सोमवार, 4 जुलाई 2011

संगम (प्रयाग) से काशी(बनारस) तक पद यात्रा भाग 3, VARANSAHI, BANARAS KE GHAT, GANGA

प्रयाग काशी पद यात्रा-
कमरा किराये पर लेकर,उसमें सामान रख, ताला लगा कर, हम गंगा किनारे घूमने के लिये आ गये कि तभी मन में ख्याल आया कि कल तो महाशिवरात्रि है भीड का बुरा हाल रहेगा, मंदिर में तसल्ली से दर्शन होने सम्भव नहीं है, अत: आज तसल्ली पूर्वक दर्शन किये जाये। अपना कमरा जिस जगह पर था उस गली से एक रास्ता सीधा मंदिर में जाता था, दूरी लगभग 150 मीटर ही थी। 

लो जी यहाँ से करो घाट के दर्शन, पूरे दो किलोमीटर तक घाट ही घाट है,



हम मंदिर में गये, यहाँ जाने से पहले सब सामान सिर्फ़ पैसों को छोडकर अन्दर ले जाने पर पाबंदी है। अत: मोबाइल आदि सब कुछ कमरे पर रख कर आना पडा था। मंदिर में अन्दर जाकर आसानी से पूरा मंदिर छान मारा, इसी छानबीन में पता चला कि आज यहाँ पर जो मंदिर है वो असली मंदिर नहीं है। असली मंदिर में तो मस्जिद बनी हुई है, व मुस्लिम लोग वहाँ पूजा/नमाज करते है। ज्यादा ध्यान से देखने की भी जरुरत नहीं है, ये सब फ़र्क आराम से दिखाई दे जाता है। इसका सबसे बडा सबूत है, शिव का नंदी, सब को पता है कि नंदी का मुँह हमेशा मंदिर के मुख्य द्धार की ओर होता है, अत: यहाँ भी उसी पुराने मंदिर के टूटे हुए द्धार की ओर ही है नंदी का मुँह?
ऐसा की कुछ मथुरा में भी है। अयोध्या में भी था। जहाँ अब ना मंदिर है ना मस्जिद, यानि ना बांस है, ना बांसुरी बजेगी।

नज़ारे


बनारस में आकर अगर कोई आठ-दस घंटे गंगा किनारे ना बिताये, तो उसका बनारस आना बेकार है। हम आज कोई पच्चीस किलोमीटर ही पैदल चले थे, थकावट नाम की कोई चिडिया हमारे पास भी नहीं उड रही थी, रही बात छालों की, ऐसे छाले तो अपनी गलती से पडते है, पक्के मार्ग पर धूप में चलने का परिणाम तो मिलना ही था। आज दिन था, 1 मार्च सन 2011 का, हमें गंगा जल तो कल महाशिवरात्रि के दिन शिवलिंग पर अर्पण करना था, आज हमने काशी के सारे घाट देखने का कार्यक्रम बना डाला, हो गये पैदल चलना शुरु.........

घाट ही घाट
नाम भी थे

सबसे पहले हम इन घाटों के बिल्कुल आखिरी छोर तक चले गये, वहाँ तक जहाँ से आगे घाट ही नहीं थे, लगभग दो किलोमीटर में फ़ैले ये घाट आपस में ऐसे जुडे/जोडॆ हुए है जैसे जुडवॉ बालक हो। यहाँ कुल मिलाकर चौरासी घाट बताये जाते है, हमने गिने तो नहीं, लेकिन हमें पूरे दो घंटे लगे एक कोने से दूसरे कोने तक आने में, हम भी पूरी तरह निठल्ले थे, इसलिये तसल्ली बक्स काम करने वालों की तरह तसल्ली से देखते रहे, एक घाट से दूसरा घाट, इनमें से कुछ के फ़ोटो भी आप सब देख रहे हो, अब तो याद भी नहीं आ रहे है, कि क्या-क्या नाम थे इन घाटों के, 

एक ये घाट भी
इसी घाट पर सामने जाकर कमरा लिया था
एक ये भी
किले का घाट

शाम को आरती का शानदार कार्यक्रम गंगा के तट पर किया जाता है, जो हमेशा किया जाता है, हर दिन हर मौसम में, हम कहाँ छोडने वाले थे इस मौके को, इसका भी पूरा मजा लिया, पूरे दो घंटे का शानदार दिल को लुभाने वाला रहा।

आरती स्थल का दिन में
आरती की तैयारी
सुबह महाशिवरात्रि पर गंगा जल चढाने के लिए लम्बी लाइन
कुछ देर आराम
हरिश्चंद घाट
बाज़ार में किसी जगह पर

यहाँ अंतिम संस्कार यानि क्रिया-क्रम करने के लिये दो मुख्य श्मसान घाट है, पहला राजा हरिश्चन्द्र घाट व दूसरा घाट है मणिकर्णिका घाट कहते है कि जिसका का अंतिम संस्कार काशी के घाट पर हो जाता है , उसको जन्म-मरण के चक्कर से मुक्ति मिल जाती है,

इसका मतलब अगर आप इस पृथ्वी से तंग आ गये हो, तो अपना अंतिम ताम-झाम यहीं करवाने का बंदोबस्त जरुर कर ले। यदि दुबारा यहीँ जन्म लेना चाहते है, तो जहाँ रहते है, वहीं पर ही आपका सब कुछ हो जायेगा, चिंता ना करे, मैं तो अंतिम ताम-झाम के लिये काशी बिल्कुल ना जाऊँ, जब तक ये सारी धरती देख ना लूं। बार-बार जन्म लेता रहूँगा, जब तक कि सारी पृथ्वी का भ्रमण ना कर लूं।

मणिकर्णिका घाट

यहाँ के श्मसानों में मैं एक-एक घंटा रुक कर देख आया हूँ, कि किस प्रकार यहाँ लाशों की दुर्गति होती है। जिस लाश(चिता) का कोई देखने वाला नहीं होता है उसे आधा ही जलने देते है, व गंगा जी में चलता कर देते है, ऐसी कई अधजली लाश मैंने स्वयं देखी है। कुत्ते इन लाशों को खाने में लगे हुए थे। क्या यही मुक्ति है तो अपने जानने वालों के लिये एक संदेश है कि ऐसी मुक्ति से तो दूर ही रहो तो भलाई है।


कुण्ड

यहाँ आने से पहले काशी करवट के बारे में बहुत सुना था, जब यहाँ आकर देखा तो लगा कि इस तिरछे से दिखाई देने वाले मंदिर व गंगा के शानदार घुमावदार मोड का क्या शानदार सम्बंध है।

काशी करवट का नजारा


यहाँ हमने अपनी बडी हुई ढाडी कटवाने के लिये गंगा तट पर ही कटवाने की सोची थी, लेकिन नाई के पहले ही वार में समझ में आ गया कि बहुत बडी गलती कर दी है, अब पूरी ढाडी बने बिना उठ नहीं सकते थे, आधी भी बडी मुश्किल से बना पाया, पता नहीं कौन सी फ़ैक्ट्री का ब्लेड प्रयोग में लाता था। अपने घर तो हम सस्ते से सस्ते ब्लेड से भी दो दाडी आराम से बना लेते है, उस नाई ने जो रुलाया कि सारे देवता याद आ गये, आधी दाडी में ही दूसरा ब्लेड लगाना पडा, पर वो भी उसका बाप निकला मैंने कहा "हट जा मैं अपने आप बना लूंगा"


भूल कर भी न कटवाना
लोहे के पुल के पास,

कबीर दास जी के मंदिर के पास ही ये लोहे का पुल है।

एक ये नजारा




अगले भाग में सारनाथ के स्मारक रहेंगे।



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प्रयाग काशी पद यात्रा-

27 टिप्‍पणियां:

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Zakir Ali 'Rajnish') ने कहा…

आपकी यात्राएं सोचने का नया नजरिया प्रदान करती हैं।

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तांत्रिक शल्‍य चिकित्‍सा!
…ये ब्‍लॉगिंग की ताकत है...।

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

चित्रों के माध्यम से बनारसी दर्शन।

Rajesh Kumari ने कहा…

aapki banaras ki yaatra ka varnan evam chitr dekhe, bahut achche hain. dadhi banvaane ki baat aur chitr ko dekhkar muskurahat aa gai sab ghaton ke darshan ghar baithe hi ho gaye.aage ka intjaar rahega.

veerubhai ने कहा…

भैया गंगा पैसे खाने चढ़ वाने के लिए ही हमारी माँ है ,असल हाल आप देख आयें हैं .यहाँ मुर्दे की भी गति नहीं ,चल गंगा में .ये है गंगा सफाई अभियान की असलियत .ये सब उस धर्म में है जहाँ मय आपके ३३० मिलियन और एक देवता हैं .यानी तैतीस कर -ओड़ -एक .काशी करवट का मिथ भी बतादेतें .

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) ने कहा…

इतने खूबसूरत नजारों से नजरें ही नहीं हटी बस देखता ही रह गया.रात को फुरसत लेख पढ़ूंगा. फोटोग्राफ्स नयनाभिराम हैं.बहुत सुंदर.

रविकर ने कहा…

अयोध्या में भी था। जहाँ अब ना मंदिर है ना मस्जिद यानि ना बांस है, ना बांसुरी बजेगी।

मैं तो अंतिम ताम-झाम के लिये काशी बिल्कुल ना जाऊँ, जब तक ये सारी धरती देख ना लूं। बार-बार जन्म लेता रहूँगा, जब तक कि सारी पृथ्वी का भ्रमण ना कर लूं।

आधी दाडी में ही दूसरा ब्लेड लगाना पडा, पर वो भी उसका बाप निकला मैंने कहा "हट जा मैं अपने आप बना लूंगा"

कुत्ते इन लाशों को खाने में लगे हुए थे। क्या यही मुक्ति है|


बधाई |
सुन्दर भावों की अभिव्यक्ति ||

Sunny Dhanoe ने कहा…

Beautiful Post... Lovely Pictures :)

Regards,
Sunny Dhanoe
http://wolfariann.blogspot.com/
http://radiopunjab.blogspot.com/

अन्तर सोहिल ने कहा…

इस यात्रा की तस्वीरों के लिये धन्यवाद

प्रणाम

नीरज गोस्वामी ने कहा…

भाई जी आपके ब्लॉग का बेर ना पाट्या नहीं तो पहले ही आ जाते...अब आते रहेंगे...आप नीरज जाट से कम नहीं हो...बढ़िया चित्र और शानदार वर्णन पढने वाले को और क्या चाहिए...पुराणी पोस्ट पढ़ते हैं इत्मीनान से

नीरज

Udan Tashtari ने कहा…

शानदार विवरण...इस बार तस्वीरें बहुत उम्दा आई हैं...

डॉ टी एस दराल ने कहा…

बनारस के घाट तो बढ़िया घुमा दिए ।
लेकिन गंगा का क्या हाल था यहाँ ?
हमने तो एक बार ऋषिकेश के घाट पर कूड़े करकट का जो हाल देखा तो फिर कभी नहीं गए ।

mahendra verma ने कहा…

बनारस की यात्रा बहुत रोचक रही।
ऐसा महसूस होता है कि हम भी आपके सहयात्री हैं।
चित्रों से प्रस्तुति अत्यंत प्रभावशाली हो गई है।

veerubhai ने कहा…

मेले ठेलों पर आइन्दा सेव मत बनवाना .गुडगाँव अम्मा हमारे बच्चों अपने पोतों को ले गईं थीं एक मर्तबा बाल उतरवाने ,अब का तो हमें पता नहीं उस दौर में गंदगी का साम्राज्य था माता के मंदिर के गिर्द उस्तरा खुट्टल था नाऊ का ,जगह जगह कट लगे सो अलग .ऐसी आस्था किस काम की जहां हर पल एच आई वी एड्स संक्रमण का ख़तरा हो बाल मुंडवाने शेव बनवाने में भी .अच्छा व्यंग्य करते चलते हो संदीप देवता जाट कबीराना अंदाज़ में .चलते रहो .छरहरे रहो .

Vivek Jain ने कहा…

बहुत ही सुंदर प्रस्तुति,
विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

Rajesh ने कहा…

Wonderful shots of the place. This is truly enchanting experience.

surendrshuklabhramar5 ने कहा…

कमरा लेकर हम गंगा किनारे घूमने के लिये आ गये
संदीप जी आप तो भीम हो क्या कमरा लेकर घुमने -आओ न फिर जंतर मंतर ...
सुन्दर नजारा घाट मानस मंदिर से हरिश्चंद्र घाट आप ने घुमा दिया हम तर गये न जाने बाद में ...अरे वही जो आप ने देखा सब जल्दी में छोड़ चले आयें बस में बैठ और ...
ये बहुत से घाट मंदिर नंदी सब हमने देखा मगर आप के कैमरे से देखने का आनंद गजब है ..
अरे दाढ़ी नहीं बनाना था गलती किये ने ये मुंडन करते हैं --बस उठाया और बच्चे किहाँ किहाँ ...बच्चे उनसे आप सा लड़ते थोड़ी हैं ---ननद रानी और ख़ुशी हो -आँचल भर लेती हैं
शुक्ल भ्रमर ५

sm ने कहा…

nice pics
thanks for sharing info about real temple and worshiped by muslims

एम सिंह ने कहा…

लगा जैसे मैं भी आपके साथ यात्रा कर रहा था.

abhi ने कहा…

मजा आ गया भाई :)

रेखा ने कहा…

संयोग से मेरा बनारस से गहरा रिश्ता है.बनारस में घूमने का अनुभव सबसे अलग है चाहे वहां के चौरासी घाटों को ले लें या फिर मंदिरों को . मैं भी बनारस अच्छी तरह से घूम चुकी हूँ परन्तु घाट घुमते घुमते बहुत ही थक गई थी, आपकी तो बात ही निराली है.

Mrs. Asha Joglekar ने कहा…

यात्रा वर्णन और चित्र दोनो ही बहुत सुंदर है । काशी तो हम भी गये हैं पर ये नंदी वाली बात पर जो आपने ध्यान खींचा वह तब धिमाग में नही आया था । हमने तो दो तीन घाट गही देखे थे दशाश्वमेध और मणिकर्णिक घाट वगैरा आपने तो टित्रों के माध्यम से सारे घाट दिखा दिये । सारनाथ देखने की उत्सुकता है ।

veerubhai ने कहा…

गंगा -जल -पान करने वाले ,
क्या जाने सुरा -सोमरस पान !

Dr (Miss) Sharad Singh ने कहा…

शानदार तस्वीरों और विवरणों युक्त बनारस भ्रमण...कई स्मृतियां ताजा हो गईं.

amrendra "amar" ने कहा…

लगा जैसे मैं भी आपके साथ यात्रा कर रहा था.
सुन्दर भावों की सुन्दर अभिव्यक्ति |

नीरज जाट ने कहा…

भईया, हम तो मेरठ में ही मर-खप जायेंगे। बनारस को दूर से ही अलविदा करते हैं- अलविदा बनारस।

संजय @ मो सम कौन ? ने कहा…

संदीप भाई,
आनंद आ गया सब पढ़कर। अपने को बिना बनावट वाले बंदे बहुत पसंद है, कृत्रिमता झिलती नहीं है और यहाँ आकर बहुत कम्फ़र्टेबल लगता है।
नाई महाराज वाली बात पर अपने को भी एक आपबीती याद आ गई, कभी सुनायेंगे।
नीरज और संदीप दोनों एक ही सिक्के के पहलू लगते हैं, श्रीखंड यात्रा का इंतज़ार कर रहे हैं।

Vaanbhatt ने कहा…

बड़ी बारीक नज़र है...इतनी बारीकी से तो हमने कभी बनारस नहीं देखा...

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