शनिवार, 13 अगस्त 2011

श्रीखण्ड महादेव की ओर (काली कुंड-भीम डवार) भाग 7

आखिर दस मिनट चलने के बाद वो घडी भी आ ही गयी, जिसका हमें कल शाम चार बजे से इंतजार था। जब हम उस जगह आ गये जहाँ से ढलान शुरु हो रही थी, तथा आगे ढलान दिखाई दे रही थी, सच में उस समय दिल को कितनी तसल्ली हुई थी, वो मैं ब्यान नहीं कर सकता हूँ, भले ही मैं सबसे काफ़ी आगे था, लेकिन खुश भी सबसे ज्यादा, शायद मैं ही हो रहा था। बाकि दोनों का तो थकान से ही बुरा हाल था। इस काली घाटी पर जो बिल्कुल एक दर्रे की तरह से ही थी, जिसके दोनों ओर गहरी खाई थी, यहाँ हम लगभग 15-20 मिनट तक रुके थे, आराम कर जब आगे बढे तो अब दूसरी समस्या आगे आ गयी थी। मेरे व विपिन के जूतों के तलवे काफ़ी घिसे हुए थे, जिससे हमें उतरने में फ़िसलने का डर होने के कारण आराम से उतर रहे थे, यहाँ नीरज कुछ आगे निकल गया था, जैसे ही फ़िसलन भरा मार्ग समाप्त हुआ तो फ़िर से तीन तिगाडा काम बनाने साथ-साथ हो लिये थे। 

काली घाटी का स्वागत करते है, ये शानदार फ़ूल।
                                            इस यात्रा को शुरु से पढने के लिये यहाँ क्लिक करे।
रंग बिरंगे फ़ूल हर तरफ़ फ़ैले हुए है।

सफ़ेद फ़ूल शांति की निशानी है। चारों ओर शांति ही शांति है।


ये स्टाईल कैसा लगा, मेरा नहीं है।

जब ये काली घाटी की ये ढलान समाप्त होने लगती है तो एक जगह आती है, जहाँ पर कुछ लोग स्नान कर रहे थे, हमने स्नान नहीं किया, इस जगह का नाम है काली कुंड, जैसे ही यहाँ से आगे चलते है, तो एक बार फ़िर से अपनी पसंदीदा चढाई शुरु हो जाती है, यहाँ से आगे तो कुदरत ने भी एक से बढकर खूबसूरत नजारे बनाये हुए थे, हम भी रुकते बैठते इन सुंदर-सुंदर स्थानों को देखते हुए, कभी ऊपर पहाड की चोटी पर जाना पड्ता, कभी नीचे पहाड की तलहटी में उतरना पडता था। बहुत ही कम लोग ऐसे थे, जो हमारे से आगे निकल पाये थे। टैंट वाले भी दो-तीन किलोमीटर के अंतराल पर मिल ही जाते थे। जहाँ पर जरुरी सामान व रुकने का प्रबंध भी होता था।

काली कुंड पर स्नान की तैयारी हो रही है।


स्नान कर, अब फ़िर से कमर कस लो, चढाई के लिये, जान निकलने वाली है।


मार्ग में फ़ूलों की घाटी, चारों और फ़ैली हुई है।

मार्ग में बर्फ़ के ग्लेशियर भी मिलने शुरु हो गये थे, जिस पर से गुजरना वो भी आसानी से हर किसी के लिये आसान नहीं होता है, ये बात विपिन सबसे ज्यादा जानता है, डर तो सबको लगता है, बहुत सम्भल-सम्भल कर, ये बर्फ़ के ग्लेशियर पार करने होते है, इनमें जरा सी लापरवाही बहुत ही भारी पड सकती है, किसी-किसी ग्लेशियर में तो फ़िसलने वाले के लिये नीचे रुकने/अटकने की जगह भी नहीं दिखाई देती है। बर्फ़ देखने में जितनी प्यारी होती है, असलियत में उतनी ही भयानक भी होती है, जो कभी लपेटॆ में आया होगा वो जानता होगा। बर्फ़ के ग्लेशियर मार्ग में कई बार आये थे, कोई भी ऐसा नहीं था जो बिना सावधानी के पार किया जा सकता हो। सबसे बुरी बात इन ग्लेशियर में बीच-बीच में सुराख भी हो गये थे। जिनमें किसी के भी गिरने का शत-प्रतिशत खतरा था। हो सकता है कि कोई लापरवाह गिरा भी जरुर होगा।

ग्लेशियर पार करने में सबकी हवा खराब होती है।

एक बात देख कर बडा ही आश्चर्य हुआ, वो ये कि ऐसी इतनी दुर्गम खतरनाक चढाई पर, जहाँ आम इंसान आसानी से नहीं पहुँच पाता है, वहाँ भी भेड वाले अपनी-अपनी भेड को लेकर आये हुए थे। जिन जगह पर भेड वाले आये हुए थे, उन्होंने वहाँ  पर अपनी झोपडी बनाई हुई थी, उसके आसपास गोबर/मिंगन की वजह से बुरा हाल किया हुआ था, बारिश के कारण और भी बुरा हाल  हो गया था, हम बडे बेमन से उसमें से निकले थे। क्योंकि भेडों ने मार्ग भी नहीं छोड रखा था। इन भेड वालों के साथ पहाडी कुत्ते भी होते है जो जंगली जानवरों से भेडों को बचाते है। मेरे पास भी एक पहाडी नस्ल का शेरु है जिसकी उम्र साढे पाँच साल हो चुकी है।


हमारी समझ में ये नहीं आया कि यहाँ तक भॆड आयी कैसे?


बेटे हो जाओ तैयार दम निकलने वाला है।

इस यात्रा में कई बार तो ऐसे-ऐसे खतरनाक मौके भी आये, जिसके बारे में तो सोच कर अब भी, रोंगटे भी खडे हो जाते है। मैं तो वैसे भी उतराई सम्भल कर ही उतरता हूँ, लेकिन कई जगह तो नीरज भी बहुत ही सोच समझ कर नीचे उतर रहा था, अरे भाई जब आप आसमान से एकदम पाताल में जाओगे तो बताओ किस रफ़तार से उतरोगे, तेजी से या बडे सम्भल-सम्भल के। जो लोग पहले भी यहाँ आ चुके थे, उन्होंने बताया कि इस साल तो मार्ग बहुत ही अच्छा है। पिछले साल तो आना-जाना ही मुश्किल हो गया था। हमने आकाश से पाताल तक जाने के कारनामे तीन बार दोहराने पडे थे। ये तीनों जगह आसपास ही थी। और हम इन सब कठिनाईयों पर पार पाते हुए तीन बजे तक भीमडवार आ चुके थे, यहाँ पर सबसे पहले टैंट में ही रुक गये थे। जिसका मालिक घनश्याम है, वह हर साल टैंट लगाता है, एक रात में रुकने का सौ रुपया, व खाने का एक बार का सत्तर रुपये लिया था। 

कभी पाताल लोक के किनारे खडे हुए हो, जब मैंने ये नजारा देखा तो मैं जोर से चिल्लाया था।
बिल्कुल पाताल लोक जाने का या स्वर्ग जाने का मार्ग है।
बस बढते रहो, मत देखो कि कैसा मार्ग है।

अगर हिम्मत बची हो तो ठीक, नहीं तो पहले आराम से बैठ कर मन में हिम्मत भर लो।


अब पीछे देखो कि कैसा था मार्ग।



बस वहीं से होकर आये है हम।


लगता है कि अब मुसीबत खत्म होने वाली है।


एक बार फ़िर बहार आ गयी है।


अरे सच में ये तो भीम डवार ही आ गया है।

ये बैनर भंडारे पर लगा हुआ था।

हम दो-दो पराठे खाने के बाद आसपास की जगह घूमने के लिये चल पडे थे। सामने ही भीमडवार का एकमात्र भंडारा था, जिसमें जाकर कढी चावल का प्रसाद ग्रहण किया गया। घूम-घाम कर शाम होने से पहले ही वापस टैट में आ गये थे। आज हम दो-ढाई किलोमीटर आगे, सामने पहाड की चॊटी पर दिखाई दे रहे पार्वती बाग तक जा सकते थे। लेकिन वापस आने वाले बता रहे थे कि पार्वती बाग में दोपहर एक बजे के बाद जाने वालों को मुश्किल से ही टैंट मिल पाते है, वहाँ पर ठन्ड भी ज्यादा है, इसलिये हम ऊपर पार्वती बाग तक नहीं गये। रात में आज नीरज जाट जी की बदबूदार गैस का डर नहीं था, क्योंकि उसने आज कई दिनों बाद अपना पेट हल्का जो कर लिया था। 

भीम डवार में आसपास का दिलकश लुभावना नजारा।



रात में भीम डवार में ही रुक गये थे, अगली सुबह कि अब आपको आगे की यात्रा बतायी जायेगी,

                 जिसमें पार्वती बाग, नैन सरोवर, व श्री खण्ड महादेव तक आने जाने की यात्रा रहेगी


                    इस यात्रा का जो भाग देखना चाहते हो उसके लिये यहाँ नीचे क्लिक करना होगा









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23 टिप्‍पणियां:

sm ने कहा…

beautiful flowers
like the narration

S.N SHUKLA ने कहा…

बहुत सुन्दर सारगर्भित, आभार
रक्षाबंधन एवं स्वाधीनता दिवस के पावन पर्वों की हार्दिक मंगल कामनाएं.

Vidhan Chandra ने कहा…

मान गए आप को संदीप भाई आपका स्टेमिना जबरदस्त है, लेकिनआप के साथ किसी यात्रा पर जाते वक्त सोचना पड़ेगा, क्योंकि आप स्पीड से चलते हो ......... फोटो आप का वाकई लाजवाब हैं!!देखिये हमें कब मौका मिलता है श्रीखंड यात्रा पर जाने का.

डॉ टी एस दराल ने कहा…

यात्रा जैसे जैसे आगे बढ़ रही है , पहाड़ों की खूबसूरती और यात्रा का रोमांच उतना ही बढ़ता जा रहा है .

बहुत दुर्गम यात्रा है ये लेकिन बेहद दिलचस्प .

Suresh kumar ने कहा…

संदीप भाई वाकई मे बहुत ही खतरनाक रास्ते है
सभी तस्वीरे बहुत ही लाजवाब है
धन्यवाद्

PrakashYadav ने कहा…

ये स्टाईल कैसा लगा, मेरा नहीं है।...
यह स्टाइल गप्पू जी registered ने कर लिया है....
हाहहाहा क्यों गप्पू जी....

Ankit pandey ने कहा…

Sandeep ji,
bahut achchhi lagi aapka safar.

राज भाटिय़ा ने कहा…

जब ब्लाग जगत के दो जाट मिल गये तो पोस्ट ओर यात्रा तो बहुत अच्छी होनी थी, फ़ोटू भी घणे सुथरे आये. राम राम

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

उफ्फ, काश हम भी वहाँ होते।

Ginger ने कहा…

great pictures!!

Gappu ji ने कहा…

@प्रकाश जी ! मैंने ऐसा कुछ सोच के नहीं किया था.देश, काल और परिस्थितियों के अनुसार हो जाता है !!

नीरज जाट ने कहा…

भाई, अभी कल परसों ही मैं जरा आंख बन्द करके इस यात्रा को दोबारा कर रहा था। भीमद्वारी तक तो पहुंच गाय था लेकिन उससे आगे जाने की हिम्मत ही नहीं हुई। अब भी सोचता हूं कि मैंने यह इतनी कठिन यात्रा पूरी कर कैसे ली?
वाकई भयानक यात्रा थी।

वाणी गीत ने कहा…

खूबसूरत तस्वीरों ने मन मोह लिया ...
रोमांचक यात्रा वृतांत !

दीपक डुडेजा ने कहा…

एक शब्द रोमांचक ...

फोटू बहुत सुंदर है..... बहुत ही.

जाट देवता (संदीप पवाँर) ने कहा…

नीरज तो सपने में भीमडवार तक चला भी गया, लेकिन मैं तो वापस आते समय अपनी कमीज भीम ड्वार में ही भूल गया था,

वो याद आयी तीन किलोमीटर बाद,

अपनी हिम्मत नहीं हुई दुबारा जाकर कमीज लाने।

Sunil Kumar ने कहा…

हिम्मत के साथ यात्रा फोटो बहुत अच्छे है कैमरा कौन सा हैं ?

Mrs. Asha Joglekar ने कहा…

मनमोहक दृष्यों ने दिल जीत लिया । मेहनत तो आपने की पर ऐसे खूबसूरत नजारे आँखों से भी आप ही ने देखे । बेहद रोचक यात्रा वर्णन और सुंदर चित्र । पानी पीने का यही अंदाज अपनाना पडता है यहां वॉटर फाउन्टेन पर ।

Vaanbhatt ने कहा…

भैया कितने दिन और दुरी की यात्रा है...सराबोर कर दिया आपने तो रोमांच से...

Vijai Mathur ने कहा…

स्वाधीनता दिवस की हार्दिक मंगलकामनाएं।

veerubhai ने कहा…

सुप्रिय संदीप भाई , ,यौमे आज़ादी मुबारक आप इसी तरह सांगीतिक रहेंजीवन की लय ताल बनाए रहें ,खिले खिले फूल से ,रहनुमाओं को कुछ होश आये ....अब लगे हाथों जब मौक़ा मिले दक्षिणी गंगोत्री (एंटार्कटिका)और हो आओ ,दक्षिण ध्रुव की यात्रा बिरले ही कर पातें हैं ,टेक्नीकल पैरा -फर्निलिया चाहिए .हम देटरोइट में डॉ .सैनी से मिले जो ६० देशों की सैर कर चुकें हैं जिनमे दक्षिणी गंगोत्री (दक्षिण ध्रुवीय क्षेत्र )भी शामिल है .आप हिन्दुस्तान में अपना एक अलग मुकाम बना रहें हैं .दुर्गम परबत शिखरों को नापना आपकी आदत हो गई है ।
यामे आज़ादी की सालगिरह मुबारक .
http://veerubhai1947.blogspot.com/

रविवार, १४ अगस्त २०११
संविधान जिन्होनें पढ़ा है .....


http://kabirakhadabazarmein.blogspot.com/
Sunday, August 14, 2011
चिट्ठी आई है ! अन्ना जी की PM के नाम !

veerubhai ने कहा…

रविवार, १४ अगस्त २०११
संविधान जिन्होनें पढ़ा है .....
अन्नाजी को कटहरे में खड़े करने वालों से सीधी बात -
अन्नाजी ने संविधान नहीं पढ़ा है ,वह जो चाहे बोल देतें हैं ?
मेरे विद्वान दोश्त कपिल सिब्बल जी ,संविधान इस देश में जिन्होनें पढ़ा था उन्होंने इमरजेंसी लगा दी थी .और संविधान में यह कहाँ लिखा है ,कि किसी व्यक्ति की उम्र नहीं पूछी जा सकती ,उससे ये नहीं कहा जा सकता ईश्वर ने आपको सब कुछ दिया है ,अब आप उम्र दराज़ हो गए राष्ट्र की सेवा करो ।आपके पास नैतिक ताकत है ,आप ईमानदार हैं .
संविधान में यह भी मनाही नहीं है कि एक साथ चार -मूर्खों को मंत्री बना दिया जाए ,और एक षड्यंत्र रच के १४ अगस्त की शाम एक साथ सारे एक ही स्वर में ,एक ही आरोह अवरोह में झूठ बोलना शुरु करें ।
और ये कौन से सावंत की बात हो रही है अदालत तो राखी सावंत भी लगातीं थीं ?
क्या किसी नैतिक शक्ति से संचालित होकर भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलने की संविधान में मनाही है या फिर प्रजातंत्र में यह नैतिक शक्ति ही उसे प्रासंगिक बनाए रहती है ?
किसी नवीन चावला को भी संविधान के ऊपर थोपने की मनाही नहीं है ।
विदूषी अंबिका सोनी जी कहीं संजय गांधी जी की तो बात नहीं कर रहीं ।?गांधी तो वह भी थे .
महात्मा गांधीजी को तो यह हक़ हासिल था कि वह पंडित नेहरु या सुभाष चन्द्र बोस की उम्र पूछ सकें ।
ये काले कोट वाले सुदर्शन कुमारजी जांच तो भगत सिंह की भी करवा सकतें हैं -संसद में बम गिराने का असलाह और पैसे कहाँ से जुटाए थे ज़नाबभगत सिंह ने ?
सारे महानुभाव मय मनीष तिवारीजी ,सुदर्शन हैं ,सुमुखी हैं ,वाणी से इनकी अमृत झर रहा है ,संविधान में इसकी भी मनाही नहीं है इन्हें कुछ भी बोलने की छूट न दी जाए ।
"अनशन स्थल और अवधि वही जो सरकार बतलाये ,आन्दोलन वही जो सरकार चलवाए ।".
अन्ना का खौफ क्यों भाई ,कल को कोई अन्नभी मांगेगा ,अन्न कहेगा तो सरकार "अन्ना "समझेगी ?इस नासमझी की भी संविधान में मनाही नहीं है ?
http://veerubhai1947.blogspot.com/

नीरज गोस्वामी ने कहा…

गज़ब के चित्र...एक ही स्थान की यात्रा का वर्णन बिलकुल अलग अंदाज़ में पढने को मिलता है आपके और नीरज के ब्लॉग पर...मजा आ रहा है...इस दुर्गम यात्रा के लिए कलेजा और बुद्धि दोनों चाहियें...
नीरज

दर्शन कौर' दर्शी ' ने कहा…

खतरनाक ! रोमांचक ! यात्रा ! जो वहाँ भंडारा करते हैं और तम्बू लगते हैं उन्हें नमन !
भेड़ वहा क्यों चराते हैं ..क्या वहा कोई गाँव भी था ?

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