किले के मैदानी भाग में जहाँ चलने फ़िरने में समस्या
नहीं आ रही थी उसके उल्ट यहाँ किले के पहाड़ी भाग की ओर चलते ही साँस फ़ूलने लगी। विशाल
कहने लगा संदीप भाई सामने देखने पर लग रहा है कि किले का शीर्ष अभी एक किमी दूरी पर
है। मैंने कहा हाँ भाई लगता तो ऐसे ही है बाकि चल के पता लगेगा। हम ऊपर पहाड़ी की ओर
चढ़ने लगे। अभी आधा किमी दूरी ही पार नहीं की होगी कि एक बार फ़िर एक दरवाजे से टेढ़े-मेड़े
होकर आगे बढ़्ना पड़ा। पहले दरवाजे के पास टेढ़े-मेड़े रास्ते इसलिये बनाये जाते थे ताकि
बाहर से आने वाला हमलावर यहाँ आकर कमजोर पड़ जाये। क्योंकि हमलावर कितनी भी बड़ी संख्या
में हो, ऐसे दरवाजे से तो उसको पंक्ति बद्ध होकर ही आगे बढ़ना होगा। यही पंक्ति ही कमजोर
कड़ी होती थी। जिस पर थोड़े से सैनिक भी बहुत बड़ी सेना पर भारी पड जाते थे। यहाँ कुछ
बन्दर/लंगूर बैठे हुए थे। लेकिन हम जैसे वनमानुष को देखकर उन्होंने जाते समय तो कुछ
नहीं कहा, आते की बात आते समय बतायी जायेगी।
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किले के चारों और ऐसी ही खाई है। |
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चलते रहो। |
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अंधेरे से बचकर जाने वाला मार्ग। |
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यह अंधेरी गुफ़ा का मार्ग है। |
किले में आगे की ओर बढ़ते हुए हमें लोहे का एक पुल भी पार
करना पड़ा, यहाँ पर यह पुल इतना तंग है कि एक बार में एक बन्दा ही आसानी से निकल सकता
था। अगर दो बन्दे एक साथ आ जाते थे तो थोड़ा सम्भल कर निकलना पड़ जाता था। यह लोहे वाला
पुल, किले के ऊपरी भाग में जाने के लिये एकमात्र प्रवेश मार्ग है। यह पुल
एक पानी से भरी गहरी खाई के ऊपर बनाया गया था। पानी वाली खाई में मगरमच्छ पाले जाते
थे ताकि अगर कोई पानी से अन्दर घुसने की कोशिश करे या पानी में गिरे तो उसका काम तुरन्त
तमाम करने के लिये पानी में सुरक्षा करने की आवश्यकता ही ना रहे। पानी वाली खाई के कारण
यह किला एक तरह से बेहद की शक्तिशाली बन गया था। वैसे इस प्रकार की पानी वाली खाई और मगरमच्छ
वाली सुरक्षा मैंने कई किलों में देखी है। लेकिन यहाँ की बात ही निराली थी जिस कारण
इसकी सुरक्षा व्यवस्था को उन सब में सबसे ऊपर मानना होगा।
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अंधेरी गुफ़ा मार्ग के अन्दर चले। |
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ऊपर देखो गुफ़ा से झरोखा। |
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दूसरी गुफ़ा। |
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गुफ़ा के आखिरी में |
अब बात करते है पहाड़ पर ऊपर चढ़ने की। मान लिया कि
यदि कोई पानी की खाई पार कर दूसरी ओर किले की तरफ़ वाली पहाड़ी से चिपक भी गया तो उसका
ऊपर चढ़ना लगभग नामुमकिन सा दिखता है। यहाँ हमॆं जितना दूर तक दिखाई दिया, उतनी दूर
तक किले की पानी के साथ लगने वाली दीवार एकदम सपाट थी, सपाट दीवार लगभग 50-60 फ़ुट तक ऊँची थी, जिस कारण वहाँ पर चढ़ना एक तरह से
असम्भव प्रतीत होता है। चलो मान लिया जाये कि किसी सेना में ऐसे 5-7 योद्धा मिल जायेंगे जो ऐसी खतरनाक चढ़ाई भी चढ़ लेंगे
तो उसके बाद उनको सुरक्षा में तैनात सैनिकों की चौकस निगाह से भी बचना होता था। सैनिकों
की पहरेदारी ऊपर से तो रहती ही होगी, नीचे खाई के पास से भी सैनिक चौकसी जरुर रहती होगी।
ऐसे कई कारण से मुझे इस किले को देखने में बहुत अच्छा लगा। आपमें से यदि किसी ने इस
किले को देखा होगा तो वह मेरी बात से शत-प्रतिशत सहमत दिखायी देगा।
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गुफ़ा के झरोखे से बाहर देखो। |
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किले के ऊपर छोर से मीनार छोटी दिखायी दे रही है। |
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यह देखो खाई पार करने का एकमात्र मार्ग |
पुल पार करने के तुरन्त बाद, इस किले का रहस्यमयी
इलाका शुरु हो जाता है। मैंने देवकी नन्दन खत्री का टीवी पर एक सीरियल देखा था जिसमें
चन्द्रकांता वाली कहानी दिखायी गयी थी। यहाँ पुल पार करते ही मुझे चन्द्रकांता वाली
कहानी की याद हो आयी। किले में हर कुछ कदम चलते ही एक निराला सुरक्षा घेरा बनाया गया
था। यहाँ मैं जिस सुरक्षा की बात करने जा रहा हूँ उसे अंधेरी नाम दिया गया है। यह अंधेरा
मार्ग एक सुरंग नुमा रास्ता है इसे पार करने के लिये बेहद ही सावधानी व संयम रखना होता
है। यहाँ पर अंधेरी सुरंग ऊपर नीचे होती टेड़ी-मेड़ी पगड़ंड़ी ऊँची-नीची सीढियाँ चढ़कर आगे
ऊपर जाती थी। इस अंधेरी में हम कुछ दूर तक घुसे भी थे लेकिन हमारे दोनों मे से किसी
के पास टार्च ना होने के कारण हम ज्यादा अन्दर तक नहीं जा सके।
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सुरक्षा के लिये तोप यहाँ भी। |
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राज महल। |
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महल का बर्बाद भाग |
आजकल इसके अन्दर चमगादड़ bats का जमावड़ा है। जिस कारण चमगादड़ की अत्यधिक बदबू
होने के कारण ज्यादा देर इसमें बने रहना मुमकिन नहीं हो पाता है। मैंने तो फ़िर भी किसी
तरह इन चमगादड़ की भयंकर बद्बू सहन कर ली थी लेकिन साथी विशाल का उस बदबू से बुरा हाल
हो रहा था। अगर हम कुछ सैकिन्ड़ और वहाँ टिकते तो विशाल के वही उल्टी करने की सम्भावना
उतपन्न हो रही थी। जिस कारण हम वहाँ से बाहर भाग आये। पहले दुश्मन आने की सम्भावना
होने पर इस अंधेरी में धुआँ कर दिया जाता था ताकि दुश्मन रोशनी करके भी अन्दर ना आ सके।
इसके साथ ही सुरंग के मुहाने पर गर्म पानी व गर्म तेल तैयार कर लिया जाता था ताकि कोई
हिम्मत करके यहाँ तक पहुँच भी जाये तो उसका काम तमाम करने का समान तैयार मिले। जैसा
कि इस काले चित्र ने बताया है कि आम दर्शकों को सहायता के लिये यहाँ अब अंधेरी से अलग
सीढियाँ बना दी गयी ताकि आम लोग इस अंधेरी से बचकर ऊपर जा सके। हमने भी उन सीढियों
का लाभ उठाया, और वहाँ से ऊपर निकल गये।
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एक सुरंग। |
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किले का सबसे ऊपरी भाग। |
इस अंधेरी से बिना गुजरे तो हम ऊपर आ गये लेकिन
ऊपर आते ही हमें एक और छोटी सी अंधेरी गुफ़ा का सामना हुआ। यहाँ पर हमें इसी गुफ़ा से
होकर ही आगे बढ़ना पड़ा। चूकिं गुफ़ा पहाड़ के ऊपर की ओर जा रही थी इसलिये अंधेरे में हम
भी सावधानी से ऊपर चढ़ रहे थे। यहाँ कुछ लोग ऊपर से नीचे उतर भी रहे थे इसलिये हमें उनका
भी ध्यान रखना था। हमारे मोबाइल की टार्च ने हमें इस अंधेरे में काफ़ी मदद की थी। इस
अंधेरी गुफ़ा में बाहर देखने के लिये एक झरोखा भी बना हुआ था जहाँ से दूर-दूर तक दिखायी
देता था। हमने इस जगह से बाहर का नजारा देखा और महसूस किया कि वहाँ पर सैंकड़ों साल
पहले कैसे जीवन रहा होगा? सुरंग का इलाका समाप्त होने पर जब जहाँ हम बाहर आ रहे थे वहाँ
पर लोहे के जाल से उसका मुँह ढ़का हुआ था। यह भी यहाँ की सुरक्षा का एक बेहतरीन कदम
था। इसके बाद हम थोड़े से खुले मैदान में आ गये थे। यहाँ खुले मैदान को देखकर मन खुश
हुआ।
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ऊपर दे देखो शहर कैसा दिखायी देता है? |
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सबसे ऊपर की सबसे बड़ी तोप। |
इस जगह से हमने चारों ओर ओर नजरे घूमा-घूमा कर वहाँ का
हाल देखा तो पाया कि चाँद मीनार तो अब छोटी सी खम्बे जैसी दिखायी दे रही थी। यहाँ आकर
हमें वो पुल दिखाई दिया जिसपर होकर हम यहाँ आये थे। हमें पुल व वो खाई और उसका पानी
साफ़ दिखायी दे रहा था। यहाँ चढ़ाई अभी बहुत बाकि थी, लेकिन चढ़ाई के नाम से विशाल की खोपड़ी भन्नाने
लगी थी। मुझे लग रहा था कि जिस प्रकार चढाई के कारण नीरज जाट का दिमागी संतुलन गड़बडा
जाता है उसी तरह विशाल भी अपना आपा खोता जा रहा था। मैं उसे किसी तरह यह कह-कह कर की
बस वहाँ तक चल, उसके बाद आगे जाने को नहीं कहूँगा। आगे जाकर मैं विशाल से फ़िर कहता कि बस वहाँ तक पहुँच उसके बाद बैठ जाना। जब हम यहाँ के लगभग सबसे ऊँचे दिखने
वाले महल नुमा भवन पर आये तो विशाल बिफ़र गया कि बस संदीप भाई मैं यहाँ से आगे नहीं जाऊँगा। अब मुझे लगा कि यदि मैंने इसे अब और चलने को कहा कि बस सामने तक तो चल, तो यह मुझसे झगड़
पडेगा। इसलिये मैंने उसे वही रहने दिया जबकि मैं आसपास के फ़ोटो लेकर वापिस आया। यहाँ
सबसे ऊँची जगह वह तोप है जहाँ मैं बैठा हुआ था।
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अब तोप पर अपना कब्जा। |
इस यात्रा के सभी लेख के लिंक नीचे दी गयी सूची में दिये गये है।
बोम्बे से भीमाशंकर यात्रा विवरण
01. दिल्ली से दादर-नेरल तक ट्रेन यात्रा, उसके बाद खंड़स से सीढ़ी घाट होकर भीमाशंकर के लिये ट्रेकिंग।
02. खंड़स के आगे सीढ़ी घाट से भीमाशंकर के लिये घने जंगलों व नदियों के बीच से कठिन चढ़ाई शुरु।
03. भीमाशंकर ट्रेकिंग में सीढ़ीघाट का सबसे कठिन टुकड़े का चित्र सहित वर्णन।
बोम्बे से भीमाशंकर यात्रा विवरण
01. दिल्ली से दादर-नेरल तक ट्रेन यात्रा, उसके बाद खंड़स से सीढ़ी घाट होकर भीमाशंकर के लिये ट्रेकिंग।
02. खंड़स के आगे सीढ़ी घाट से भीमाशंकर के लिये घने जंगलों व नदियों के बीच से कठिन चढ़ाई शुरु।
03. भीमाशंकर ट्रेकिंग में सीढ़ीघाट का सबसे कठिन टुकड़े का चित्र सहित वर्णन।
05. भीमाशंकर मन्दिर के सम्पूर्ण दर्शन।
नाशिक के त्रयम्बक में गोदावरी-अन्जनेरी पर्वत-त्रयम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग आदि क विवरण
06. नाशिक त्रयम्बक के पास अन्जनेरी पर्वत पर हनुमान जन्म स्थान की ट्रेकिंग।
07. हनुमान गुफ़ा देखकर ट्रेकिंग करते हुए वापसी व त्रयम्बक शहर में आगमन।
08. त्रयम्बक शहर में गजानन संस्थान व पहाड़ पर राम तीर्थ दर्शन।
09. गुरु गोरखनाथ गुफ़ा व गंगा गोदावरी उदगम स्थल की ट्रेकिंग।
10. सन्त ज्ञानेश्वर भाई/गुरु का समाधी मन्दिर स्थल व गोदावरी मन्दिर।
11. नाशिक शहर के पास त्रयम्बक में मुख्य ज्योतिर्लिंग के दर्शन
औरंगाबाद शहर के आसपास के स्थल।
12. घृष्शनेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन
13. अजंता-ऐलौरा गुफ़ा देखने की हसरत।
14. दौलताबाद किले में मैदानी भाग का भ्रमण।
15. दौलताबाद किले की पहाड़ी की जबरदस्त चढ़ाई।
16. दौलताबाद किले के शीर्ष से नाशिक होकर दिल्ली तक की यात्रा का समापन।
नाशिक के त्रयम्बक में गोदावरी-अन्जनेरी पर्वत-त्रयम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग आदि क विवरण
06. नाशिक त्रयम्बक के पास अन्जनेरी पर्वत पर हनुमान जन्म स्थान की ट्रेकिंग।
07. हनुमान गुफ़ा देखकर ट्रेकिंग करते हुए वापसी व त्रयम्बक शहर में आगमन।
08. त्रयम्बक शहर में गजानन संस्थान व पहाड़ पर राम तीर्थ दर्शन।
09. गुरु गोरखनाथ गुफ़ा व गंगा गोदावरी उदगम स्थल की ट्रेकिंग।
10. सन्त ज्ञानेश्वर भाई/गुरु का समाधी मन्दिर स्थल व गोदावरी मन्दिर।
11. नाशिक शहर के पास त्रयम्बक में मुख्य ज्योतिर्लिंग के दर्शन
औरंगाबाद शहर के आसपास के स्थल।
12. घृष्शनेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन
13. अजंता-ऐलौरा गुफ़ा देखने की हसरत।
14. दौलताबाद किले में मैदानी भाग का भ्रमण।
15. दौलताबाद किले की पहाड़ी की जबरदस्त चढ़ाई।
16. दौलताबाद किले के शीर्ष से नाशिक होकर दिल्ली तक की यात्रा का समापन।
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2 टिप्पणियां:
राम राम जी, किले और ऐतिहासिकता का बहुत अच्छा वर्णन किया हैं, भारत में हर किले और महल में कुछ ना कुछ रहस्य तो जुड़ा हुआ ही हैं. बहुत सुन्दर पोस्ट और चित्रण, वन्देमातरम...
इसको जीतना तो नामुमकिन रहा होगा।
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