शनिवार, 30 सितंबर 2017

Sahastradhara, Dehradun सहस्र धारा, देहरादून



देहरादून-मालदेवता यात्रा-01                               AUTHOR-SANDEEP PANWAR
देहरादून की इस यात्रा में आपको स्नान करने की प्रसिद्ध जगह सहस्रधारा, बूँद-बूँद जल के टपकने वाले टपकेश्वर मंदिर के साथ गंधक पानी के श्रोत में स्नान के अलावा कुन्ड गाँव तक की भयंकर चढाई के बारे में विस्तार से बताया जा रहा है। इस यात्रा में पहली बार पहाड में बरसात के भरपूर मौसम में एक पहाडी नदी को को दो बार पार कर आगे चलना पडा था। इस लेख की यात्रा दिनांक 14-08-2016 को की गयी थी
DELHI TO SAHASTRADHARA दिल्ली से सहस्रधारा भ्रमण व स्न्नान

दोस्तों, जैसा आपको ऊपर बताया जा चुका है कि यह यात्रा अगस्त 2016 में की गयी थी। इस यात्रा का संयोग अचानक से नहीं बना।  सन 2016 की शुरुआत में मैं एक व्हाटसएप ग्रुप बनाया था। जिसका नाम यात्रा चर्चा रखा गया था आज यह ग्रुप नहीं है। ग्रुप बन्द होने का कारण भी पूछोगे तो उसकी भी बता देता हूँ कि इस ग्रुप में एक साल के अन्दर दो बार दो-तीन सदस्यों के मध्य तीखी नौक-झौक हुई। ग्रुप बनाते समय यात्रा के बारे में सलाह व चर्चा करना ही एकमात्र उद्देश्य था। जव लगने लगा कि यह दोस्तों के बीच प्यार की जगह तकरार उत्पन्न करने का कारण बन सकता है तो उसे समाप्त करना ही बेहतर लगा।
ग्रुप को मारिये गोली हम अपनी यात्रा की ओर लौट चलते है। मेरे साथ अधिकतर लेखों में ऐसा ही होता है कि यात्रा विवरण के दौरान कुछ न कुछ विषय ऐसा आ ही जाता है जिसका उल्लेख करना भी आवश्यक हो जाता है।
हाँ तो दोस्तों जैसा बताया कि ग्रुप बना तो उसमें जुडे सदस्यों में से कुछ ने एक यात्रा करने की सलाह दी। जो साथी इच्छुक लगे। उनकी सामूहिक सलाह से देहरादून नाम पर मोहर लगा दी गयी। जब स्थान का नाम निश्चित हो गया तो लगे हाथ विचार-विमर्श से तय हो गया कि जाना कब है? एक मुश्त निर्णय रहा, 15 अगस्त की छुट्टियाँ।
जितने भी इस यात्रा में जाने वाले लोग थे वे सभी देहरादून में रेलवे स्टेशन के पास 14 अगस्त 2016 की सुबह मिलने वाले थे। इस यात्रा में अधिकतर साथी तो दिल्ली या देहरादून के 200-250 किमी के आसपास से आने वाले थे। एक साथी बिहार से आने को तैयार हुआ था।
चलो दोस्तों, सबसे पहले उन सभी दोस्तों के बारे में संक्षेप में बताया जाये जो इस तीन दिवसीय यात्रा में यात्रा पर साथ देने वाले है।
सबसे पहला नाम गुरुदेव अंशुल डोभाल का है। अंशुल जी देहरादून में ही रहते है। जहाँ हम ट्रैकिंग करने जायेंगे उसी मार्ग में एक छोटे से गाँव गवाली डांडा में सरकारी अध्यापक है। डोभाल जी सौदंणा गाँव में निवास करते है। जो इनकी कर्मस्थली से मात्र एक घंटे की ट्रैकिंग के बाद आता है। इस यात्रा के मेजबान अंशुल डोभाल जी ही है।
दूसरा नाम अनुराग पन्त का है। अनुराग जी वैसे तो नई टिहरी में रहते है। अंशुल जी के खास मित्र है। पन्त भाई टिहरी में ही अपना बिजनेश करते है। दोनों बहुत समय से साथ-साथ घूमने जाते रहे है। सन 2016 में ये दोनों साथी उत्तराखण्ड सरकार द्धारा प्रायोजित एक खतरनाक व कठिन ट्रैक ट्रैल-पास करके आये है।
तीसरा नाम बिहार के आरा शहर के निवासी संजय सिंह का है जो यात्रा के समय HDFC बैंक में कार्यरत थे। वर्तमान में संजय जी शायद किसी अन्य विभाग में कार्यरत है।
चौथा नाम मुराराबाद से आने वाले साथी योगेश शर्मा का है। योगेश भाई भी अपना बिजनेस ही करते है। हैवी वेट होने के बावजूद ट्रैकिंग करने में पूरी जान लगा देते है।
पाँचवा नाम सनौली गाँव, पानीपत के निवासी सचिन जांगडा का है। जांगडा भाई भी अपना काम करते है। जांगडा भाई बाइक के बेहतरीन चालक है। अधिकतर यात्राओं में बाइक से ही घूमते मिलेंगे।
छ्टा नाम सनौली गाँव, पानीपत के निवासी विकास त्यागी का है। यह भाई सचिन जांगडा के दोस्त है। दोनों एक ही बाइक पर सवार होकर देहरादून आयेंगे।
सातवाँ नाम मेरठ में रहने वाले डाक्टर कुलभूषण (अजय) त्यागी का है। अजय भाई भी अपने 50 किलो के शरीर को बाइक व स्कूटी पर बैठाकर घूमते ही रहते है। 
आखिर में आठवाँ नाम अपना ही बचता है। अपने बारे में क्या लिखूँ?
चलो आगे बढते है। मुझे देहरादून पहुँचने के लिये दिल्ली के कश्मीरी गेट I.S.B.T. बस अडडा से देहरादून की बस में बैठना था। दिल्ली के आनन्द विहार बस अडडे से भी देहरादून की बस मिल जाती है। मेरा घर व मेरा सरकारी कार्यालय कश्मीरी गेट बस अडडे के नजदीक मात्र दस किमी दूरी पर पडता है।
उत्तराखन्ड को पहले उत्तरांचल के नाम से जाना जाता था। उत्तराखन्ड प्रशासनिक दृष्टि से दो भागों में विभाजित है। एक गढ़वाल तो दूसरा कुमायूँ। मेरे पास बीते 12 साल से साथ निभा रही जो नीली परी है ना, वो उत्तराचंल राज्य की निशानी है। उत्तराचंल नाम रहते समय यहाँ के वाहनों का नम्बर UA से आरम्भ होता था। उत्तराखण्ड बनने के बाद यह U.K. हो गया। इस U.K. के चक्कर में कभी-कभी यह आभास होने लगता है कि असली वाला U.K. (United Kingdom) भी ऐसा ही तो नहीं है!
याद रखने वाली बात यह कि दिल्ली गढवाल (देहरादून, उत्तरकाशी, टिहरी, घनस्याली, गुप्तकाशी, अगस्तमुनि, कर्णप्रयाग, जोशीमठ, चमोली, गोपेश्वर आदि) की ओर जाने वाले लगभग सभी बसे जहाँ कश्मीरी गेट बस अडडे से चलती है।
वही दिल्ली से कुमायूँ (हल्द्वानी, काठगोदाम, नैनीताल, भोवाली, अल्मोडा, रामनगर, रानीखेत, बागेश्वर, पिथौरागढ़, धारचूला आदि) की ओर जाने वाली लगभग सभी बसे आनन्द विहार वाले बस अडडे से चलती है। इतनी जानकारी बस में यात्रा करने वाले सभी यात्री के पास होनी चाहिए।
चलिये, पुन: अपनी यात्रा पर लौटते है। बस अडडे से रात करीब नौ बजे देहरादून वाली बस में सवार हो गया। मैं बस में ढेरों कोशिश करता हूँ कि एक आध घंटा नीन्द आ जाये। सारे प्रयास बस आगे बढने के साथ पीछे रह जाते है। यदि सिर पटक कर बस में नीन्द आने लगे तो मैं आगे वाली सीट पर सिर भी पटक दूँगा।
बस में सबसे ज्यादा गुस्सा कब आता है? पता है ना! क्या कह रहे हो? नहीं पता! अरे भाई जब आपको नीन्द न आ रही हो और आपकी बराबर में बैठे बन्दे की गर्दन लुढक-लुढक कर आपके कंधे पर विश्राम करने थोडी-थोडी देर में आती रहती हो। जब बराबर वाले बन्दे की बेजान गर्दन ने ज्यादा ही तंग कर दिया तो उसे झिंझोडना पड गया। उसे क्या फर्क पडना था। कुछ मिनट बाद उसकी गर्दन लुढकन फिर शुरु हो गया। मुझे ही परेशान होकर आगे वाली सीट पर झुककर बैठना पडा।
रात में लगभग सभी लम्बी दूरी की बसे खाने व चाय-पानी के लिये खतौली स्थित अनुबंधित होटलों पर रोकती है। एक बार मैंने यहाँ एक परिवार के साथ होटल वालों को लडते हुए देखा था। वो दिन है और आज का दिन है मैं कभी इन होटलों पर कुछ भी नहीं खाता। ये होटल वाले जमकर लूटते है। दस की चीज बीस में मिलेगी। पता नहीं लोग क्यों ले लेते है? बस वाले भी ऐसी जगह बस रोकते है जहाँ आसपास एडी उठाकर देखने पर भी दूसरा ढाबा दिखाई नहीं देगा।
ऐसा केवल उतराखण्ड की ओर जाने वाले उत्तर प्रदेश के रूट पर ही है। हिमाचल की ओर जाने वाले ढाबों पर इतनी मारामारी नहीं होती। लेकिन कहते है ना, दूध का जला छाछ भी फूँक मारकर पीता है। मैं रात को किसी भी बस वाले होटल पर कुछ नहीं खाता हूँ। हाँ यदि उस होटल के आसपास अन्य होटल या दुकान आदि है तो वहाँ से जरुरत की एक आध वस्तु लेना पसन्द करुँगा।
दिल्ली से देहरादून तक की पूरी यात्रा रात के अंधेरे में ही समाप्त हो गयी। हमारी बस सुबह करीब साढे चार बजे देहरादून बस अडडे पहुँच गयी। मैं देहरादून पहली बार सन 1993  में गया था। उस समय देहरादून की आबादी बहुत कम हुआ करती थी। उस समय मुख्य बस अडडा रेलवे स्टेशन से थोडा आगे हुआ करता था। आज वर्तमान वाला बस अडडा रेलवे स्टेशन से करीब 5 किमी पहले है। देहरादून की आबादी बढती हुई शिवालिक पर्वतमाल के जंगल तक जा पहुँची है। यदि इस जंगल पर सरकारी पाबंदियाँ ना लगी होती तो अब तक आधे जंगल में व शिवालिक की इन छोटी-छोटी चोटियों पर होटल व घरों में आबादी बस चुकी होती।
बढती आबादी से याद आया कि भारत की जनसंख्या और चीन की जनसंख्या लगभग बराबर है। कुछ सूत्र तो ऐसा भी कहते है कि भारत की जनसंख्या चीन की आबादी को पीछे छोड चुकी है। भारत के अन्दर मौजूद भ्रष्टाचार के कारण असली जनसंख्या लोगों को नहीं बतायी जाती है। भारत और चीन के क्षेत्रफल की आपस में तुलना करे तो साधारण शब्दों में इतना ही कहा जा सकता है यदि भारत को 100 गज का प्लाट माना जाये तो चीन 250 गज का प्लाट है। इस साधारण आंकडे से अनुमान लगा लीजिए कि भारत की स्थिति कितनी विकट हो चुकी है।
भारत और चीन में सबसे बडा अन्तर, देशभक्त और गददार लोगों की भीड का है। जहाँ चीन में सख्त सरकारी आदेश के कारण देशभक्त ज्यादा मिलेंगे तो अपने भारत महान में लचर-पचर कानून व वोट की राजनीति के कारण आधे भी देशभक्त मिलने मुश्किल हो जायेंगे। आगे बात राजनीति की ओर मुड जायेगी इसलिये जनसंख्या वाले विषय को यही विश्राम देकर अपनी यात्रा पर लौट चलते है।
देहरादून बस अडडे पर मेरी उम्मीद के विपरीत खूब चहल पहल थी। मैं तो सोच रहा था कि दिन निकलने के बाद आटो आदि मिलेंगे। 25 साल में देहरादून भी बहुत आगे हो गया है। यह भी अन्य मैट्रो शहरों की तरह रात्रि की चकाचौंध में जाने की ओर अग्रसर है।
खैर, एक शेयरिंग आटों में बैठकर देहरादून रेलवे स्टेशन पहुँचा। वैसे आपको बता दूँ कि मेरे मामा जी का परिवार देहरादून बस अडडे के नजदीक ही रहता है। मैं ठहरा दूजे किस्म का इंसान यात्रा पर आया हूँ तो रिश्तेदारों से मिलने के लिये समय मिलेगा तो सोचूँगा, नहीं तो यात्रा पहले। रेलवे स्टेशन पर बिहार से रेल में बैठकर आ रहे संजय सिंह जी मुझसे पहले पहुँच चुके थे। फोन मिलाने से पहले ही संजय जी सामने दिखाई दिये। आज संजय जी से पहली बार मिला हूँ।
संजय जी ने बताया कि योगेश शर्मा जी भी उसी ट्रैन से देहरादून आये है जिसमें मैं आया हूँ! अरे गजब, तो आप तो खूब बाते करते हुए आये होंगे। नहीं। संजय जी बोले कि योगेश जी से यही स्टेशन पर मुलाकात हुई है। योगेश भाई देहरादून में रहने वाले अपने एक पुराने दोस्त से मिलने के लिये पहले ही निकल चुके थे। योगेश भाई दोपहर में घंटाघर पर मिलेंगे।
देहरादून रेलवे स्टेशन के ठीक बाहर उत्तराखण्ड के दूर-दराज के पहाडों जैसे यमुनौत्री, जोशीमठ, गुपकाशी, मंडल आदि स्थानों पर जाने के लिये सरकारी बसे तैयार खडी थी। पहले यहाँ केवल मसूरी अडडा हुआ करता था। समय बीतने के साथ बहुत बदलाव होता रहता है।
हम दोनों एक सिटी बस में बैठ, लेंसिदो चौक पहुँचे। सामने परेड ग्राउंड और पेविलियन ग्राउंड दिखाई दे रहे है। चौराहे पर आकर पता लगा कि सहस्रधारा जाने वाली पहली बस 7 बजे आयेगी। अभी तो 6 ही बजे है। अब क्या करे? शुक्र था कि उजाला तो हो गया था। बस स्टैंड के सामने ही एक चाय वाला था। संजय जी ने उससे एक गिलास चाय लेकर पी ली। यहाँ भी कुछ निजी आप्रेटर की बसे खडी थी जो जोशीमठ, उत्तरकाशी आदि जगहों पर थोडी देर में जाने के लिये तैयार हो रही है।
हमारी प्रतीक्षा पूरे एक घंटे बस आने तक निरन्तर जारी रही। जब सहस्रधारा वाली बस में बैठे तो राहत की (राहत फतेह अली खाँ मत समझना) साँस ली। सहस्रधारा से कोई तीन किमी पहले बडी बसों (शायद पर्यटक वाहनों पर) पर आगे जाने पर पाबन्दी लगायी हुई है जिस कारण दूसरे प्रदेशों से आने वाली बडी बसों की सवारी यहाँ सिटी बसों की प्रतीक्षा में खडी होती है।
हमारी बस में राजस्थान से आने वाले करीब 18-20 स्त्री-पुरुष घुस गये। हमारी बस की सीटे जो अभी तक खाली आ रही थी। अचानक से पूरी बस ठसाठस भर गयी। परिचालक ने सहस्रधारा तक उन सभी से केवल 5 रु प्रति सवारी का किराया लिया। हमने शायद 18 रुपये दिये थे।
सहस्रधारा पुल से पहले बस स्टैंड है। यहाँ से आगे सभी को पैदल जाना पडता है। हम करीब दो घंटे यहाँ रहे। इस दौरान नदी किनारे भ्रमण, प्राकृतिक स्रोत से झरते झरने के जल में स्नान भी किया। स्नान उपरांत द्रोण मंदिर में दर्शन किये। जब वापिस लौटने लगे तो एक छोले भटूरे वाले को देखकर मुँह में पानी आ गया। हम दोनों ने आँखों ही आँखों में भटूरे खाने का निर्णय कर लिया। भटूरों का काम तमाम करने के बाद शरीर को आगे बढने की ऊर्जा मिल चुकी थी।
एक बाद बस में सवार होकर उसी जगह लेंसिदो चौक आ गये। जहाँ से सुबह एक घंटा ठाली बैठे थे। कल 15 अगस्त है। सामने परेड ग्राउंड और पेविलियन ग्राउंड में उसकी तैयारी जोर-शोर से चल रही है। सुबह जहाँ यहाँ कोई नजर नहीं आ रहा था। अब यहाँ पूरा सरकारी लाव-लश्कर तैनात हो चुका है। अब हम टपकेश्वर महादेव मंदिर की ओर जाने वाली बस की प्रतीक्षा में है। लो नाम लिया और बस भी आ गयी तो चलो दोस्तो अब टपकेश्वर की सैर पर चलते है.....(शेष अगले भाग में) 





















 सभी फोटो संजय सिंह के मोबाइल से लिये गये है। इस यात्रा में मेरे पास न मोबाइल था न कैमरा।

9 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (01-010-2017) को
"जन-जन के राम" (चर्चा अंक 2744)
पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
--
विजयादशमी की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

विकास नैनवाल 'अंजान' ने कहा…

देहरादून के इलाके प्राकृतिक खूबसूरती से भरे हुए हैं। कॉलेज के दिनो में इधर काफी मटरगश्ती करते थे। अगली कड़ी का इन्तजार है।

Onkar ने कहा…

बहुत बढ़िया

Mridula ने कहा…

मैं यहाँ जब स्कूल में थी तब गई थी सहस्त्र धारा! आगे की यात्रा का इंतज़ार है!

पंकज शर्मा ने कहा…

bahut sundar vritant. bahut din baad aapka lekh mila padhne ko. aise hi likhte rahein bhai saheb. God bless you

लोकेन्द्र सिंह परिहार ने कहा…

मुझे तो आज सुबह पता चला कि आपने यात्रा की पोस्ट डाली है वेसे यात्रा की शुरुआत बहुत ही अच्छी है में किसी कारणवश इस यात्रा पर नही आ सका पर कोई बात नही आपके यात्रा ब्लॉग के जरिये इस यात्रा का आनन्द लिया जाएगा अगली पोस्ट के दर्शन करता हु

Abhyanand Sinha ने कहा…

आज तक हम देहरादून नहीं गए, ओ नहीं कैसे गए हैं अभी तो गए हैं इसी साल जब नंदा देवी एक्सप्रेस से हरिद्वार में नींद न खुली और देहरादून पहुंच गए और आउटर पर ट्रेन रुकते ही उतर लिए। वैसे आपने अपने इस पोस्ट में अपने साथ जाने वाले सभी साथियों को बहुत परिचय दिया। आपकी बात सही है यदि यात्राा पर गए हों और रिश्तेदारों से मिलने तो ज्यादातर समय तो मुलाकात में ही चली जाएगी और यात्राा के लिए समय भी नहीं मिल पाएगा। बस वाले ने तो सरासर ज्यादती किया कि कुछ लोगों से 18 रुपए और कुछ से 5 रुपए पर यात्राा में तो ये सब चलता ही है। सो डांट वरी इंजाय यात्राा। जय हो जाट देवता की।

Abhyanand Sinha ने कहा…

आज तक हम देहरादून नहीं गए, ओ नहीं कैसे गए हैं अभी तो गए हैं इसी साल जब नंदा देवी एक्सप्रेस से हरिद्वार में नींद न खुली और देहरादून पहुंच गए और आउटर पर ट्रेन रुकते ही उतर लिए। वैसे आपने अपने इस पोस्ट में अपने साथ जाने वाले सभी साथियों को बहुत परिचय दिया। आपकी बात सही है यदि यात्राा पर गए हों और रिश्तेदारों से मिलने तो ज्यादातर समय तो मुलाकात में ही चली जाएगी और यात्राा के लिए समय भी नहीं मिल पाएगा। बस वाले ने तो सरासर ज्यादती किया कि कुछ लोगों से 18 रुपए और कुछ से 5 रुपए पर यात्राा में तो ये सब चलता ही है। सो डांट वरी इंजाय यात्राा। जय हो जाट देवता की।

Sachin tyagi ने कहा…

बढिया.... सभी लोगो से मिलना अच्छा लगेगा।

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