मंगलवार, 15 फ़रवरी 2011

बाइक से नचिकेता ताल व गंगौत्री यात्रा, Nachiketa Taal/Lake & Gangotri bike trip


बर्फ़ का बिस्तर

मैं नितिन कुमार बाइक पर घूमने का इतना शौकीन हूँ कि मुझे इसके अलावा और किसी भी वस्तु में वो मजा नहीं आता है जो कि बाइक पर पहाडों में घूमने में आता है।




ऐसा मार्ग भी था
मैं साल 2008  में दिल्ली से नचिकेता ताल व गंगौत्री यात्रा की यात्रा पर अकेला घूमने के लिये गया था, मेरे साथ जाने वाले तो कई थे लेकिन वे सभी ताजा बर्फ़बारी के बारे में सुनकर डर गये थे, जिसके कारण मुझे अकेले को ही ये यात्रा करनी पडी थी।


इसे तो बताना ही बेकार है, ठन्ड में गर्मी का एहसास,

दिल्ली से सुबह पाँच बजे चलकर मैं दस बजे तक हरिद्धार पहुँच गया था। यहाँ अपने पाप यदि गलती से कभी अनजाने में किये होंगे तो वे सभी गंगा में नहा धो कर उतार दिये।


 बर्फ़ का ढेर
यहाँ से आगे की यात्रा पर ठीक बारह बजे आगे रवाना हो गया, ऋषिकेश, नरेन्द्र नगर, चम्बा होते हुए, टिहरी शहर होते हुए, जब तक टिहरी बाँध बनकर तैयार नहीं हुआ था। मैं अकेला सफ़र का मजा लेते हुए धरांसू नामक जगह पर जा पहुँचा, इस जगह से उल्टे हाथ एक मार्ग यमुनौत्री की ओर चला जाता है, यहाँ कुछ देर रुकने के बाद मैं बत्तीस किलोमीटर दूर उतरकाशी जाकर रात में आराम के लिये रुक गया,



हर्षिल के पास


इस शहर में भगवान शिव का एक बहुत ही प्रसिद्ध मन्दिर है, जिस के नाम पर इस शहर का नाम पडा। इस मन्दिर में एक ऐसा विशाल त्रिशूल है जिसे हाथ से नहीं हिला सकते हो, लेकिन उसे आप अपने हाथ की किसी भी एक अंगुली से छुआ कर हिला सकते हो।


एक घर की छत से

अगले दिन यहाँ से आगे मनेरी, भटवाडी, गंगनानी जा पहुँचा, यहाँ कुदरती रुप से गर्मागर्म पानी में स्नान किया गया। ये पानी यहाँ इतनी ज्यादा मात्रा में गर्मागर्म निकलता है कि आप एक साथ सौ- दो सौ लोग आराम से नहा सकते हो। नहा धो कर सुक्खी टाप, हर्षिल, लंका होता हुआ आराम से गंगोत्री जा पहुँचा।


बीच मार्ग का

एक घंटा रुकने के बाद वापस उसी मार्ग से मैं उतरकाशी आ कर रात्रि में आराम किया।


ताल के पास बर्फ़ में मजा

अगली सुबह उतरकाशी से सीधे हाथ की ओर जाने वाले मार्ग पर चौरंगीखाल नामक जगह जा पहुँचा, ये मार्ग आगे लम्ब गाँव की और चला जाता है, मैंने अपनी बाइक एक किनारे लगायी व तीन किलोमीटर दूर नचिकेता ताल के लिये चल पडा, ये मार्ग बहुत ज्यादा कठिन तो नहीं है, फ़िर भी इतना आसान भी नहीं है। एक घंटे की मेहनत के बाद जब इस ताल के दर्शन हुए तो मन प्रसन्न हो गया, सारी थकावट  छूमन्तर हो गयी, एक घंटा यहाँ रुकने के बाद मैं वापस उतरकाशी, धरांसू, चम्वा होता हुआ,.......................,


मनेरी बांध के किनारे
मनेरी बांध से आगे पानी सुरंग से बाहर आता हुआ।

5 टिप्‍पणियां:

जाट देवता (संदीप पवाँर) ने कहा…

नितीन,
कैसे हो,
अब तुम्हारी पोस्ट लग गयी है, देख लेना,
अब कहाँ जा रहे हो बाइक पर, मुझे बताना,
नहीं तो मेरे साथ चलना शिमला से आगे घूम कर आयेंगे।

रविकर ने कहा…

फोटो १- बर्फ की चादर पर हलचल

बर्फ कहीं न जाए गल ||


फोटो २- बर्फ को चेतावनी --

पहले थे ये पड़े हुए |

तेरे संग अब खड़े हुए |

शर्त लगा मत लेना आइस -

हैं जाट देवता अड़े हुए ||

(NITIN)

फोटो ३- बजा दिया है डंका ताऊ

जीत के बैठा लंका ताऊ |

सारा पानी जमता जाता

कैसे निपटून शंका ताऊ ||


फोटो ४- अरे बर्फ तो सारी गल गी |



फोटो सबसे बाद वाला --

बाँध मनेरी बहुतै सुन्दर
सुरंग भी लागे बड़ी मनोहर |

बहुत-बहुत आभार देवता -

देखे पर्वत और सरोवर ||

आशुतोष की कलम ने कहा…

जाट देवता की जय हो
इतनी हिम्मत तो आप ही दिखा सकते हैं.
मगर जरा ध्यान रखें खतरनाक रास्ते में जाते समय...रोचक संस्मरण

Vaanbhatt ने कहा…

नितिन जी को मेरी ओर से हार्दिक धन्यवाद...इन रास्तों से मै सपरिवार गुजरा हूँ...बोलेरो द्वारा...बाइक से यात्रा की कल्पना मात्र से रोमांच हो आता है...

Maheshwari kaneri ने कहा…

.रोचक संस्मरण...

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