाप्त हुई, हम चले अपने-अपने घर, जय राम जी की।


अगला लेख ऐसी यात्राओं के लिये कुछ सुझाव/प्रश्न मन में आये है। अगले लेख में इस यात्रा के चार सदस्यों के बारे में विस्तार से भी बताऊँगा कि उनके हालात मेरे विचार से कैसे रहे होंगे। इस यात्रा का आगे का भाग देखने के लिये।

                    इस यात्रा का जो भाग देखना चाहते हो उसके लिये यहाँ नीचे क्लिक करना होगा









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26 टिप्‍पणियां:

Patali-The-Village ने कहा…

यात्रा वर्णन बहुत अच्छी रही| धन्यवाद|

Maheshwari kaneri ने कहा…

बहुत-बहुत बधाई..सुन्दर यात्रा वर्णन.. खूबसूरत चित्र...शुभकामनाएं

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

पूरे आनन्द के साथ समाप्त की गयी यात्रा।

रविकर ने कहा…

आप सभी पर
भगवान् की कृपा
बनी रहे ||

संजय @ मो सम कौन ? ने कहा…

लौट के मितर घर को आये - देख लो तुम्हारे चक्कर में मुहावरा बदल दिया है। पूरी यात्रा का वर्णन मस्त लगा। डेली पैसेंजरी के दौरान बावली गाँव के बारे में कुछ किस्से सुने थे, याद आ गये। उम्मीद है कि योँ ही लोगों ने प्रचारित कर रखे होंगे।
अगली यात्रा\घुमक्कड़ी के लिये अग्रिम शुभकामनायें।

Rakesh Kumar ने कहा…

rochak jaankaripoorn yaatra sansmran
padhkar aanand aa gaya.sundar chitr
bhi manohaari hain.

aabhar.

mere blog par aaiiyega.

डॉ टी एस दराल ने कहा…

पूरा विवरण पढ़कर यही लग रहा है कि अलग अलग किस्म के लोगों ने मिलकर यात्रा ठीक ठाक कैसे पूरी की ।

रेखा ने कहा…

आप दो यात्राओं के बीच कितने दिन का अन्तराल रखतें हैं .....मुझे तो विश्राम करने में ही कई दिन लग जाएँगे ,आपको शत -शत नमन

Bhushan ने कहा…

आपके यात्रा वर्णन से स्पष्ट है कि आपके ये यात्रा वर्णन NHAI वालों को भी पढ़ने चाहिएँ और सरकारों को भी. आपके चित्र यायावरी को जीवन देने वाले हैं. सुंदर कार्य और भविष्य के लिए शुभकामनाएँ.

ब्लॉ.ललित शर्मा ने कहा…

हम चले अपने-अपने घर, जय राम जी की।

राम राम जी, इब कहाणी तो पुरी हो ली।

Vaanbhatt ने कहा…

बहुत ही दिलचस्प और सनसनीखेज यात्रा रही...उसपर से आपक़े एक्सपर्ट कमेन्ट ने चार चाँद लगा दिए...बेहद मज़ा आया...

Hari Shanker Rarhi ने कहा…

संदीप जी,
घूमते रहिए। इस अभियान पर मैं भी हूँ । आपके फोटो बहुत अच्छे हैं। इनमें से कई जगहों ( त्यूनी, पुरोला, यमुना पुल, विकास नगर, सहस्रधारा इत्यादि) पर मैं भी जा चुका हूँ।

नीरज जाट ने कहा…

संदीप भाई,
घुमक्कड़ी जिंदाबाद

Kajal Kumar ने कहा…

"पता नहीं क्यों मंदिर-मस्जिद सडक को घेर कर बनाते जाते है?"

इसे ही मौज लेना कहते हैं.

रविकर ने कहा…

अगर आपकी उत्तम रचना, चर्चा में आ जाए |

शुक्रवार का मंच जीत ले, मानस पर छा जाए ||


तब भी क्या आनन्द बांटने, इधर नहीं आना है ?

छोटी ख़ुशी मनाने आ, जो शीघ्र बड़ी पाना है ||

चर्चा-मंच : 646

http://charchamanch.blogspot.com/

fakiraa ने कहा…

" सबने अपने-अपने हिस्से का हिसाब चुका दिया था। किसी का किसी पर कोई बकाया नहीं रहा था "

मजा आ गया बिलकुल प्रोफेसनल होते जा रहे हो

वैसे संदीप जी मैं ये जानना चाहता हूँ की आप नीरज बाबू , विपिन गौड़ काम धंदा क्या करते है

सरकारी नौकरी है या प्राइवेट नौकरी है ....आप लोगों की

और रही मेरे ब्लॉग की बात तो संदीप जी मैं ब्लॉग लिख नहीं पाता हूँ क्यूंकि
अभी तो अपने शहर मथुरा से कहीं बाहर ही नहीं जा पाया हूँ

अक्टूबर मैं नीरज बाबू ग्लेसिअर देखने जा रहे हैं सोचा था मैं भी देख लूँगा
लेकिन कुछ कारणों से नहीं जा पा रहा हूँ

वैसे तो मैं आज तक लगभग आपके ब्लॉग पड़ कर काफी कुछ देख पाया हूँ

और तकनीकी प्रगति से प्रगट हुई GOOGLE EARTH ने बहुत साथ दिया है
अभी तक...

आगे उम्मीद है की यह तकनीकी घुम्म्कड़ी मैं बहुत काम आने वाली है मेरे

अपने ब्लॉग लिखने की कोशिश कर रहा हूँ जैसे ही मेरी कोशिश पूरी हो जायेगी
और मैं ब्लॉग को समझ पाऊंगा.............

तब तक के लिए राम राम जी

Arti ने कहा…

Kya sundar drishya aur saath me majedar vivaran! yeh prastuti dekh kar aisa lag raha hai jaise mano hum swayam hi yatra kar ke laut rahe ho! Dhanyavaad...

Jeet Bhargava ने कहा…

हमारे और सुरेशजी के ब्लॉग से घूमते-घामते आपके धाम (ब्लॉग) पे पहुंचे तो आप तो बड़े घुम्मक्कड़ निकले !! खैर हमने सोचा क्यो ना आपके अड्डे पे दस्तक दे दी जाए।

किस माटी के बने हो भाई?? घूमने के लिए इतनी ऊर्जा कहाँ से लाते हो??
फिल्मों मे सनी और धर्मेंद्र पाजी जैसे अलहदा जट्ट देखे थे। आज सच मे जट्ट की फितरत देख ली.
हम तो यही कहेंगे ''मतवाले जाट, निराले ठाठ!''
बाबा भोलेनाथ हर सफर मे आपकी रक्षा करे..

Rajesh Kumari ने कहा…

बहुत अच्छा यात्रा वर्णन !मेरा गाँव बीच में पड़ा था वहां क्यूँ नहीं रुके ??

Arunesh c dave ने कहा…

भाई जब कहीं जंगल यात्रा का कार्यक्रम हो तो खबर करना हम और ललित भाई पहुंच जायेंगे बहुत दिनों से जिम कार्बेट के आस पास के जंगलों को देखने की इच्छा है मन में

vidhya ने कहा…

यात्रा वर्णन बहुत अच्छी रही|खूबसूरत चित्र.
पूरे आनन्द के साथ समाप्त की गई यात्रा
" सबने अपने-अपने हिस्से का हिसाब चुका दिया था। किसी का किसी पर कोई बकाया नहीं रहा था "
यह तो बहुत अच्छी बात है न
मुझे भी जाने का शोख हो रहा है
मगर आप की तरह उर्जा है कि नहीं पता नहीं
धन्यवाद|

Suresh kumar ने कहा…

संदीप भाई ,सबसे पहले तो घर वापसी की बधाई, उसके बाद जब आप दिल्ली से चले थे और वापिस दिल्ली आ गए हमने आपका पूरा यात्रा विर्तांत पढ़ा | पढ़ते -पढ़ते हमें ऐसा लग रहा था की हम भी आप के साथ ही घूम रहें हैं वो रोमांच भरे रास्ते,हसीन वादियाँ ,मनभावन चित्र और आपके लिखने की शैली, हमें आपके साथ-साथ घुमने को मजबूर कर रही थी | कुल मिलाकर हमें बहुत ही मज़ा आया और आशा करता हूँ की आपकी यात्रायें अनवरत जारी रहें |
..............धन्यवाद् ...................

veerubhai ने कहा…

जैसे उडी जहाज को पंछी ,उडी जहाज़ पर आवे ,इन उन्मुक्त पंछियों को दिल्ली आने पर कैसा लगता होगा .

चन्द्रकांत दीक्षित ने कहा…

मजा आ गया वर्णन पढकर. शामली के जिस मंदिर का सड़क के बीच होने का जिक्र किया है मुझे याद है उसके बनने से पहले उसी जगह पर पास के गांव के एक सज्जन लगभग प्रतिदिन ही शाम के समय मदिरा पान करके आने जाने वालों को आदर सूचक शब्द (कौन से कृपया खुद समझ लें) सुनाया करते थे.

संजय भास्कर ने कहा…

खूबसूरत चित्र सुन्दर यात्रा वर्णन संदीप जी

संजय भास्कर ने कहा…

पूरे आनन्द के साथ की गयी यात्रा।

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